Friday, 28 September 2012

देश-समाज के दौर पर तीन नज़्में - डॉ लोक सेतिया

  जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जो भूला लोकतंत्र आचार 
हुई सत्ता की जय जयकार।

चुना था जिनको हमने , वही
बिके हैं आज सरे-बाज़ार।

लुटा कर सब कुछ भी अपना
बचा ली है उसने सरकार।

टांक तो रक्खे हैं लेबल
मूल्य सारे ही गए हैं हार।

देखिए उनकी कटु-मुस्कान
नहीं लगते अच्छे आसार।

कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं।

वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं।

हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं।

ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं।

लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं।

बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया


बेदिली से दुआ की है
तुमने भारी खता की है।

मारकर यूं ज़मीर अपना
खुद से तुमने जफ़ा की है।

बढ़ गया है मरज़ कुछ और
ये भी कैसी दवा की है।

तुम सज़ा दो गुनाहों की
हमने ये इल्तिज़ा की है।

बिक गये चन्द सिक्कों में
बात शर्मो-हया की है। 

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