Friday, 28 September 2012

तीन छोटी छोटी नज़्म ( भाग एक में शामिल ) डॉ लोक सेतिया

जो भूला लोकतंत्र आचार  ,
हुई सत्ता की जय जयकार !
चुना था जिनको हमने ,वही ,
बिके हैं आज सरे-बाज़ार !
लुटा कर सब कुछ भी अपना ,
बचा ली है उसने सरकार !
टांक तो रक्खे हैं लेबल ,
मूल्य सारे ही गए हैं हार !
देखिए उनकी कटु-मुस्कान ,
नहीं लगते अच्छे आसार !
                                 2
कहने को तो बयान लगते हैं ,
खाली लेकिन म्यान लगते हैं !
वोट जिनको समझ रहे हैं आप ,
आदमी बेजुबान लगते हैं !
हैं वो लाशें निगाह बानों की ,
आपको पायदान लगते हैं !
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए ,
देश के वो किसान लगते हैं !
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन ,
बेखबर साहिबान लगते हैं !
                                   3
बेदिली से दुआ की है ,
तुमने भारी खता की है !
मारकर यूं ज़मीर अपना ,
खुद से तुमने जफ़ा की है !
बढ़ गया है मरज़ कुछ और ,
ये भी कैसी दवा की है !
तुम सज़ा दो गुनाहों की ,
हमने ये इल्तिज़ा की है !
बिक गये चन्द सिक्कों में ,
बात शर्मो-हया की है !

Thursday, 27 September 2012

ग़ज़ल 1 5 6 ( हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत )

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत ,
किसी दिलरुबा की मिली जब मुहब्बत !
गये भूल जैसे सभी लोग जीना,
कहो जा के उनसे करें सब मुहब्बत !
नहीं मिल रहा है सभी ढूंढते हैं ,
मिलेगा खुदा जब बनी रब मुहब्बत !
चले जो मिटाने वो खुद मिट गये थे ,
कोई लाख चाहे मिटी कब मुहब्बत !
सिखाया है उनको यही बोलना बस,
कहेंगे हमेशा मेरे लब मुहब्बत !
नहीं नफरतों से मिलेगा कभी कुछ ,
उसे छोड़ कर तुम करो अब मुहब्बत  !
किसे चाहते हो किसे दिल दिया है ,
कहेगी किसी से किसी शब मुहब्बत !
वही ज़िंदगी प्यार जिसमे भरा हो ,
है जीने का तनहा यही ढब मुहब्बत !

मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 6 भाग दो

अक्सर आता है मुझे याद  ,
पहला दिन कालेज का ,
झाड़ियों के पीछे ,
पत्थरों पर बैठे हुए थे हम दोनों ,
कालेज के लान में ,
रैगिंग से हो कर परेशान  ,
कितने उदास थे हम  ,
कितने अकेले अकेले ,
पहले ही दिन कुछ ही पल में ,
हम हो गये थे कितने करीब ! !
अठारह बरस है अपनी उम्र  ,
आज भी लगता है कभी ऐसे ,
कितनी यादें हैं अपनी ,
जो भुलाई नहीं जाती  ,
भूलना चाहते भी नहीं थे हम कभी ,
पहली बार मुझे मिला था दोस्त ऐसा  ,
जो जानता था ,
पहचानता था मुझे वास्तव में  ! !
बीत गये वो दिन कब जाने ,
छूट गया वो शहर ,
उसका बाज़ार ,
गलियां उसकी ,
बरसात में भीगते हुए   ,
हमारा कुछ तलाश करना ,
बाज़ार से तुम्हारे लिये ,
खो गई सपनों जैसी ,
प्यारी दुनिया हमारी  ! !
मगर भूले नहीं हम ,
कभी वो सपने ,
जो सजाए थे मिलकर कभी  ,
अचानक तुम चले गए वहां ,
जहां से आता नहीं ,
लौटकर कोई ! !
मुझे नहीं मिला ,
फिर कोई दोस्त तुम सा  ,
खाली है मेरे जीवन में ,
इक जगह ,
रहते हो अब भी तुम वहां  ,
आज भी सोचता हूँ ,
जाकर ढूंढू  ,
उन्हीं रास्तों पर तुम्हें जहां ,
चलते रहे ,
दोनों यूं ही शामों को ,
अब कहां मिलते हैं ,
इस दुनिया में तुझसे दोस्त  ! !
अब क्या है इस शहर में ,
इस दुनिया में ,
बिना तेरे मेरी जान मेरे दोस्त !!

Wednesday, 26 September 2012

कोई ( कविता ) 4 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कोई है धड़कन दिल की
कोई राहों की है धूल  !
कोई शाख से टूटा पत्ता
कोई डाली पे खिला फूल !!
कोई आंसू मोती जैसा
कोई हो जैसे कि पानी !
कोई आज के दौर की चर्चा
कोई भूली हुई कहानी !!
कोई कविता ग़ज़ल हो जैसे
कोई बीते कल का अखबार !
कोई कहीं पर डूबी नैया
कोई माझी संग पतवार !!
कोई सूना आंगन मन का
कोई है दिल का अरमान  !
कोई अपने घर को भूला
कोई घर घर का महमान !!
कोई नहीं कभी बिकता है
कोई बताता अपना दाम !
कोई है आगाज़ किसी का
कोई किसी का है अंजाम !!

Monday, 24 September 2012

ऐसा भी कोई तो हो ( कविता ) 4 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अपना ले जो मुझे ,
मैं जैसा भी हूं ! !
हर दिन मुझको ,
न करवाए एहसास ,
मेरी कमियों का बार बार ! !
सोने चांदी से नहीं ,
धन दौलत से नहीं ,
प्यार हो जिसको इंसान से,
इंसानियत से ! !
जिसको आता ही न हो,
मेरी ही तरह ,
दुनिया का लेन-देन का ,
कोई कारोबार ! !
थाम कर जो ,
फिर छोड़ जाए न कभी साथ  ,
रिश्ते-नातों को ,
जो समझे न इक व्योपार ,
जिसको आता हो ,
बहाना आंसू ,
हर किसी के दुःख दर्द में  ! !
नफरत न हो जिसे ,
अश्क बहाने से ,
जिसमें बाकी हों ,
मानवता की संवेदनाएं ,
जन्म जन्म से ढूंढ रहा हूं ,
उसी को मैं  !!     

Sunday, 23 September 2012

तीन नये दृश्य ( कविता ) 4 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

उसे निकाल दिया है ,
घर से उन्होंने ,
जो करते हैं,
उसी की बातें  ,
ईश्वर खड़ा ,
चुपचाप कहीं बाहर !!
बहुत व्यस्त हैं लोग  ,
कर रहे तलाश सच की  ,
दफ्तरों में बैठकर   ! !
करते हैं बस यही चर्चा  ,
सच को बचाना है  ,
सच ,
घायल हुआ ,
आता है ,
जब उनके पास ,
करता उनसे सवाल ,
पहचाना मुझे  ! !
कौन हो तुम ,
क्यों आये हो ,
तुम हमारे पास ,
कहते हैं  वो ,
जो बने फिरते हैं ,
सच के  पैरोकार !!
लोकतंत्र का है मंदिर  ,
करते नेता ,
उसका गुणगान ,
जनता दर्शन को तरसी ,
छुपा कहां है वो भगवान ,
आ रही जाने किधर से ,
बचाने की फ़रियाद  ,
कराह रहा लोकतंत्र  ,
मुझको कर दो आज़ाद  ! !
समाप्त होने लगी ,
गूंगो बहरों की ये आशा  ,
देख रहे सारे नेता,
खत्म हो कब तमाशा !!
हारने लगी अब ज़िंदगी  ,
लड़ते लड़ते मौत से ,
अब नहीं आता ,
कोई भी बचाने को उसे ,
हो रहा सामान ,
बस डुबाने को उसे  ,
सहमें सहमें हैं सभी ,
अब हमारे देश में ,
राज रावण हैं  करते ,
राम ही के भेस में  ! !
गावं गावं ,
शहर शहर ,
गली गली है डर ,
लोकतंत्र जिंदा है अभी ,
या वो चुका है मर !!
नाव डुबोते माझी  ,
माली चमन उजाड़ रहे  ,
कैनवास पर चित्रकार ,
कैसी  तस्वीरें उतार रहे ,
आलीशान घरों को  ,
सजाएंगी उनकी तस्वीरें ,
खो बैठेंगी ,
अपना वास्तविक अर्थ ,
रह जाएगा केवल बाकी ,
उनके ऊंचे दामों का इतिहास !!

