लोकदेव नेहरू - रामधारी सिंह दिनकर ( पुस्तक समीक्षा ) डॉ लोक सेतिया
मैंने हमेशा कितने लोगों की किताबों की समीक्षा करने से बचना चाहा है , और इतने महान कवि विचारक की किताब पर कुछ भी कहना मुझ जैसे साधरण लेखक के लिए आसान कदापि नहीं है । कुछ साल पहले बालमुकुंद अग्रवाल जी की किताब पढ़ कर स्वतंत्रता आंदोलन के 90 साल 1858 से 1946 की कहानी समझने में आसानी हुई थी अब इस किताब को पढ़कर सिर्फ जवाहरलाल नेहरू ही नहीं बल्कि अन्य तमाम महान नायकों की विचारधारा उनकी देशभक्ति और सामाजिक सरोकारों की चिंता को लेकर सटीक और विश्वसनीय जानकारी हासिल हुई है । राष्ट्रकवि दिनकर जी से बेहतर शायद कोई और इस विषय पर पूर्ण निष्पक्षता ईमानदारी से लिखने का साहस नहीं कर सकता क्योंकि दिनकर जी नेहरू के करीबी होकर भी महिमामंडन या चाटुकारिता कदापि नहीं कर सकते थे जो बेहद महत्वपूर्ण होता है ।
रामधारी सिंह दिनकर : -
जन्म 23 सितंबर 1908 , निधन 24 अप्रैल 1974 ,
1959 में ' संस्कृति के चार अध्याय ' पर साहित्य अकादेमी पुरुस्कार और पद्मभूषण की उपाधि , 1973 में उर्वशी पर ज्ञानपीठ पुरुस्कार ।
महीयसी महादेवी वर्मा ने दिनकर जी को विश्वकवि कहा था क्योंकि उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता की वाणी और उसकी स्वायत्तता का गैरवगान और संघर्ष नहीं वरन प्रेम का इक व्यापक क्षितिज है जो उनको विश्वकवि की श्रेणी में ले जाता है ।
दिनकर जी ने कहा था सच्चा कवि हमेशा जीवित रहता है , उस के प्रति राग और द्वेष के कारण उसके सामने उसका सही मूल्यांकन नहीं हो पाता ।
किसी कवि का सही मूल्यांकन उसके निधन के पचास वर्ष बाद होता है , और आज लगता है वही समय है दिनकर जी का निधन होने के पचास साल बाद का ।
पुस्तक से कुछ अंश लेकर समझने की कोशिश करते हैं : -
( नेहरू जी को दिनकर जी ने हर जगह पंडित जी कहकर संबोधित किया है ये बताना ज़रूरी है आगे पढ़ते हुए ध्यान रहे। )
चीनी आक्रमण के बाद दिनकर जी ने नेहरू की मनोसिथ्ति को समझते हुए लिखा है , मैं जिस धर्म का प्रतिपादन कर रहा था , वह आपद्धर्म था । पंडित जी घोर संकट में भी परम धर्म पर आसीन थे । पंडित जी उस हारी हुई ज्योति के प्रतीक थे , जो पराजित हो कर भी अन्धकार को ललकार रही थी ।
{ परशुराम की प्रतीक्षा }
अन्धकार को दबी रौशनी की धीमी ललकार ,
कठिन घड़ी में भी भारत के मन की धीर पुकार ।
सुनती हो नागिनी ! समझती हो इस स्वर को ?
देखा है क्या कहीं और भू पर उस नर को -
जिसे न चढ़ता ज़हर , न तो उन्माद कभी आता है ,
समर-भूमि में भी जो पशु होने से घबराता है ।
आगे दिनकर जी कहते हैं , हिंसा- अहिंसा के बारे में पंडित जी के लगभग वे ही विचार थे , जिनका प्रतिपादन मैंने ' कुरुक्षेत्र ' काव्य में किया है :
व्यक्ति का है धर्म तप , करुणा , क्षमा ,
व्यक्ति की शोभा विनय भी , त्याग भी ;
प्रश्न जब उठता , मगर , समुदाय का ,
भूलना पड़ता हमें तप-त्याग को ।
कौन केवल आत्मबल से जूझ कर
जीत सकता देह का संग्राम है ?
पाशविकता खड्ग जब लेती उठा ,
आत्मबल का एक बस चलता नहीं ।
संस्मरणों की चर्चा करते तो शायद पूरी किताब ही लिखनी पड़ती मगर यहां सिर्फ सार की बात कहनी है ताकि पुस्तक को लेकर पाठक राय बना सकें । 148 पेज से आखिर में दिनकर जी ने अध्याय ' पंडित जी का जीवन दर्शन ' लिखा है जिस में कुछ शीर्षक से नेहरू जी का सपष्ट व्यक्तित्व उजागर होता है ।
1 धर्म
दिनकर जी कहते हैं पंडित जी की पूरी श्रद्धा भगवान बुद्ध पर अटूट थी , भगवान बुद्ध अपने समय से बहुत पहले जनमे थे अथवा यह कहना चाहिए कि उनका समय अब आया है । बुद्ध अगर बीसवीं सदी में जनमे होते , तो उनके सबसे निकटवर्ती आत्मबन्धु गांधी जी और जवाहरलाल हुए होते । बुद्ध का ईश्वर के विषय में क्या मत था ? ऐसे सभी प्रश्नों को बुद्ध ने अव्याकृत कोटि में डाल रखा था । किन्तु वे आज अगर मौजूद होते और हम उनसे पूछते ईश्वर है या नहीं , तो उनका जवाब होता , तुम्हें प्रश्न करना नहीं आया ।
' मान लो कि ईश्वर है और तुम्हारे कर्म अच्छे हैं , तो परिणाम क्या होगा ?'
