Saturday, 1 September 2012

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत
दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत।

एक बंजारा है वो , उसके लिये
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत।

उसका कहने को भी कुछ होता नहीं
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत।

जो बना फिरता मुहाफ़िज़ कौम का
जानते सब हैं , लुटेरा है बहुत।

राज़ "तनहा" जानते हैं लोग सब
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत।

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