रास्ते ( कविता ) 4 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मंज़िल की ,
जिन्हें चाह थी ,
मिल गई ,
उनको मंज़िल  ! !
मैं वो रास्ता हूं ,
गुज़रते रहे ,
जिससे हो कर  ,
दुनिया के सभी लोग ,
तलाश में ,
अपनी अपनी ,
मंज़िल की  ,
मैं रुका हुआ हूं ,
इंतज़ार में प्यार की ! !
रुकता नहीं ,
मेरे साथ कोई भी  ,
कुचल कर ,
गुज़र जाते हैं सब ,
मंज़िल की तरफ आगे ! !
सबको भाती हैं मंज़िलें  ,
बेमतलब लगते हैं रास्ते ,
क्या मिल पाती ,
तुम्हें मंज़िलें  ,
न होते जो रास्ते ,
रास्तों को पहचान लो  ,
उनका दर्द ,
कभी तो जान लो !!

हमारा अपना ताज ( कविता ) 4 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मुमताज क्या चाहती थी ,
किसे पता ,
उसे क्या मिला ,
ताज बनने से ,
बनवा दिया ,
एक राजा ने ,
एक महल ,
संगेमरमर का ,
अपनी प्रेमिका ,
की याद में ,
और कह दिया ,
दुनिया ने ,
मुहब्बत की निशानी उसे। 
तुम नहीं बनवा सकोगे ,
ताज महल कोई  ,
मेरी याद में ,
मेरे बाद ,
मगर जानती हूं मैं ,
तुम चाहते हो बनाना  ,
एक छोटा सा घर मेरे लिये   ,
जिसमें रह सकें ,
हम दोनों प्यार से। 
अपना बसेरा बनाने के लिये  ,
हमारी पसंद का कहीं पर ,
हर वर्ष बचाते हो ,
थोड़े थोड़े पैसे  ,
अपनी सीमित आमदनी में से  ,
किसी ताज महल से ,
कम खूबसूरत नहीं होगा  ,
हमारा प्यारा सा वो घर ,
मुमताज से कम ,
खुशकिस्मत नहीं हूं मैं  ,
प्यार तुम्हारा ,
कम नहीं है ,
किसी शाहंशाह से।

Saturday, 22 September 2012

मृग तृष्णा ( कविता ) 4 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हम चले जाते हैं उनके पास  ,
निराशा और परेशानी में  ,
सोचकर कि वे कर सकते हैं ,
जो हो नहीं पाता है  ,
कभी भी हमसे  ! !
वे जानते हैं वो सब  ,
नहीं जो भी हमें मालूम ,
तब वे बताते हैं हमें ,
कुछ दिन , महीने , वर्ष ,
रख लो थोड़ा सा धैर्य  ,
सब अच्छा है उसके बाद ,
हमें मिल जाती है  ,
इक तसल्ली सी  ,
सोचकर कि आने वाले हैं ,
दिन अच्छे हमारे !!
कट जाती है उम्र इसी तरह  ,
झेलते दुःख ,परेशानियां  ,
और जी लेते हैं हम ,
आने वाले अच्छे दिनों की ,
झूठी उम्मीद के सहारे  !!
टूटने लगता है जब धैर्य  ,
डगमगाने लगता है विश्वास  ,
फिर चले जाते हैं  ,
हम बार बार उन्हीं के पास  ,
ले आते हैं वही झूठा दिलासा  ,
और नहीं कुछ भी उनके पास ,
उनका यही तो है कारोबार  ,
झूठी उम्मीदों ,दिलासों का !!
शायद होती है ,
इस की ज़रूरत हमें ,
जीने के लिये ,जब ,
निराशा भरे जीवन में ,
नहीं नज़र आती ,
कोई भी आशा की किरण  ,
जो जगा सके ज़रा सी आशा  ,
झूठी ही सही !!
सच साबित होती नहीं बेशक  ,
उनकी भविष्यवाणियां कभी भी  ,
तब भी चाहते हैं ,
बनाए रखें उन पर ,
अपना विश्वास  ,
ऐसा है ज़रूरी उनके लिए भी ,
शायद उससे अधिक हमारे लिये ,
जीने की आशा के लिए !!

विवशता ( कविता ) 3 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

खाली है मेरा भी दामन ,
तुम्हारे आंचल की तरह ,
कुछ भी नहीं पास मेरे ,
तुम्हें देने को  !!
तुम्हारी तरह है मुझे भी ,
तलाश एक हमदर्द की ,
मेरे मन में भी है बाकी ,
कोई अधूरी प्यास !!
ढूंढती हैं ,
तुम्हारी नज़रें जो मुझ में  ,
कहने को लरजते हैं ,
तुम्हारे होंट बार बार ,
समझता हूँ लेकिन  ,
समझना नहीं चाहता मैं ,
प्यार भरी नज़रों की ,
तुम्हारी उस भाषा को ! !
छुप सकती नहीं ,
मन की कोमल भावनाएं  ,
जानते हैं हम दोनों !!
मत आना मेरे करीब तुम  ,
भरे हुए हैं ,
अनगिनत कांटे ,
दामन में मेरे ,
हैं नाज़ुक उंगलियां तुम्हारी  ,
कहीं चुभ न जाए ,
शूल कोई उनको ! !
किसी को देने को कोई फूल  ,
लाल पीला या गुलाबी  ,
नहीं पास मेरे ,
कभी नहीं मिल पाएंगे  ,
हम तोड़ कर ,
दुनिया के सारे बंधनों को ,
बस आंखों ही आंखों में  ,
करते रहें बात हम ,
ख़ामोशी से यूं ही करें  ,
हर दिन मुलाक़ात हम !!

Friday, 21 September 2012

ख़त ( कविता ) 2 3 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

फिर मिलें हम दुआ करते थे ,
जब कभी ख़त लिखा करते थे !
प्यार करते हमें तुम कितना  ,
यूं कभी कह दिया करते थे !
ख्वाब जैसी बना इक दुनिया ,
खुद वहां रह लिया करते थे !
रूठ जाना मनाते रहना ,
और क्या हम किया करते थे !
दूर से देखते रहते पर ,
पास हों जब हया करते थे !
प्यार में रख दिये जो हमने ,
नाम अच्छे लगा करते थे !
ख़त हमें रोज़ लिखना "तनहा"  ,
कौन मुझको कहा करते थे !            

Thursday, 20 September 2012

भाग्य लिखने वाले ( कविता ) 3 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

विधाता हो तुम ,
लिखते हो ,
सभी का भाग्य  ,
जानता नहीं कोई ,
क्या लिख दिया तुमने ,
किसलिए ,
किस के भाग्य में  ! !
सब को होगी तमन्ना ,
अपना भाग्य ,
जानने की ,
मुझे नहीं जानना ,
क्या क्यों लिखा तुमने  ,
मेरे नसीब में लेकिन ,
कहना है तुमसे यही  ! !
भूल गये लिखना ,
वही शब्द क्यों  ,
करना था प्रारम्भ जिस से ,
लिखना नसीबा मेरा !!
तुम चाहे जो भी ,
लिखो किसी के भाग्य में  ,
याद रखना,
हमेशा ही लिखना एक शब्द ,
प्यार ,मुहब्बत ,स्नेह ,प्रेम !!
मर्ज़ी है तुम्हारी दे दो चाहे  ,
जीवन की सारी खुशियां ,
या उम्र  भर केवल तड़पना ,
मगर लिख देना ,
सभी के भाग्य में  ,
अवश्य यही एक शब्द ,
प्यार ,प्यार सिर्फ प्यार !!

काल्पनिक संसार ( कविता ) 3 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

दर्द भरे गीत ,
पुरानी फ़िल्में  ,
कुछ  कहानियां ,
कविताएं ,
ग़ज़लें ,
लगती हैं मुझे अच्छी  ! !
उस काल्पनिक संसार के ,
कई  नायक ,
नायिका ,
बन गए हैं ,
मेरे लिए एक आदर्श  ,
खोजता हूं उनको ,
अपने आस पास जीवन में  ! !
क्योंकि उन सब में  ,
आती है नज़र मुझे झलक ,
प्यार ,
सदभावना व ,
मानवता के आदर्शों की !!
अपने रिश्तों की ,
वास्तविक दुनिया में  ,
नहीं खोज पाते ,
हम जिन्हें कभी ,
बस करते रह जाते हैं ,
सदा उनकी तलाश !!
काश हमें मिल जाते  ,
कविता,
कहानी और पुरानी फिल्मों ,
के पात्रों जैसे ,
लोग वास्तविक जीवन में भी !!

बंधन मुक्त ( कविता ) 3 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बंधन मुक्त ( कविता )
खोने के लिए जब  ,
कुछ नहीं बचा ,
सता रहा है फिर डर ,
किस बात का  ! !
रही नहीं जब तमन्ना  ,
कुछ भी पाने की ,
होना है जब मुक्त ,
सभी बंधनों से ,
घबराता है ,
फिर क्यों मन !!
अपने ही बुने ,
सारे बंधनों को छोड़  ,
जीवन के ,
अंतिम छोर पर ,
करना है प्रयास ,
कुछ बचे हुए पल  ,
इस तरह जीने का ,
मिल पाए जिसमें ,
मुझे भी आनंद ,
खुली हवा में साँस लेने का !!  

Wednesday, 19 September 2012

दोहरा चरित्र ( व्यंग्य कविता ) भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

दोहरा चरित्र ( कविता )
खबर घोटालों की ,
हर दिन  नई ,
सबको सुनाते हैं ,
उन्हीं का साथ भी भाए ,
कभी घर उनके जाते हैं ,
कभी घर पर उनको बुलाते हैं।
उन्हीं का ही बस सहारा है ,
नहीं उन बिन गुज़ारा है ,
सच क्या है ,
झूठ कितना  ,
रूपये का खेल सारा है ,
सदा रहते बड़े भूखे  ,
विज्ञापन जिनका चारा है।
चोर चोर चिल्लाते हैं ,
देशद्रोही बताते हैं ,
सुबह शाम ,
उन्हीं के दर पे  ,
हाज़िरी खुद लगाते हैं।
कहो उनसे ज़रा सोचें ,
हैं क्या ,
वो क्या खुद को दिखाते हैं ,
हमें कितना बताते हैं  ,
कहां कितना छुपाते हैं।
है बेदाग़ क्या उनका  दामन  ,
दाग़ सबके जो दिखाते हैं। 

दुर्घटना ( कविता ) 3 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                                                         दुर्घटना  (  कविता  )
जब घटी थी ,
दुर्घटना मेरे साथ ,
दोनों ही खड़ी थी ,
तब मेरे ही पास  ! !
उन्हें इतना करीब से ,
देखा था मैंने ,
पहली बार ,
डरा नहीं था ,
नियति को ,
कर लिया था स्वीकार !!
मगर तभी ,
ख़ामोशी से ,
प्यार और अपनेपन से ,
अपनी आगोश में ,
भर लिया था ,
मुझे ज़िंदगी ने !!
मुझे कहना चाहती हो जैसे ,
तुम्हें बहुत चाहती हूँ मैं !!
और लौट गई थी मौत ,
चुप चाप ,
हार कर ज़िंदगी से ,
तब मुझे हुआ था एहसास ,
कितना कम है फासला ,
मौत और ज़िंदगी के बीच !!!

कवि नहीं मर सकता ( हास्य व्यंग्य कविता ) 7 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

                                             कवि नहीं मरता ( हास्य कविता )
चला रहे हो कविवर शब्दों के तुम तीर ,
आखिर कब समझोगे श्रोताओं की पीर !
कविता से अनजान थे लोग ,
बस कवि से परेशान थे लोग ,
क्या क्या कहता है जाने ,
सुन सुन कर हैरान थे लोग ,
कविता से बच न पाते ,
कुछ ऐसे नादान थे लोग !
खुद ही बुला आए उसको ,
अब जिससे परेशान थे लोग  !
कविताओं से लगता डर ,
वो भी आखिर इंसान थे लोग  ,
उनको भाता नहीं था कवि  ,
पर कवि के दिलोजान थे लोग !!
कवि ने मरने का भी कई बार इरादा किया ,
लेकिन हर बार फिर जीने का वादा किया !
कवि की हर कविता फटा हुआ थी ढोल ,
खोलती थी रोज़ ही किसी न किसी की पोल !
कवि ने भाईचारे पर कविता एक सुनाई  ,
हो गई जिससे घर घर में थी लड़ाई ,
बाढ़ में डूबे हुए थे कितने तब घर ,
जब लिखी कवि ने कविता सूखे पर ,
कविता बरसात से बरसा ऐसा पानी ,
आ गई तब याद हर किसी को नानी !!!
धर्म निरपेक्षता समझा कर लिया कवि ने पंगा ,
भड़क उठा उस दिन साम्प्रदायिक दंगा !
प्रेम रोग पर कविता क्या सुनाई ,
कई नवयुवकों ने थी कन्या कोई भगाई !
झेल रहे थे सभी जब सूखे की मार ,
शीर्षक तब था कविता का बसंत बहार !
सुन ख़ुशी के अवसर पर उसकी कविता धांसू ,
निकलने लगे श्रोताओं के आंसू !!
इतनी लम्बी कविता उसने इक दिन सुनाई ,
मुर्दा भी उठ बोला बस भी करो भाई !!
श्रोताओं पर कवि ने सितम बड़े ही ढाए ,
जिसके बदले में उसने जूते चप्पल पाए !!
कहीं से इक दिन लहर ख़ुशी की आई ,
कवि के मरने की वो खबर जो पाई  ,
कवि की मौत का सब जश्न मना रहे थे  ,
बड़े दिनों के बाद सारे मुस्कुरा रहे थे ,
उसने फिर से आ सब को डराया ,
जिन्दा जब वापस कवि लौट आया !!
प्यार करते मुझसे समझ लिया कवि ने ,
दुखी देखा जब सबको वहां कवि ने !!
सब ने मिलकर कहा करो इतना वादा ,
कविता तब सुनाना जब हो मरने का इरादा ,
तेरे मरने की अच्छी खबर थी आई ,
तेरे साथ हम सब की होती भलाई ,
अपनी ख़ुशी का ये राज़ जब सबने खोला ,
मैं नहीं अभी मरने वाला तब कवि था बोला !!
कवि मरा ये जानकर खुश न होना कोय ,
कवि मरा तब मानिये जिस दिन तेहरवां होय !!

Tuesday, 18 September 2012

ग़ज़ल 1 4 5 ( कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है )

कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है ,
करें क्या ज़िंदगी की बात कहना भी ज़रूरी है !
मिले हैं आज हम ऐसे नहीं बिछुड़े कभी जैसे ,
सुहानी शब मुहब्बत की हुई बरसात पूरी है !
मिले फुर्सत चले जाना , कभी उनको बुला लेना ,
नहीं घर दोस्तों के दूर , कुछ क़दमों की दूरी है !
बुरी आदत रही अपनी सभी कुछ सच बता देना ,
तुम्हें भाती हमेशा से किसी की जीहजूरी है !
रहा भूखा नहीं जब तक कभी ईमान को बेचा ,
लगा बिकने उसी के पास हलवा और पूरी है !
जिन्हें पाला कभी माँ ने , लगाते रोज़ हैं ठोकर ,
इन्हीं बच्चों को बचपन में खिलाई रोज़ चूरी है !
नहीं काली कमाई कर सके "तनहा" कभी लेकिन ,
कमाते प्यार की दौलत , न काली है न भूरी है !

ग़ज़ल 1 4 0 ( सभी को दास्ताँ अपनी बयाँ करना नहीं आता )

सभी को दास्तां अपनी बयां करना नहीं आता ,
कभी आता नहीं लिखना , कभी पढ़ना नहीं आता !
बड़ी ऊंची उड़ाने लोग भरते हैं , मगर सोचें ,
जमीं पर आएंगे कैसे अगर गिरना नहीं आता !
कभी भी मांगने से मौत दुनिया में नहीं मिलती ,
हमें जीना ही पड़ता है ,अगर मरना नहीं आता !
सभी से आप कहते हैं बहुत ही तेज़ है चलना ,
कभी उनको सहारा दो , जिन्हें चलना नहीं आता !
हमें सूली चढ़ा दो अब ,  हमारी आरज़ू है ये ,
यही कहना हमें है पर, हमें कहना नहीं आता !
न जाने किस तरह दुनिया ख़ुशी को ढूंढ़ लेती है ,
हमें सब लोग कहते हैं कि खुश रहना नहीं आता !
तमाशा बन गये "तनहा" , तमाशा देखने वाले ,
तमाशा मत कभी देखो , अगर बनना नहीं आता !

ग़ज़ल 1 2 4 ( क्या बतायें तुम्हें लोग क्या हो गये )

क्या बतायें तुम्हें लोग क्या हो गये  ,
आदमी थे वो सब जो खुदा हो गये  !
सब हमारा ये अंजाम देखा किये ,
हम हमेशा नई इब्तिदा हो गये  !                               ( इब्तिदा = शुरुआत )
क्या हुआ था हमें , हम नहीं जानते ,
बस उन्हें देख कर हम फ़िदा हो गये  !
जब सुनाने लगे हम कहानी नई ,
छोड़ महफ़िल सभी अलविदा हो गये  !
हर नज़र आपको देखती रह गई ,
आप सब को लुभाती अदा हो गये  !
उनकी नज़रों के सब जाम पीते रहे ,
वो पिलाते रहे मयकदा हो गये  !                        ( मयकदा =शराबखाना )
जिनको आया नहीं मांगने का हुनर ,
अनसुनी रह गई इक सदा हो गये  !                           ( सदा =प्रार्थना )
खुद बनाया कभी था हसीं कारवां ,
छोड़ कर खुद ही "तनहा" जुदा हो गये  !

