हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
हम सभी से , उम्र भर डरते रहे हैं
हम जिए कब रोज़ बस मरते रहे हैं ।
दुश्मनी को दोस्ती का नाम दे कर
दोस्ती की , इल्तिजा करते रहे हैं ।
खा के ठोकर भी नहीं संभले कभी हम
फिर फ़िसल कर के , वहीं गिरते रहे हैं ।
खो गए जाने कहां कुछ लोग थे जो
हर किसी के , दर्द को हरते रहे हैं ।
शासकों ने जो किया है पूछना मत
बन के माली खेत सब चरते रहे हैं ।
एक भी वादा नहीं निकला है सच्चा
झूठ से सब , फाइलें भरते रहे हैं ।
नाख़ुदा बन कश्तियां ' तनहा ' डुबो कर
आसरा तिनके का , ले तरते रहे हैं ।

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