मार्च 11, 2026

POST : 2067 ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

  ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा ' 

ख़ुद से वाक़िफ़ मेरा शहर नहीं है  
आम इसके शामो - सहर नहीं है ।  
 
जिस जगह जाकर सब करें इबादत 
क्या कहीं ऐसा , एक घर नहीं है ।  
 
हम समझते हैं आज की हक़ीक़त 
टूटने का ख़्वाबों के , डर नहीं है । 
 
दोस्त सारे , दुश्मन बने हुए हैं 
प्यार सी कोई शै इधर नहीं है । 
 
कर नहीं सकते वो कभी मुहब्बत 
गर उन्हें होना दर - बदर नहीं है ।  
 
मोड़ पर ठहरें हैं कई मुसाफ़िर 
मंज़िलों की , कोई डगर नहीं है । 
 
लोग उन पर , रखते नज़र हमेशा  
सिर्फ़ ' तनहा ' को ही खबर नहीं है ।  
 

 
 

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