जुलाई 06, 2026

POST : 2082 लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

    लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं  
लोग कुछ इस तरह भी जीते हैं । 
 
चारागर ढूंढते नहीं हम तो 
आप अपने ही ज़ख़्म सीते हैं । 
 
मयकदे में भी बैठे प्यासे हैं 
जाम मिलते ही जिनको रीते हैं । 
 
हम ख़िज़ा को बहार कह देते 
दिन युंहीं ज़िंदगी के बीते हैं । 
 
माल चोरी का बिक रहा ऐसे 
माप करने को बांस फीते हैं । 
 
आपको फ़ल मिला उसी का है 
कर्म जैसे भी रोज़ कीते हैं । 
 
पूछते लोग कौन ' तनहा ' हैं 
कुछ नहीं हम तो सिर्फ़ मनमीते हैं । 
 

  

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