Thursday, 4 October 2012

सीख लें हम भी जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सीख लें हम भी जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

ईश्वर देता है
हम सब को जीवन
जीना होता है
हमें स्वयं
किसे कहते हैं
लेकिन जीना
शायद जानते नहीं
हम सब।

अक्सर नहीं
सीख पाते हम
किस तरह
जीना है हमको
नहीं है कोई
जो सिखा सकता
है कैसे जीना सबको।

खुद सीखना होता है सभी को
जीने का भी सलीका
कई बार उम्र
गुज़र जाती है
नहीं सीख पाते
हम जीने का तरीका।

जीना है कैसे
सीखते सीखते
कट जाता पूरा ही जीवन
और वक़्त ही नहीं बचता
कि जी सकते कभी हम।
 
लोग उलझे हैं
केवल इन सवालों में
कितना जिए कैसे जिए
बेकार की उलझन है ये।

कितना अच्छा हो सब लोग
भुला कर बाकी
सारे सवालों को
तलाश करें
बस एक ही सवाल का
सही जवाब
किसे कहते हैं जीना
तभी तो जी सकेंगे
हम अपने जीवन को। 

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