ग़ज़ल 1 1 9 ( बेचते झूठ सच के नाम पर )

बेचते झूठ सच के नाम पर ,
बिक गये खुद भी पूरे दाम पर !
कल थे क्या आज क्या हैं हो गये  ,
लोग हैरान इस अंजाम पर !
पी गये खुद उठा कर हम ज़हर ,
नाम अपना लिखा था जाम पर !
ढूंढने पर भी मिलते जो नहीं ,
आ गये  खुद ही देखो बाम पर !
भेजना वन में सीता को पड़ा ,
राम जाने जो बीती राम पर !
हम शिकायत कहां जा कर करें ,
हो रहे ज़ुल्म खासो-आम पर !
इस तरह जी रहा "तनहा" कभी ,
सुबह रोया करेगी शाम पर !

Monday, 17 September 2012

ग़ज़ल 9 6 ( मिलने को दुनिया में क्या न मिला )

मिलने को दुनिया में क्या न मिला ,
मझधार में नाखुदा न मिला !
सब को दिखाई थी राह मगर ,
मंज़िल का अपनी पता न मिला !
हमने बनाये थे घर तो कई ,
इक दिन हमें आसरा न मिला !
ढूंढा किताबों में हमने बहुत ,
जीने का पर फलसफा न मिला !
चलता रहे साथ साथ मिरे ,
अब तक वही हमनवा न मिला !
मिल के रहें लोग सब जिस में ,
उस घर का "तनहा" पता न मिला !

ग़ज़ल 8 7 ( सरकार है बेकार है लाचार है )

सरकार है बेकार है लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है !
फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है !
रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है !
जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है !
इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है !
हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है !
ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है !
है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है !
अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है !

Sunday, 16 September 2012

ग़ज़ल 8 6 ( पूछा उन्हें जाना किधर चाहते हैं )

पूछा उन्हें जाना किधर चाहते हैं ,
कहने लगे बनना खबर चाहते हैं !
जिस आशियां को बेच डाला कभी था ,
अब फिर वही प्यारा सा घर चाहते हैं !
इस शहर की करते शिकायत सभी से ,
आ कर यहीं रहना मगर चाहते हैं !
कुछ भी नहीं चाहा किसी से कभी भी ,
बस धूप  में कोई शजर चाहते हैं !      ( शजर ::: पेड़ )
मांगें जो मिल जाये वही ज़िंदगी से ,
सब लोग कुछ ऐसा हुनर चाहते हैं !
खोना पड़ेगा आपको कुछ तो पहले ,
पाना यहां सब कुछ अगर चाहते हैं !
मिलते ही जैसे पा लिया था सभी कुछ ,
"तनहा" वही पहला असर चाहते हैं !

ग़ज़ल 8 5 ( लोग कहते हैं कुछ , सोचते और हैं )

लोग कहते हैं कुछ , सोचते और हैं ,
हर किसी के हुए यूं अजब तौर हैं !
जा रहे हैं किधर ,कुछ न आता नज़र ,
समझ आता नहीं ,क्या नये दौर हैं !
इन मशीनों से जाने किसे क्या मिला ,
छिन गये कुछ गरीबों से बस कौर हैं !
भूख से मर रहे लोग कैसे जियें  ,
क्या कभी आप सब कर रहे गौर हैं !
बात दस्तूर की जब हो कहते नहीं ,
बन गए किसलिये आप सिरमौर हैं !
अब सभी पूछते हैं पता आपका ,
कुछ तो "तनहा" कहो अब कहां ठौर हैं !

ग़ज़ल 7 4 ( प्यार भरे कुछ जाम रखे हैं )

प्यार भरे कुछ जाम रखे हैं ,
आज तुम्हारे नाम रखे हैं !
जिनको खरीद सका न ज़माना ,
अब खुद ही बेदाम रखे हैं !
पत्थर चलने की खातिर भी ,
शीशे वाले मुकाम रखे हैं !
खुद ही अपनी रुसवाई के ,
हमने चरचे आम रखे हैं  !
जिन पर बातें दिल की लिखीं हैं ,
ख़त वो सभी बेनाम रखे हैं !
घर पर जा कर देखो "तनहा" ,
राज़ कई खुले-आम रखे हैं  !

ग़ज़ल 3 6 ( जो देश में हो वो होने दो )

जो देश में हो वो होने दो ,
पहरेदारों को सोने दो !
कानून उधर काम अपना करे ,
अपराध इधर कुछ होने दो !
लोग उनको झुक के सलाम करें ,
ये नशा भी उनको होने दो !
तब होगा बचाव का काम शुरू ,
घर बाढ़ को और डुबोने दो !
वो कुछ न हकीक़त जान सकें ,
ख्वाबों में उन्हें तो खोने दो !
रहने दो न क़त्ल का कोई निशां ,
उन्हें खून के धब्बे धोने दो !
क्यों फ़िक्र है इतनी जनता की ,
जनता रोती है , रोने दो   !

Saturday, 15 September 2012

ग़ज़ल 1 2 2 ( बस यही इक करार बाकी है )

बस यही इक करार बाकी है ,
मौत का इंतज़ार बाकी है  !
खेलने को सभी खिलाड़ी हैं ,
पर अभी जीत हार बाकी है !
दिल किसी का अभी धड़कता है ,
आपका इख्तियार बाकी है !
मय पिलाई कभी थी नज़रों से ,
आज तक भी खुमार बाकी है !
दोस्तों में वफ़ा कहां बाकी ,
बस दिखाने को प्यार बाकी है !
साथ देते नहीं कभी अपने ,
इक यही एतबार बाकी है  !
हारना मत कभी ज़माने से ,
अब तलक आर पार बाकी है !
लोग सब आ गये जनाज़े पर ,
बस पुराना वो यार बाकी है  !
चैन आया कहां अभी "तनहा" ,
कुछ दिले-बेकरार बाकी है  !

कलाकृति ( कविता ) 3 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

राह में पड़ा हो ,
कहीं कोई पत्थर बेजान ,
हर कोई लगा जाता ,
ठोकर उसको  ,
इतराता कितना है देखो ,
ताकत पर अपनी इंसान ! !
उठा कर राह के पत्थर को  ,
ले आना घर अपने कभी तुम ,
तराशना उस पत्थर को ,
अपने हाथों से  ,
देना नई उसको ,
इक पहचान  ! !
देखो करके ये भी काम  ,
मूरत बन जाए ,
जब वो पत्थर ,
कोमल कोमल हाथ तुम्हारे  ,
खुरदरे हो जाएं  ,
और लगें दुखने  ,
सुबह से हो जाए जब शाम  ,
देना तुम तब उसे कोई नाम  ! !
करना फिर खुद से सवाल  ,
जिसे लगाई थी सुबह ठोकर  ,
शाम होते झुका क्यों है  ,
उसी के सामने ही तुम्हारा सर !!

ग़ज़ल 1 5 5 ( अनबुझी इक प्यास हैं )

अनबुझी इक प्यास हैं ,
बन चुके इतिहास हैं !
जब बराबर हैं सभी ,
कुछ यहां क्यों ख़ास हैं  !
जुगनुओं को देख लो ,
रौशनी की आस हैं !
कह रहा खुद आसमां ,
हम जमीं के पास हैं  !
नाम उनका है खिज़ा ,
कह रहे मधुमास हैं  !       
लोग हर युग में रहे ,
झेलते बनवास हैं  !
हादिसे आने लगे ,
अब हमें कुछ रास हैं !
बेटियां बनने लगी ,
सास की अब सास हैं !
कह रहे "तनहा" किसे ,
हम तुम्हारे दास हैं  !

Friday, 14 September 2012

सहमा हुआ है बचपन ( कविता ) 3 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

उसे ढूंढती रहेंगी ,
मेरी नज़रें ,
शायद अब वो ,
आए न कभी नज़र ,
छुप गया है कहीं ! !
अपने घर गया है ,
अथवा गया स्कूल ,
क्या मालूम  ! !
अभी अभी ,
थोड़ी देर पहले ,
मेरे घर के सामने ,
पार्क के कोने में,
बैठा था ,
सहमा हुआ लगता ,
वो छोटा सा इक बच्चा ! !
पहने हुए स्कूल की वर्दी ,
नंगे पांव ,
पीठ पर लादे  ,
किताबों का बोझ ,
बुलाने पर ,
चाहता था सबसे  ,
दूर भाग जाना ,
मानों डरता हो ,
हमारी दुनिया से ! !
गया था मैं उसके पास  ,
करना चाहता था ,
बातें उससे ,
जानना चाहता था ,
उसकी परेशानी ! !
शायद कुछ कर सकूं  ,
उसके लिए  ,
मगर खामोश रहा  ,
मेरी हर बात पर ,
नहीं दिया था ,
मेरे किसी सवाल का ,
कोई भी जवाब ,
क्यों डरा हुआ है मुझसे ,
इस सारे समाज से  ,
निराश ,
अकेला ,
बेसहारा ,
 देश का ये नन्हा बचपन !!

