Tuesday, 23 October 2012

अभी और कितने स्मारक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अभी और कितने स्मारक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वसूला गया होगा
गरीब जनता से कर
भरने को खजाना  उस बादशाह का
जिसने बेरहमी से किया होगा
खर्च जनता की अमानत को
बनवाने के लिये
अपनी प्रेमिका की याद में
ताजमहल उसके मरने के बाद।

कितने ही मजदूरों
कारीगरों का बहा होगा पसीना
घायल हुए होंगे उनके हाथ
तराशते हुए पत्थर
नहीं लिखा हुआ
उनका नाम कहीं पर।

क्यों करे कोई याद
उन गरीबों को
बदनसीबों को
देखते हुए ताज
यही सोच रहा हूं मैं आज।

कुछ और सोचते होगे तुम
मेरे करीब खड़े होकर
जानता हूं वो भी मैं
साथी मेरे
रश्क हो रहा है मुमताज से तुम्हें
नाज़ है
इक शहंशाह के ऐसे प्यार पर तुमको।

खुबसूरत लग रहा है नज़ारा तुम्हें
भर लेना चाहते हो उसे आंखों में
यादों में बसाने के लिये 
अपने प्यार के लिये
मांगने को दुआएं
उठा रखे हैं दोनों हाथ तुमने
कर रहे हो वादा
फिर एक बार
किसी को लेकर साथ आने का।

अब तलक चला आ रहा है चलन वही
शासकों का उनके बाद
उनके नाम स्मारक बनवाने का ,
जनता के धन से सरकारी ज़मीन पर
बनाई जाती हैं
सत्ताधारी नेताओं के पूर्वजों की समाधियां।

नियम कायदा कानून
सब है इनके लिये 
आम जनता के लिये 
नहीं बनता कभी ऐसा आशियाना
जिन्दा लोग
नहीं प्राथमिकता सरकार के लिये
मोहरे हैं हम सब
उनकी जीत हार के लिये।

लोकतंत्र में पीछे रह गये सब लोग
देश पर बोझ बन गये 
ये सब के सब राजनेता लोग
जब इस बार चढ़ाना
किसी समाधि पर फूल
सोचना रुक कर वहां एक बार
क्या थी उनकी विचारधारा
क्या है हमको वो स्वीकार।

जो कहलाते जनता के हितचिन्तक
उनके नाम बनाई जाएं समाधियां
और जनता रहे बेघर-बार
करना ही होगा कभी तो विचार। 

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