Sunday, 7 October 2012

समझना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

समझना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

समझता हूं मेरे पास सब कुछ है  ,     
समझना है नहीं कुछ भी पास मेरे।

समझता हूं बहुत कुछ जनता हूं  ,      
समझना है नहीं मैं जानता कुछ भी।

समझता हूं खुद को बलशाली बहुत  , 
समझना है बड़ा ही  कमज़ोर हूं मैं।

समझता हूं मेरे साथी है कितने  ,       
समझना है नहीं अपना है कोई।

समझता हूं अपने आप को दाता ,     
समझना है हूं मैं बस इक भिखारी।

समझता हूं कर सकता सभी कुछ ,    
समझना है नहीं कुछ हाथ में मेरे।

समझता हूं मेरा दुश्मन ज़माना है ,   
समझना है खुद ही अपना हूं दुश्मन।

समझता हूं मेरे हैं राज़दार कितने ,     
समझना है नहीं हमराज़ ही कोई।

समझता हूं  मैं ज़िंदा आदमी हूं ,       
समझना है  होती ज़िंदगी क्या है।

समझता हूं ,समझ पाता नहीं हूं ,     
समझना है अभी मुझको क्या क्या। 

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