सितंबर 02, 2012

POST : 108 जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  ' तनहा '

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत 
दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत ।
 
एक बंजारा है वो , उसके लिये
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत ।
 
उसका कहने को भी कुछ होता नहीं
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत ।

उस ख़ज़ाने का है चौकीदार जो 
लोग कहते  हैं , लुटेरा है बहुत ।

है ज़माने को ख़बर इस बात की 
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत । 
 
सांप को अब आदमी डसने लगा 
देख कर  हैरां सपेरा  है बहुत ।  
 
बूंद इक बरसात की ' तनहा ' नहीं   
हर तरफ़  बादल  घनेरा है बहुत ।  
 
 

 
 
 


 

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

Jo ye khta h mera bahut h 👌👍