सितंबर 11, 2012

POST : 127 जय भ्र्ष्टाचार की ( हास्य - व्यंग्य - कविता ) डॉ लोक सेतिया

जय भ्र्ष्टाचार की ( हास्य - व्यंग्य - कविता ) डॉ  लोक सेतिया

अपना तो है साफ़ विचार
लेन देन ही है सच्चा प्यार ।

वेतन है दुल्हन  रिश्वत दहेज
जैसे दाल रोटी संग स्वादिष्ट अचार ।

मुश्किल है  परहेज़ रखना 
दिल पर नहीं रह पाता  इख्तियार ।

यही है राजनीति का कारोबार
जहां जहां विकास वहां वहां भ्रष्टाचार ।

सुबह की तौबा शाम को फिर पीना
होता रहता यही है बारम्बार  ।

याद नहीं रहती जनता की परेशानी 
चढ़ा हो जब  सत्ता का खुमार ।
 
इमानदारी से तो हो जाता है 
प्रशासन का हर जगह बंटाधार ।

बेईमानी के चप्पू से ही लगती 
मिल कर सबकी नैया पार ।

भ्रष्टाचार देवता  की उपासना
कर सकती है सब का उद्धार ।

तुरन्त दान से  महाकल्याण होता 
नौ नकद न तेरह उधार ।

इस हाथ दो  उस हाथ लो 
अब इसी का नाम है एतबार ।

गठबंधन है वो  सौदेबाज़ी  
बनती चलती जिस से सरकार । 

होती रही है होती ही रहेगी 
भ्र्ष्टाचार की सदा जय - जयकार ।   



2 टिप्‍पणियां:

Sanjaytanha ने कहा…

वेतन दुल्हन रिश्वत दहेज 👌👍👍👍

Sanjaytanha ने कहा…

👍👌