' अच्छा होगा । '
' और मान लो ईश्वर है और तुम्हारे कर्म अच्छे नहीं हैं , तो परिणाम क्या होगा ? '
' परिणाम बुरा होगा । '
' तो फिर पूछना यह चाहिए कि तुम हो या नहीं तुम्हारे कर्म कैसे हैं ।
वैसे जवाहरलाल जी गीता के प्रेमी थे और गांधी जी को देख कर उन्हें ये विश्वास हो गया था कि सिथ्तप्रज्ञता कल्पना हवाई नहीं है और साधना से सिथ्तप्रज्ञता प्राप्त की जा सकती है ।
2 हिंसा-अहिंसा
दिनकर बताते हैं कि पंडित जी मानते थे कि अहिंसा का सर्वत्र पालन वही व्यक्ति कर सकता है , जिस के भीतर की मानवता अत्यन्त विकसित और सजीव हो , जो भारी से भारी कष्ट सहकर भी उत्तेजना में न आए ।
3 प्रजातंत्र
पंडित जी व्यक्ति के वयक्तित्व का आदर करते थे और यह मानते थे कि असली प्रजातंत्र वह है , जहां सारी जनता मतदान द्वारा अपनी राय ज़ाहिर करती है और शासन उसी राय के अनुसार चलता है । एक हद तक शिक्षा और समृद्धि लाये बिना प्रजातंत्र ठीक से काम नहीं करता है ।
4 समाजवाद
सन् 1929 ई में पंडित जी ने लाहौर कांग्रेस के सभापति - पद से ऐलान किया था कि मैं समाजवादी हूं और राजाओं तथा उद्योगपतियों के साम्राज्य के ख़िलाफ़ हूं । प्रजातंत्र और समाजवाद को वे एक ही सिक्के के दो पहलू समझते थे ।
5 राष्ट्रीयकरण
सन् 1954 ई में उन्होंने कहा था , समाजवाद विषयक हमारी आम धारणा यह है कि उस से उद्योगों का राष्ट्रीयकरण होता है । इसलिए ऐसा सोचा जा सकता है कि हम तुरन्त उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दें । जैसे जैसे समाजवाद की प्रगति होगी , अधिक से अधिक उद्योग राष्ट्रीय सेक्टर में होंगे । किन्तु अभी हमारा उद्देश्य धन के उत्पादन और रोज़गार में वृद्धि होनी चाहिए ।
6 राज्य और व्यक्ति
पंडित जी मानते थे कि आज तक राज्य का उद्देश्य वैदेशिक आक्रमण और आन्तरिक उत्पात से समाज की रक्षा करना रहा है । लेकिन अब कल्याणकारी राज्य का ध्येय जनता की शिक्षा , स्वास्थ्य , रोज़ी आदि समस्याओं का भी समाधान निकालना हो गया है ।
7 पंडित जी और भारतीय एकता
काल का कारण राजा होता है या राजा का कारण काल - इस प्रश्न का सबसे सही उत्तर यह है कि महापुरुष काल की प्रेरणा से जन्म लेते हैं और फिर वो काल को प्रभावित भी करते हैं । जवाहरलाल जिस युग में जनमे , वह बहुत पहले से एकता की खोज में बेचैन चला आ रहा था । गांधी जी और जवाहरलाल ने उस बेचैनी में वृद्धि कर दी और जनता के मन पर यह बात बिठा दी कि एकता और आज़ादी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । कहते हैं , महापुरुषों के जीवन में अक्सर असफलता अन्त - अन्त तक उनका पीछा करती है । राम , कृष्ण , सुकरात , ईसा , कबीर और गांधी - ये अपने जीवन में क़ामयाब नहीं हुए , मगर दुनिया को रौशनी उन्हीं के आदर्शों से मिल रही है । अब वही लड़ाई काल के अखाड़े में चल रही है । इस लड़ाई में सबसे ज़्यादा रौशनी गांधी जी की कुर्बानी से आ रही है , जवाहरलाल की उन कोशिशों से आ रही है जो उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए की थीं और जिन कोशिशों में वे नाकामयाब रहे । ये सभी बातें विचार रामधारी सिंह दिनकर जी की किताब से शब्द - ब - शब्द लिए गए हैं मैं उनसे अच्छा क्या वैसा भी कभी भी नहीं लिख पाऊंगा अत: इसे समीक्षा नहीं प्रमुख अंश कहना उचित होगा ।
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1 टिप्पणी:
नेहरू जी के वयक्तित्व पर लिखी गई किताब को विवेचित स्वर देता आलेख👍👌
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