Tuesday, 9 October 2012

तीन छोटी कवितायेँ ( पूँजी // शोर // फुर्सत ) डॉ लोक सेतिया

1     पूंजी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

सफलता की बता कर बातें
बांटनी चाही खुशियां
दोस्तों के संग।

प्रतिद्वंदी बन गये 
दोस्त सब
लगे करने ईर्ष्या मुझ से।

मिले जितने भी दुःख दर्द
दोस्तों से,सभी अपनों से
दुनिया वालों से छुपा कर
रखे अपने सीने में।

दर्द की वो सारी दौलत
है बाकी मेरे पास
नहीं समाप्त होगी
जो जीवन प्रयन्त।

2      शोर ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वो सुनता है
हमेशा सभी की फ़रियाद
नहीं लौटा कभी कोई
दर से उसके खाली हाथ।

शोर बड़ा था
उसकी बंदगी करने वालों का
शायद तभी
नहीं सुन पाया
मेरी सिसकियों की
आवाज़ को आज खुदा।

3   फुर्सत ( कविता  ) डॉ लोक सेतिया

मुझे पता चला
दुखों का पर्वत टूटा
तुम्हारे तन मन पर।

निभानी तो है औपचारिकता
सांत्वना व्यक्त करने की
मगर करूं क्या व्यस्त हूं
अपनी दुनिया में मस्त हूं।

फुर्सत नहीं है
ज़रा भी अभी
आऊंगा तुम्हारे पास
मैं दिखावे के आंसू बहाने
मिलेगी जब कभी फुर्सत मुझे। 
           

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