Wednesday, 19 September 2012

दोहरा चरित्र ( व्यंग्य कविता ) भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

दोहरा चरित्र ( कविता )
खबर घोटालों की ,
हर दिन  नई ,
सबको सुनाते हैं ,
उन्हीं का साथ भी भाए ,
कभी घर उनके जाते हैं ,
कभी घर पर उनको बुलाते हैं।
उन्हीं का ही बस सहारा है ,
नहीं उन बिन गुज़ारा है ,
सच क्या है ,
झूठ कितना  ,
रूपये का खेल सारा है ,
सदा रहते बड़े भूखे  ,
विज्ञापन जिनका चारा है।
चोर चोर चिल्लाते हैं ,
देशद्रोही बताते हैं ,
सुबह शाम ,
उन्हीं के दर पे  ,
हाज़िरी खुद लगाते हैं।
कहो उनसे ज़रा सोचें ,
हैं क्या ,
वो क्या खुद को दिखाते हैं ,
हमें कितना बताते हैं  ,
कहां कितना छुपाते हैं।
है बेदाग़ क्या उनका  दामन  ,
दाग़ सबके जो दिखाते हैं। 

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