Wednesday, 12 September 2012

सपने हमारे सच अगर होते नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सपने हमारे सच अगर होते नहीं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सपने हमारे सच अगर होते नहीं
हम मुस्कुराते हैं कभी रोते नहीं।

हैं तीरगी से प्यार करने लग गये
अब रात भर कुछ लोग हैं सोते नहीं।

हो राह ग़म की या ख़ुशी की हो डगर
बस ज़िंदगी में नाखुदा होते नहीं।

तुम मत समझ लेना उसे इक बागबां
जो फूल चुनते हैं मगर बोते नहीं।

जीना यहीं है और मरना भी यहीं
पर ज़िंदगी में और समझौते नहीं।

"तनहा" रहो आज़ाद उनकी कैद से
जैसे भी हो, अपनी खुदी खोते नहीं।

( तीरगी :::::अंधेरा  )         (  नाखुदा :::::::: कश्ती वाला )

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