Wednesday, 19 September 2012

दुर्घटना ( कविता ) 3 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                                                         दुर्घटना  (  कविता  )
जब घटी थी ,
दुर्घटना मेरे साथ ,
दोनों ही खड़ी थी ,
तब मेरे ही पास  ! !
उन्हें इतना करीब से ,
देखा था मैंने ,
पहली बार ,
डरा नहीं था ,
नियति को ,
कर लिया था स्वीकार !!
मगर तभी ,
ख़ामोशी से ,
प्यार और अपनेपन से ,
अपनी आगोश में ,
भर लिया था ,
मुझे ज़िंदगी ने !!
मुझे कहना चाहती हो जैसे ,
तुम्हें बहुत चाहती हूँ मैं !!
और लौट गई थी मौत ,
चुप चाप ,
हार कर ज़िंदगी से ,
तब मुझे हुआ था एहसास ,
कितना कम है फासला ,
मौत और ज़िंदगी के बीच !!!

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