Thursday, 13 September 2012

गीत प्यार का गुनगुनाऊं कैसे ( गीत ) 21 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

                                                     (   गीत प्यार का गुनगुनाऊं )
गीत प्यार का गुनगुनाऊं कैसे !
लोग पूछते हैं तुम्हारी बातें /
याद कौन रखता हमारी बातें /
आसमां पे तुमने बसाया है घर /
मैं तुम्हें ज़मीं पर बुलाऊं कैसे !
गीत प्यार का ......................
खुद से खुद को जब दूर करना चाहा /
और ग़म से घबरा के मरना चाहा /
मौत ने मुझे किस तरह ठुकराया /
आज वो कहानी सुनाऊं कैसे !
गीत प्यार का ........................
छोड़ कर मुझे लोग धीरे धीरे /
चल दिए कहीं और धीरे धीरे /
साथ साथ चलने के वादे भूले /
रूठ कर चले जब मनाऊं कैसे !
गीत प्यार का .....................
कब वफ़ा निभाई यहां दुनिया ने /
हर रस्म उठाई यहां दुनिया ने /
जिस्म भी हुआ और दिल भी घायल /
ज़ख्म आज सारे दिखाऊं कैसे !
गीत प्यार का गुनगुनाऊं कैसे !!

आंधियां चलती रहीं , दीप जलता ही रहा ( गीत ) 7 ( डॉ लोक सेतिया )

                                                (   दीप जलता ही रहा  )
आंधियां चलती रहीं ,दीप जलता ही रहा !
ज़िंदगी के फासले कम कभी हो न सके /
दर्द तो मिलते रहे हम मगर रो न सके /
ग़म से पैमाना भरा जब न खाली हो सका /
वो समंदर बन गया बस उछलता ही रहा !
आंधियां चलती ........................
पूछते सब से रहे आपका हम तो पता /
है हमारा ख्वाब कोई तो देता ये बता /
छोड़ कर हम कारवां आ गए खुद ही यहां /
इक सफ़र था ज़िंदगी जो कि चलता ही रहा !
आंधियां चलती ...........................
जब किसी ने साथ छोड़ा ,नहीं कुछ भी कहा /
शुक्रिया आपका आपने जो भी दिया /
जब भी वो देता रहा जाम भर भर के हमें /
जाम हाथों से मेरे बस फिसलता ही रहा !
आंधियां चलती ............................
पास हमको लोग सारे बुलाते तो रहे /
और हम रस्मे वफा कुछ निभाते तो रहे /
दिल हमारा तोड़ डाला किसी ने जब भी /
आंसुओं का एक सागर निकलता ही रहा !
आंधियां चलती रहीं ,दीप जलता ही रहा !!
              

Wednesday, 12 September 2012

ग़ज़ल 1 1 1 ( दर्द अपने हमें क्यों बताये नहीं )

दर्द अपने हमें क्यों बताये  नहीं ,
दर्द दे दो हमें ,हम पराये  नहीं !
आप महफ़िल में अपनी बुलाते कभी ,
आ तो जाते मगर ,बिन बुलाये  नहीं !
चारागर ने हमें आज ये कह दिया ,
किसलिए वक़्त पर आप आये नहीं !
लौट कर आज हम फिर वहीं आ गये  ,
रास्ते भूल कर भी भुलाये  नहीं !
खूबसूरत शहर आपका है मगर ,
शहर वालों के अंदाज़ भाये  नहीं !
हमने देखे यहां शजर ऐसे कई ,
नज़र आते कहीं जिनके साये  नहीं !
साथ "तनहा" के रहना है अब तो हमें ,
उनसे जाकर कहो दूर जाये  नहीं !
                    ( चारागर :::: डॉक्टर )          ( शजर ::::: पेड़ )

ग़ज़ल 8 2 ( सपने हमारे सच अगर होते नहीं )

सपने हमारे सच अगर होते नहीं ,
हम मुस्कुराते हैं कभी रोते नहीं !
हैं तीरगी से प्यार करने लग गये ,
अब रात भर कुछ लोग हैं सोते नहीं !
हो राह ग़म की या ख़ुशी की हो डगर ,
बस ज़िंदगी में नाखुदा होते नहीं !
तुम मत समझ लेना उसे इक बागबां ,
जो फूल चुनते हैं मगर बोते नहीं !
जीना यहीं है और मरना भी यहीं ,
पर ज़िंदगी में और समझौते नहीं !
"तनहा" रहो आज़ाद उनकी कैद से ,
जैसे भी हो, अपनी खुदी खोते नहीं !
                ( तीरगी :::::अंधेरा  )         (  नाखुदा :::::::: कश्ती वाला )

Tuesday, 11 September 2012

जय भ्रष्टाचार की ( हास्य व्यंग्य कविता ) 4 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

है अपना तो साफ़ विचार
है लेन देन ही सच्चा प्यार !
वेतन है दुल्हन , तो रिश्वत है दहेज
दाल रोटी संग जैसे अचार !
मुश्किल है रखना परहेज़
रहता नहीं दिल पे इख्तियार !!
यही है राजनीति का कारोबार
जहां विकास वहीं भ्रष्टाचार  !
सुबह की तौबा शाम को पीना
हर कोई करता बार बार  !
याद नहीं रहती तब जनता
जब चढ़ता सत्ता का खुमार !!
हो जाता इमानदारी से तो
हर जगह बंटाधार  !
बेईमानी के चप्पू से ही
आखिर होता बेड़ा पार !
भ्रष्टाचार देव की उपासना
कर सकती सब का उध्धार !!
तुरन्त दान है महाकल्याण
नौ नकद न तेरह उधार  !
इस हाथ दे उस हाथ ले ,
इसी का नाम है एतबार  !
गठबंधन है सौदेबाज़ी ,
जिससे बनती हर सरकार !!

भगवान की वर्कशॉप ( हास्य कविता ) 3 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

होली का था वो त्यौहार ,
भंग का चढ़ा हुआ था खुमार ,
जा पहुंचा मैं उस पार ,
जहां चल रहा अजब था कारोबार ! !
प्रभु तो करते थे विश्राम ,
कारीगर बना रहे थे इन्सां  हज़ार ,
हाथ पैर सर का लेबल लगे ,
मसाले रखे थे नम्बरवार ! !
बोला इक कारीगर , अब थक गया ,
बना दिए आज कई हज़ार ,
प्रभु बोले और बनाओ तुम  ,
धरती पर हैं अभी दरकार ! !
यूं जल्दी की गड़बड़ में  ,
बना कोई बेवकूफ कोई समझदार ,
एक बैच ऐसा बन गया  ,
लगा जाएगा मसाला बेकार ! !
बुलाकर प्रभु को दिखलाया ,
देखो ये क्या हुआ सरकार ,
कुछ दिमाग बन गए जरा बड़े ,
खोपड़ी में जाने से करते इनकार  ! !
प्रभु बोलो कोई बात नहीं ,
करो इनके सरों का भी विस्तार ,
यूं ही नहीं अब ये मानेंगे  ,
इनको बना दो तुम साहित्यकार ,
कुछ लेखक और कवि बना दो ,
शायर कुछ बाकी पत्रकार  ! !
सुन कर प्रभु के शुभ विचार ,
खोपड़ी में जाने को हुए दिमाग तैयार ,
देखा था छिपकर मैंने ,
जब हो रहा था ये चमत्कार ! !
प्रभु ने बुलाया मुझे अपने पास ,
कहा प्यार से ,सुन बरखुरदार ,
मैं नहीं करता इंसानों का  ,
करता क्यों इन्सान मेरा कारोबार ,
इंसानियत का सबक नहीं पढ़ते ,
बने हुए धर्म के ठेकेदार !!

Monday, 10 September 2012

ग़ज़ल 1 5 4 ( जिधर देखो सभी लगते अकेले )

जिधर देखो सभी लगते अकेले ,
न जाने क्या हुए दुनिया के मेले !
नहीं चलती हमारी चाल कोई ,
कभी हमने कई थे खेल खेले !
तुम्हारा प्यार मांगा था तुम्हीं से ,
सितम कितने ज़माने भर के झेले !
कभी पाए बिना मांगे थे मोती ,
मिले हैं आज बस मिट्टी के ढेले !
तुम्हें दिल आज कोई दे गया है ,
अमानत आज दिल अपना भी दे ले !
ज़माना बेचता है ख्वाब कितने ,
हकीकत कुछ नहीं सब ख्वाब से ले !
बहुत डर लग रहा है आज "तनहा" ,
ज़रा हाथों में मेरा हाथ ले ले  !

Sunday, 9 September 2012

राजा नंगा है ( व्यंग्य कविता ) 6 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

भ्रष्टाचार की बहती गंगा है ,
लेकिन प्रधान मंत्री चंगा है  !
सत्यमेव जयते का इक नारा ,
देखो दीवार पे टंगा है  !
सब मंत्री निर्वस्त्र हुए  ,
खुद राजा तक भी नंगा है !!
पैसे ने किया बस अंधा है ,
देशभक्ति उनका धंधा है !
लोहा बेचा, खाया कोयला ,
कैसा फ़हराया झंडा है !
बिकते नेता  सरकार बिकी ,
काम आता उनका चंदा है !!
फस गई सरकार बेचारी है ,
चेहरे पर कालिख कारी है !
सीखा नहीं लेकिन घबराना ,
जब चोरों से ही यारी है !
अब दाग़ सभी लगते अच्छे ,
बेची सब शर्म हमारी है  !!
सच को हम नहीं छिपाते हैं ,
हम अपना धर्म निभाते हैं  !
घोटालों की  ख़बरों को बस ,
कुछ छोटा कर दिखलाते हैं  !
मुखप्रष्ट की खबर को हम  ,
कहीं भीतर छपवाते हैं ! !

ग़ज़ल 2 9 ( चल रहे हैं धूप में छाया करो )

चल रहे हैं धूप में छाया करो ,
गेसुओं को हमपे लहराया करो !
जैसे सूरज को छिपाती है घटा ,
उस तरह आंचल का तुम साया करो !
और भी हो जाएंगे पत्ते हरे ,
प्यार की शबनम से नहलाया करो !
प्यास के मारों को तुम झरना बनो ,
यूं न दरिया बन के बह जाया करो !
तिनके चुन चुन कर बने हैं घौंसले ,
बिजलियो उनपर तरस खाया करो !

ग़ज़ल 1 7 ( झूठ को सच करे हुए हैं लोग )

झूठ को सच करे हुए हैं लोग ,
बेज़ुबां कुछ डरे हुए हैं लोग !
नज़र आते हैं चलते फिरते से ,
मन से लेकिन मरे हुए हैं लोग !
उनके चेहरे हसीन हैं लेकिन ,
ज़हर अंदर भरे हुए हैं लोग  !
गोलियां दागते हैं सीनों पर ,
बैर सबसे करे हुए हैं लोग !
शिकवा उनको है क्यों ज़माने से ,
खुद ही बिक कर धरे हुए हैं लोग !
जितना उनके करीब जाते हैं ,
उतना हमसे परे हुए हैं लोग  !

ग़ज़ल 1 5 ( अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे )

अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे ,
बिन बुलाये-से हम एक मेहमान थे !
रख दिये  इक कली के मसल कर सभी ,
फूल बनने के उसके जो अरमान थे !
था तआरूफ तो कुछ और ही आपका ,
अपना क्या हम तो सिर्फ एक इंसान थे !
हम समझ कर गये थे उन्हें आईना ,
वो तो अपनी ही सूरत पे कुर्बान थे !
ग़म ज़माने के लिखते रहे उम्र भर ,
खुद जो एहसास-ए-ग़म से भी अनजान थे !
आदमी नाम हमने उन्हें दे दिया ,
आदमी की जो सूरत में शैतान थे !
महफिलों से निकाला बुला कर हमें ,
कद्रदानों के हम पर ये एहसान थे !  

ग़ज़ल 1 0 ( सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था )

सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था ,
कोई भी अब तो पहला-सा नहीं था !
गिला इसका नहीं बदला ज़माना ,
मगर वो शख्स तो ऐसा नहीं था !
खिला इक फूल तो बगिया में लेकिन ,
जो हमने चाहा था वैसा नहीं था !
न पूछो क्या हुआ ,भगवान जाने ,
मैं कैसा था कि मैं कैसा नहीं था !
जो देखा गौर से उस घर को मैंने ,
लगा मुझको ,वो घर जैसा नहीं था ! 

Saturday, 8 September 2012

मैं नहीं था ऐसा कभी ( कविता ) 3 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

आज लिख रहा है ,
रंगबिरंगे फूलों से ,
रौशनी की किरणों से ,
हमारी कहानी कोई  ! !
उसे क्या मालूम ,
पाए हैं हमने तो कांटे,
जीवन भर ! !
छाया रहा ,
हमारी ज़िंदगी पर ,
सदा इक घना अंधेरा है ,
पल पल जीवन का ,
गुज़रा है इस तरह ,
सर्द रातें खुले गगन में,
काटे कोई जिस तरह ! !
कभी किया नहीं,
हमने ज़िक्र तक किसी से ,
अपने दुःख दर्द,
अपनी परेशानियों का  ! !
सफलता , ख़ुशी ,
रही बहुत दूर हमसे ,
मगर दुनिया वाले ,
कहते रहे,
हमें मुक्कदर का सिकंदर ! !
बना रहा हमारा चित्र ,
है वो चित्रकार जो ,
मिला ही नहीं ,
कभी हमें जीते जी ,
ये मेरी जीवन कथा ,
ये चित्र  ,
दोनों हैं किसी की ,
सुंदर कल्पनाएं  ,
नहीं है इनमें ,
कोई सच्चाई   ! !
हां देखा हो शायद ,
ऐसा सपना कभी मैंने ,
किसी दिन ,
अपना दिल ,
बहलाने को ! !

मुझ बिन ( कविता ) 3 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब होता है,
किसी के ,
होने का एहसास ,
समझ आता है ,
न होने का एहसास !
जब नहीं होता है ,
कोई पास ,
लगता है तब ,
कि था कितना करीब ,
जब मिला करते थे रोज़ ,
होती न थी  ,
कभी बातचीत भी,
कहते हैं अब ,
मिले हो तुम ,
कितनी मुद्दत के बाद !!
कल पूछा था उसने ,
क्या छोड़ दिया लिखना ,
बीत गये बहुत दिन,
पढ़े हुए कहानी कोई   ! !
ढूंढते रहे थे,
उस दिन ,
मुशायरे में तुम्हें ,
सुन लेते कोई ग़ज़ल ,
फिर तुमसे ! !
लिखता रहा जब तक ,
नहीं कहा था कभी उसने ,
हमसे ,
लगता है अच्छा ,
तुम्हें पढ़ना ,
सुनाया करता था जब ,
सुनना चाहता था ,
कहां कोई मुझे ! !
न होना मेरा लग रहा है ,
बेहतर मेरे होने से ,
आज कोई देखता ही नहीं मुझे ,
मेरे बाद होंगी ,
शायद बातें मेरी ,
कोई किसी दिन,
कहेगा किसी से ,
कभी होता था यहां,
मुझ सा भी कोई इंसान ! !

बस बहुत हो चुका ( कविता ) 2 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कोई ,
तथाकथित ईश्वर ,
धर्म गुरु ,
कोई पूजास्थल ,
अब नहीं करेंगे ,
निर्णय ,
सही और गलत का  ! !
स्वर्ग या मोक्ष ,
की चाह ,
नर्क की सज़ा ,
का डर,
कर नहीं सकेंगे ,
विवश मुझे !
अब चलना होगा ,
सही मार्ग पर मुझे ,
छोड़ सब बातें ,
धर्मों की  !!
समाज के दोहरे मापदंड ,
हित अहित ,
मान अपमान की चिंता ,
रोक नहीं पाएंगे ,
मुझे अब कभी     ! !
बस बहुत हो चुका ,
जी सकूंगा कब तक ,
आडंबर के सहारे ! !
मुझे चलना होगा ,
उस राह पर ,
जिस पर चलना चाहे ,
मेरा मन ,
मेरी आत्मा ,
फिर चाहे जो भी हो !
कोई अन्तर्द्वंद ,
कोई ग्लानि ,
कोई पश्चाताप ,
सत्य और झूठ का ,
पुण्य और पाप का ,
अच्छाई और बुराई का ,
नहीं अब रहा बाकी  ! !
तय करेगा ,
केवल मेरा विवेक ,
और चलना है अब मुझे,
उसी मार्ग पर ,
जिसे सही मानता हूं मैं ,
मन से आत्मा से ! !

