जुलाई 05, 2026

POST : 2081 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

 

मैं कौन हूं मुझे पता ही नहीं 
ख़ुद को कभी भी देखता ही नहीं ।  
 
हर रोज़ झूठ बोलते लोग पर 
ये बात कोई मानता ही नहीं । 
 
धनवान को तो सब हैं पहचानते 
मुफ़लिस को कोई जानता ही नहीं । 
 
इक रोज़ मर के जाएंगे सब समझ 
हर क़र्ज़ हो सका अता ही नहीं ।  
 
ज़िंदादिली से ज़िंदगी को जिएं  
थक टूट कर भी हारता ही नहीं ।  
 
खामोश रह के ज़ुल्म सहते रहे 
जो बोलना है बोलता ही नहीं । 
 
' तनहा ' बता जहान में कौन है 
जिस ने कभी भी की ख़ता ही नहीं। 
 

 

कोई टिप्पणी नहीं: