Sunday, 9 September 2012

अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ  लोक सेतिया "तनहा"

अपने हो कर भी हम से वो अनजान थे
बिन बुलाये-से हम एक मेहमान थे।

रख दिये  इक कली के मसल कर सभी
फूल बनने के उसके जो अरमान थे।

था तआरूफ तो कुछ और ही आपका
अपना क्या हम तो सिर्फ एक इंसान थे।

हम समझ कर गये थे उन्हें आईना
वो तो अपनी ही सूरत पे कुर्बान थे।

ग़म ज़माने के लिखते रहे उम्र भर
खुद जो एहसास-ए-ग़म से भी अनजान थे।

आदमी नाम हमने उन्हें दे दिया
आदमी की जो सूरत में शैतान थे।

महफिलों से निकाला बुला कर हमें
कद्रदानों के हम पर ये एहसान थे।   

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