Friday, 7 September 2012

लिखे पत्र तुम्हारे नाम दोस्त ( कविता ) 2 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

लिखता रहा ,
नाम तुम्हारे ,
प्रतिदिन मैं पत्र ,
अकेला था जब भी ,
और था ,
बहुत उदास मेरा मन , 
तब नहीं था कोई ,
जो सुनता मेरी बात ,
मैं लिखता रहा ,
बेनाम पत्र  तुम्हारे नाम।
जानता नहीं  ,
नाम पता तुम्हारा ,
मालूम नहीं रहते हो ,
किस नगर की ,
किस गली में तुम दोस्त।
मगर सभी सुख दुःख अपने ,
खुशियां और परेशानियां ,
लिखता रहा सदा तुम्हीं को ,
तलाश भी करता रहा तुम्हें।
फिर आज दिल ने चाहा ,
तुमसे बात करना ,
और मैं लिख रहा हूँ  ,
फिर पत्र नाम तुम्हारे।
सोचता हूँ शायद तुम भी ,
करते हो ऐसा ही मेरी तरह ,
लिखते हो ,
मेरे लिए पत्र तुम भी ,
मिलेंगे हम अवश्य ,
कभी न कभी ,
तो जीवन में ,
और पहचान लेंगे ,
इक दूजे को।
तुम तब पढ़ लेना  ,
मेरे ये सभी पत्र ,
और मुझे दे देना ,
इनके वो जवाब ,
जो लिखते हो ,
तुम प्रतिदिन ,
सिर्फ मेरे लिये  ,
मेरे दोस्त। 

बड़े लोग ( कविता ) 5 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

बड़े लोग बड़े छोटे होते हैं ,
कहते हैं कुछ ,
समझ आता है और ,
आ मत जाना ,
इनकी बातों में ,
मतलब इनके बड़े खोटे होते हैं ! !
इन्हें पहचान लो ,
ठीक से आज ,
कल तुम्हें ये ,
नहीं पहचानेंगे,
किधर जाएं ये ,
खबर क्या है ,
बिन पैंदे के ये लोटे होते हैं ! !
दुश्मनी से ,
बुरी दोस्ती इनकी ,
आ गए हैं ,
तो खुदा खैर करे,
ये वो हैं जो ,
क़त्ल करने के बाद ,
कब्र पे आ के रोते होते हैं ! !

Thursday, 6 September 2012

संगीत से शोर होने तक ( कविता ) 2 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कभी जब गलियों से ,
गुज़रते हैं  ,
बहुत सारे बच्चे ,
मिल कर एक साथ , 
करते हैं कई आवाज़ें ,
हम सुन नहीं पाते ,
बोल उनके फिर भी ,
समझ लेते हैं हम ,
उनकी ख़ुशी ,
उनकी मस्ती ,
भाता है हम सभी को ,
उन बच्चों का उल्लास ,
भर जाती है ,
हमारे जीवन में ,
नई उमंग ,
देख कर मुस्कुराता बचपन ,
हमें मधुर संगीत सी लगती हैं ,
तब उन बच्चों की आवाज़ें।
डराता है मगर ,
हमें वो कोलाहल ,
जो गूंजता है ,
गाँव गाँव ,
शहर शहर ,
गली गली ,
सभाओं में ,
व्याख्यानों  में ,
बांटता है जो  ,
इंसानों को ,
अपने स्वार्थ की खातिर ,
कभी धर्म,
कभी भाषा ,
कभी क्षेत्रवाद ,
के नाम पर ,
नफरत का ज़हर ,
फैलाता हुआ ,
भर जाता है ,
एक घुटन सी ,
हमारे जीवन में।
खो जाता है ,
जाने कहां ,
बचपन  का ,
मधुर वो संगीत ,
बड़े होने पर ,
क्यों बन जाता है बस ,
इक शोर ,
अच्छा होता ,
दुनिया में सब ,
होते बच्चे ,
अच्छे अच्छे।  

काश ( कविता ) 2 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

चले जाते हैं ,
प्रतिदिन हम लोग ,
मंदिर,
मस्जिद,
गुरुद्वारे,
गिरजा घर!
करते हैं प्रार्थना ,
सुन लेते हैं ,
बातें धर्मों  की ,
झुका कर अपना सर  !
और मान लेते हैं,
कि प्रसन्न ,
हो गया है ईश्वर ,
हमारे स्तुतिगान से !
मगर कभी जब कहीं ,
कोई देता है ,
दिखाई हमें ,
दुःख में,
निराशा में ,
घबरा कर ,
आंसू बहाता हुआ ,
तब हम ,
चुरा लेते हैं नज़रें ,
और गुज़र जाते हैं ,
कुछ दूर हटकर !
हमारी आस्था ,
हमारा धर्म ,
जगा नहीं पाता ,
हमारे मन में ,
मानवता के ,
दर्द के एहसास को !
काश !
कह पाता  ,
ईश्वर तब हमें ,
व्यर्थ है हमारा  ,
उसके दर पे आना !

Wednesday, 5 September 2012

ग़ज़ल 9 1 ( लिखी फिर किसी ने कहानी वही है )

लिखी फिर किसी ने कहानी वही है ,
मुहब्बत की हर इक निशानी वही है !
सियासत में देखा अजब ये तमाशा ,
नया राज है और रानी वही है !
हमारे जहां में नहीं कुछ भी बदला ,
वही चोर , चोरों की नानी वही है !
जुदा हम न होंगे जुदा तुम न होना ,
हमारे दिलों ने भी ठानी वही है  !
कहां छोड़ आये हो तुम ज़िंदगी को ,
बुला लो उसे ज़िंदगानी वही है !
खुदा से ही मांगो अगर मांगना है ,
भरे सब की झोली जो दानी वही है !
घटा जम के बरसी , मगर प्यास बाकी ,
बुझाता नहीं प्यास , पानी वही है  ! 

ग़ज़ल 1 5 3 ( हर हकीकत हुई इक फसाना है )

हर हक़ीकत हुई इक फसाना है ,
बस रहा चार दिन हर ज़माना है !
प्यार करने का दस्तूर इतना है ,
डूब जाये जिसे पार जाना है !
हो रहे ज़ुल्म कितने ज़मीं पर हैं ,
आसमां के खुदा को बताना है !
याद रखना उसे जो किया हमसे ,
एक दिन आ के वादा निभाना है !
जा रहे हम नये इक सफ़र पर हैं ,
फिर जहां से नहीं लौट पाना है !
भेजना ख़त नहीं अब मुझे कोई ,
ठौर अपना न कोई ठिकाना है !
प्यार में हर किसी को यही लगता ,
उनसे नाता बहुत ही पुराना है !
कुछ बताओ हमें क्या करें यारो ,
आज रूठे खुदा को मनाना है !
बांटता ही नहीं दर्द को "तनहा" ,
पास उसके यही बस खज़ाना है !

Sunday, 2 September 2012

आँखों देखा हाल ( हास्य व्यंग्य कविता ) 2 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

सुबह बन गई थी जब रात ,
ये है उस दिन की बात !
सांच को आ गई थी आंच  ,
दो और दो बन गए थे पांच !
कत्ल हुआ सरे बाज़ार  ,
मौका ए वारदात से ,
पकड़ कातिलों को ,
कोतवाल ने ,
कर दिया चमत्कार !
तब शुरू हुआ ,
कानून का खेल  ,
भेज दिया अदालत ने  ,
सब मुजरिमों को सीधा जेल !
अगले ही दिन ,
कोतवाल को ,
मिला ऊपर से ऐसा संदेश ,
खुद उसने माँगा  ,
अदालत से ,
मुजरिमों की रिहाई का आदेश !
कहा अदालत से ,
कोतवाल ने ,
हैं हम ही गाफ़िल  ,
है कोई और ही कातिल !
किया अदालत ने ,
सोच विचार  ,
नहीं कोतवाल का ऐतबार ,
खुद रंगे हाथ  ,
उसी ने पकड़े  कातिल  ,
और बाकी रहा क्या हासिल !
तब पेश किया कोतवाल ने  ,
कत्ल होने वाले का बयान  ,
जिसमें तलवार को  ,
लिखा गया था म्यान !
आया न जब  ,
अदालत को यकीन  ,
कोतवाल ने बदला  ,
पैंतरा नंबर तीन  !
खुद कत्ल होने वाले को ही  ,
अदालत में लाया गया  ,
और लाश से ,
फिर वही बयान दिलवाया गया !
मुझसे हो गई थी ,
गलत पहचान  ,
तलवार नहीं हज़ूर  ,
है ये म्यान   ,
मैंने तो देखी ही नहीं कभी तलवार ,
यूँ कत्ल मेरा तो  ,
होता है बार बार  ,
कहने को आवाज़ है मेरा नाम  ,
मगर आप ही बताएं  ,
लाशों का बोलने से क्या काम !
हो गई अदालत भी लाचार  ,
कर दिये बरी सब गुनहगार  ,
हुआ वही फिर इक बार ,
कोतवाल का कातिलों से प्यार !
झूठ मनाता रहा जश्न  ,
सच को कर के दफन  ,
इंसाफ बेमौत मर गया ,
मिल सका न उसे कफन !

