Sunday, 21 October 2012

उम्र कैद ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

उम्र कैद ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

यूं ही नहीं होती
उम्रकैद की किसी को सज़ा।

साबित करना होता है
उसका बड़ा कोई गुनाह।

साबित नहीं हो पाते
सभी के किए अपराध
मिलते हैं बचाव के
अवसर बार बार
रख सकते हैं
अपराधी अपना वकील
जो देता है बचाव में
नई नई फिर दलील।

अदालत का रहता
वही उसूल हर बार
बेगुनाह को न हो सज़ा
बच जाये भले गुनहगार
आम अपराध की
सज़ा मिलती कुछ साल
चलता कानून भी
धीमी धीमी है चाल।

हर सुविधा मिलती जेल में
चुका कर मोल
देखता जा चुपचाप
कुछ न बोल
ध्यान रखती कैदियों का खुद सरकार
करती रहती है कई जेल सुधार।

उम्र कैद मिलती सबको
विवाह रचाने पर
रोक नहीं कैदी के बाहर जाने पर
जेल के कर के दिन भर सभी प्रबंध 
खुद लौट आता मुजरिम अपने ठिकाने पर।

उसे उम्र भर काटनी होती है सज़ा
जेलर को लाया था जो घर बुला
सज़ा उसकी न हो सकती कभी माफ़
कोई सुनता नहीं फिर उसकी कोई फ़रियाद ।

गंभीर है जुर्म शादी रचाने का
विवाह संगठित श्रेणी का
माना जाता इक अपराध।

साथ छोड़ जाते हैं
सब पुराने साथी
गये थे कभी जो बन कर बाराती
भोगता सज़ा बस अकेला दूल्हा
जलता है ऐसे सुबह शाम चूल्हा
है राज़ मगर जानते सभी हैं
लेकिन किसी को बचाते न कभी हैं 
पति पत्नी का उम्र भर
का यही है नाता
इक देता हर पल सज़ा
दूजा खुश हो है पाता। 

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