लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
लब हैं ख़ामोश अश्क़ पीते हैं
लोग कुछ इस तरह भी जीते हैं ।
चारागर ढूंढते नहीं हम तो
आप अपने ही ज़ख़्म सीते हैं ।
मयकदे में भी बैठे प्यासे हैं
जाम मिलते ही जिनको रीते हैं ।
हम ख़िज़ा को बहार कह देते
दिन युंहीं ज़िंदगी के बीते हैं ।
माल चोरी का बिक रहा ऐसे
माप करने को बांस फीते हैं ।
आपको फ़ल मिला उसी का है
कर्म जैसे भी रोज़ कीते हैं ।
पूछते लोग कौन ' तनहा ' हैं
कुछ नहीं हम तो सिर्फ़ मनमीते हैं ।

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