ऐसी भी खताएं कर गए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
ऐसी भी खताएं कर गए
हम जीने से पहले मर गए ।
दुश्मनों के सितम सहते रहे
देखा दोस्तों को तो डर गए ।
ढूंढते फिरे , यहां - वहां
बुलाया उसने तो न उधर गए ।
पूछा जो हमसे हमारा पता
जानते नहीं कह मुकर गए ।
लिखे थे ख़त हाले दिल के
रह जेब में मगर गए ।
बाद जाने के सोचा किए
करना था क्या क्या कर गए ।
हम बढ़ा सके न कदम
कुछ दूर से वो गुज़र गए ।
( 16 मार्च 1996 डायरी से )

1 टिप्पणी:
Wahh बहुत खूब
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