ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है
आम इसके शामो - सहर नहीं है ।
जिस जगह जाकर सब करें इबादत
क्या कहीं ऐसा , एक घर नहीं है ।
हम समझते हैं आज की हक़ीक़त
टूटने का ख़्वाबों के , डर नहीं है ।
दोस्त सारे , दुश्मन बने हुए हैं
प्यार सी कोई शै इधर नहीं है ।
कर नहीं सकते वो कभी मुहब्बत
गर उन्हें होना दर - बदर नहीं है ।
मोड़ पर ठहरें हैं कई मुसाफ़िर
मंज़िलों की , कोई डगर नहीं है ।
लोग उन पर , रखते नज़र हमेशा
सिर्फ़ ' तनहा ' को ही खबर नहीं है ।

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