जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत
दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत ।
एक बंजारा है वो , उसके लिये
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत ।
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत ।
उसका कहने को भी कुछ होता नहीं
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत ।
उस ख़ज़ाने का है चौकीदार जो
लोग कहते हैं , लुटेरा है बहुत ।
है ज़माने को ख़बर इस बात की
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत ।
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत ।
उस ख़ज़ाने का है चौकीदार जो
लोग कहते हैं , लुटेरा है बहुत ।
है ज़माने को ख़बर इस बात की
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत ।
सांप को अब आदमी डसने लगा
देख कर हैरां सपेरा है बहुत ।
बूंद इक बरसात की ' तनहा ' नहीं
हर तरफ़ बादल घनेरा है बहुत ।

1 टिप्पणी:
Jo ye khta h mera bahut h 👌👍
एक टिप्पणी भेजें