Tuesday, 30 October 2012

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे
कहीं खो गये हैं यहां के सवेरे।

खुली इस तरह से वो जुल्फें किसी की
लगा छा गये आज बादल घनेरे।

करें याद फिर से वो बातें पुरानी
बने जब हमारे सभी ख़्वाब तेरे।

किया जुर्म हमने मुहब्बत का ऐसा
ज़माना खड़ा है हमें आज घेरे।

बचाता हमें कौन लूटा सभी ने
बने लोग सारे वहां खुद लुटेरे।

कहीं भी नहीं है हमारा ठिकाना
सुबह शाम ढूंढे नये रोज़ डेरे।

दिया साथ सबने ज़रा देर "तनहा"
कदम दो कदम सब चले साथ मेरे। 

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