Thursday, 11 October 2012

यही सपना है मेरा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया - भाग दो

यही सपना है मेरा - डॉ लोक सेतिया

रात एक बेहद खुबसूरत सपना देखा ,
मैं एक नई दुनिया में रह रहा हूं ,
हरा भरा मैदान है ,
पेड़ पौधे ,
फूल हैं ,
परिंदों की चहचहाह्टें।

मैं सवतंत्र हूं वहां पर ,
कोई चिंता नहीं ,
घर की कोई दीवार नहीं ,
रिश्तों नातों की कोई जंजीरें नहीं।

कोई रोकने वाला नहीं ,
कोई टोकने वाला नहीं,
कोई दुःख नहीं ,
कोई कमी नहीं ,
किसी तरह की कोई ज़रूरत नहीं।

कोई डर नहीं ,
घबराहट नहीं,
हर तरफ बस जीवन ही जीवन है ,
प्यार ही प्यार है।




इस जहां में ,

पुरानी दुनिया की कोई भी बुराई  नहीं है,
न कोई स्वार्थ न लोभ लालच ,
कुछ भी नहीं दिखाई देता वहां ,
न धन दौलत न सुख सुविधा ,
न कोई आधुनिक साधन,
मगर कुछ भी कमी नहीं लग रही थी।

इन सब की कोई ज़रूरत ही नहीं थी वहां पर ,
लग रहा था बस मेरा एक ,
दोस्त वहीं कहीं आस पास है ,
कोई नाम नहीं जिसका ,
रंग रूप का पता भी नहीं ,
कोई चेहरा नहीं पहचान नहीं।

केवल एक एहसास है ,
वहां किसी के होने का ,
प्यार - अपनेपन का ,
हम दोनों रहते हैं प्यार से ,
जैसे सोचते थे ,
चाहते थे मगर रह पाए नहीं जीवन भर।

कई बार नींद टूटी ,
मगर जागना नहीं चाहा ,
फिर से सो जाता ,
और देखने लगता वही सपना।




काश जागता न कभी मैं ,

आज सुबह के उस सपने से ,
लोग कहते हैं ,
सुबह के सपने सच हो जाते हैं।




सच हो जाए काश ,

मेरा आज का वही सपना। 

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