सितंबर 11, 2012

वर्कशॉप भगवान की ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

वर्कशॉप भगवान की ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

होली का था वो त्यौहार
भंग का चढ़ा हुआ था खुमार
जा पहुंचा मैं उस पार
जहां चल रहा अजब था कारोबार।

प्रभु तो करते थे विश्राम
कारीगर बना रहे थे इन्सां  हज़ार
हाथ पैर सर का लेबल लगे
मसाले रखे थे नम्बरवार।

बोला इक कारीगर
अब थक गया
बना दिए आज कई हज़ार
प्रभु बोले और बनाओ तुम 
धरती पर हैं अभी दरकार।

यूं जल्दी की गड़बड़ में 
बना कोई बेवकूफ कोई समझदार
एक बैच ऐसा बन गया 
लगा जाएगा मसाला बेकार।

बुलाकर प्रभु को दिखलाया
देखो ये क्या हुआ सरकार
कुछ दिमाग बन गए जरा बड़े
खोपड़ी में जाने से करते इनकार।

प्रभु बोलो कोई बात नहीं
करो इनके सरों का भी विस्तार
यूं ही नहीं अब ये मानेंगे 
इनको बना दो तुम साहित्यकार
कुछ लेखक और कवि बना दो
शायर कुछ बाकी पत्रकार।

सुन कर प्रभु के शुभ विचार
खोपड़ी में जाने को हुए दिमाग तैयार
देखा था छिपकर मैंने
जब हो रहा था ये चमत्कार।

प्रभु ने बुलाया मुझे अपने पास
कहा प्यार से
सुन बरखुरदार
मैं नहीं करता इंसानों का 
करता क्यों इन्सान मेरा कारोबार
इंसानियत का सबक नहीं पढ़ते
बने हुए धर्म के ठेकेदार। 

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