श्रधान्जली सभा ( कविता ) 1 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया ) हास्य-व्यंग्य

टेड़ा है बहुत  ,
स्वर्ग और नर्क का सवाल  ,
सुलझाएं जितना इसे  ,
उजझता जाता है जाल।
आपको दिखलाता हूं  ,
मैं आंखों देखा हाल  ,
देखोगे इक दिन आप भी  ,
मैंने जो देखा कमाल।
बहुत भीड़ थी स्वर्ग में  ,
बड़ा बुरा वहां का हाल  ,
छीना झपटी मारा मारी ,
और बेढंगी थी चाल।
नर्क को जाकर देखा  ,
कुछ और ही थी उसकी बात  ,
दिन सुहाना था वहां  ,
और शांत लग रही रात।
पूछा था भगवान से  ,
स्वर्ग और नर्क हैं क्या  ,
और उसने मुझे  ,
ये सब कुछ दिया था दिखा।
घबराने लगा जब मैं  ,
थाम कर तब मेरा हाथ  ,
बतलाई थी भगवान ने  ,
तब मुझे सारी बात !
श्रधांजली सभा होती है  ,
सब के मरने के बाद  ,
सब मिल कर जहां  ,
करते हैं मुझसे फ़रियाद ,
स्वर्ग लोक में दे दूं  ,
सबको मैं कुछ स्थान  ,
बेबस हो गया हूं मैं  ,
अपने भगतों की बात मान।
शोक सभाओं में  ,
ऐसा भी कहते हैं लोग  ,
स्वर्ग लोक को जाएगा  ,
आये  हैं जो इतने लोग।
देखकर शोकसभाओं की भीड़  ,
घबरा जाता हूँ मैं  ,
मुझको भी होने लगा है  ,
लोकतंत्र सा कोई रोग।
कहां जाना चाहते हो  ,
सब से पूछते हैं हम  ,
नर्क नहीं मांगता कोई  ,
जगह स्वर्ग में है कम।
नर्क वालों के पास  ,
है बहुत ही स्थान  ,
वहां रहने वालों की  ,
है अलग ही शान  ,
रहते हैं वहां  ,
सब अफसर डॉक्टर वकील  ,
बात बात पर देते हैं  ,
वे कोई नई दलील।
करवा ली हैं बंद मुझसे  ,
नर्क की सब सजाएं  ,
देकर रोज़ मानवाधिकारों की दुआएं।
बना ली है नर्क वालों ने  ,
अपनी दुनिया रंगीन  ,
मांगने पर स्वर्ग वालों को  ,
मिलती नहीं ज़मीन।
नर्क ने बनवा ली हैं ,
ऊंची ऊंची दीवारें  ,
स्वर्ग में लगी हुई हैं  ,
बस कांटेदार तारें ,
नर्क में ही रहते हैं  ,
सब के सब बिल्डर  ,
स्वर्ग में बन नहीं सकता कोई भी घर !
स्वर्ग नर्क से दूर भी  ,
बैठे थे कुछ नादान  ,
फुटपाथ पे पड़ा हुआ था  ,
जिनका सामान ,
उन्हें नहीं मिल सका था  ,
दोनों जगह प्रवेश  ,
जो रहते थे पृथ्वी पर  ,
बन कर खुद भगवान !
किया था भगवान ने  ,
मुझसे वही सवाल  ,
स्वर्ग नर्क या है बस ,
मुक्ति का ही ख्याल !
कहा मैंने तब सुन लो  ,
ए दुनिया के तात  ,
दोहराता हूँ मैं आज  ,
एक कवि की बात।
मुक्ति दे देना तुम  ,
गरीब को भूख से  ,
दिला सको तो दिला दो  ,
मानव को घृणा से मुक्ति ,
और नारी को  ,
दे देना मुक्ति अत्याचार से  ,
मुझे जन्म देते रहना  ,
बार बार इनके निमित !
मित्रो ,
मेरे लिये  स्वर्ग की  ,
प्रार्थना मत करना  ,
न ही कभी मेरी  ,
मुक्ति की तुम दुआ करना ,
मेरी इस बात को  ,
तब भूल मत जाना  ,
मेरी श्रधांजली सभा में  ,
जब भी आना !

ग़ज़ल 8 0 ( इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का )

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का ,
अब तो होने लगा कारोबार सच का !
हर गली हर शहर में देखा है हमने ,
सब कहीं पर सजा है बाज़ार सच का !
ढूंढते हम रहे उसको हर जगह , पर ,
मिल न पाया कहीं भी दिलदार सच का !
झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर ,
बिन बिका रह गया था अंबार सच का !
अब निकाला जनाज़ा सच का उन्होंने ,
खुद को कहते थे जो पैरोकार सच का !
कर लिया कैद सच , तहखाने में अपने ,
और खुद बन गया पहरेदार सच का !
सच को ज़िन्दा रखेंगे कहते थे सबको ,
कर रहे क़त्ल लेकिन हर बार सच का !
हो गया मौत का जब फरमान जारी ,
मिल गया तब हमें भी उपहार सच का !
छोड़ जाओ शहर को चुपचाप "तनहा" ,
छोड़ना गर नहीं तुमने प्यार सच का  !

Saturday, 1 September 2012

ग़ज़ल 7 7 ( अपनी मज़बूरी बतायें कैसे )

अपनी मज़बूरी बतायें कैसे ,
ज़ख्म दिल के हैं दिखायें कैसे !
आशियाने में हमें रहना है ,
अपना घर खुद ही जलायें कैसे !
छोड़ आये हम जिसे यूँ ही कभी ,
अब उसी घर खुद ही जायें कैसे !
एक मुर्दा जिस्म हैं अब हम तो ,
अब दवा खायें तो खायें कैसे !
नाम जिसका ख़ामोशी रखना है ,
दास्तां सब को सुनायें कैसे !
दर्द दे कर भूल जाता हो जो ,
उस सितमगर को बुलायें कैसे !
जब नहीं बाकी रहा ताल्लुक ही ,
बोझ यादों का उठायें  कैसे !
जो सुनानी हो उसी को "तनहा" ,
ग़ज़ल महफ़िल में सुनायें कैसे  !

ग़ज़ल 7 3 ( जिन के ज़हनों में अँधेरा है बहुत )

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ,
दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत !
एक बंजारा है वो , उसके लिये ,
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत !
उसका कहने को भी कुछ होता नहीं ,
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत !
जो बना फिरता मुहाफ़िज़ कौम का ,
जानते सब हैं , लुटेरा है बहुत !
राज़ "तनहा" जानते हैं लोग सब ,
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत  !

ग़ज़ल 7 2 ( दिल अपना किसी को दिखायें तो कैसे )

दिल अपना किसी को दिखायें तो कैसे ,
है वीरान कितना बतायें तो कैसे !
करें किस से जिक्र अपनी बरबादियों का ,
ये इल्ज़ाम खुद पर लगायें तो कैसे !
जो मांगें खुदाई तो मिल जाये वो भी ,
हम उस तक रसाई भी पायें तो कैसे !
भुलाना जिसे चाहते हैं सदा हम ,
उसी दास्तां को सुनायें तो कैसे !
नज़र आपकी जब खुदा हो गई है ,
हम अपनी निगाहें चुरायें तो कैसे !
वहां जा के हम और होते हैं "तनहा" ,
तो हम उनकी महफ़िल में जायें तो कैसे !

वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो ( व्यंग्य कविता ) 5 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो ,
आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो !
जो सुनी नहीं कभी हो ,वही सुनाई लिखो ,
कहानी पुरानी मगर ,नई बनाई लिखो !
क़त्ल शराफ़त का हुआ ,लिखो बधाई लिखो ,
निकले जब कभी अर्थी ,उसे विदाई लिखो !
सच लिखे जब भी कोई ,कलम घिसाई लिखो ,
मोल विरोध करने का, बस दो पाई लिखो !
बदलो शब्द रिश्वत का ,बढ़ी कमाई लिखो ,
पाक करेगा दुश्मनी ,उसको भाई लिखो !
देखो गंदगी फैली ,उसे सफाई लिखो ,
नहीं लगी दहलीज पर ,कोई काई लिखो !
पकड़ लो पांव उसी के ,यही भलाई लिखो ,
जिसे बनाया था खुदा ,नहीं कसाई लिखो !