Wednesday, 5 September 2012

हर हक़ीक़त हुई इक फ़साना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हर हक़ीक़त हुई इक फ़साना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हर हक़ीकत हुई इक फसाना है
बस रहा चार दिन हर ज़माना है।

प्यार करने का दस्तूर इतना है
डूब जाये जिसे पार जाना है।

हो रहे ज़ुल्म कितने ज़मीं पर हैं
आसमां के खुदा को बताना है।

याद रखना उसे जो किया हमसे
एक दिन आ के वादा निभाना है।

जा रहे हम नये इक सफ़र पर हैं
फिर जहां से नहीं लौट पाना है।

भेजना ख़त नहीं अब मुझे कोई
ठौर अपना न कोई ठिकाना है।

प्यार में हर किसी को यही लगता
उनसे नाता बहुत ही पुराना है।

कुछ बताओ हमें क्या करें यारो
आज रूठे खुदा को मनाना है।

बांटता ही नहीं दर्द को "तनहा"
पास उसके यही बस खज़ाना है।

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