Sunday, 30 December 2012

ग़ज़ल 1 7 0 ( और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ) - लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी - लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ,
बस सलामत रहे दोस्ती हमारी।

ग़म किसी के सभी हो गए हमारे ,
और उसकी ख़ुशी अब ख़ुशी हमारी।

अब नहीं मांगना और कुछ खुदा से ,
झूमने लग गई ज़िंदगी हमारी।

क्या पिलाया हमें आपकी नज़र ने ,
ख़त्म होती नहीं बेखुदी हमारी।

याद रखनी हमें आज की घड़ी है ,
जब मुलाक़ात हुई आपकी हमारी।

आपके बिन नहीं एक पल भी रहना ,
अब यही बन गई बेबसी हमारी।

जाम किसने दिया भर के आज "तनहा" ,
और भी बढ़ गई तिश्नगी हमारी।  

Saturday, 29 December 2012

ग़ज़ल 7 6 ( नहीं कभी रौशन नजारों की बात करते हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं ,
जो टूट जाते उन सितारों की बात करते हैं।

हैं कर रही बरबादियां हर तरफ रक्स लेकिन ,
चलो खिज़ाओं से बहारों की बात करते हैं।

वो लोग सच को झूठ साबित किया करें बेशक ,
जो रोज़ आ के हमसे नारों की बात करते हैं।

वो जानते हैं हुस्न वालों की हर हकीकत को ,
उन्हीं के कुछ टूटे करारों की बात करते हैं।

गुलों से करते थे कभी गुफ्तगू बहारों की ,
जो बागबां खुद आज खारों की बात करते हैं।

हुआ हमारे साथ क्या है ,किसे बतायें अब ,
सभी तो नज़रों के इशारों की बात करते हैं।

जिसे नहीं आया अभी तक ज़मीं पे चलना ही ,
वही ज़माने के सहारों की बात करते हैं।

जो नाखुदा कश्ती को मझधार में डुबोते हैं ,
उन्हीं से "तनहा" क्यों किनारों की बात करते हैं।

ग़ज़ल 7 5 ( प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ) - लोक सेतिया "तनहा"

प्यार की बात मुझसे वो करने लगा - लोक सेतिया "तनहा"

प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ,
दिल मेरा क्यों न जाने था डरने लगा।

मिल के हमने बनाया था इक आशियां ,
है वही तिनका तिनका बिखरने लगा।

दीनो-दुनिया को भूला वही प्यार में ,
जब किसी का मुकद्दर संवरने लगा।

दर्दमंदों की सुन कर के चीखो पुकार ,
है फ़रिश्ता ज़मीं पे उतरने लगा।

जो कफ़स छोड़ उड़ने को बेताब था ,
पर सय्याद उसी के कतरने लगा।

था जो अपना वो बेगाना लगने लगा ,
जब मुखौटा था उसका उतरने लगा।

उम्र भर साथ देने की खाई कसम ,
खुद ही "तनहा" मगर अब मुकरने लगा। 

Friday, 28 December 2012

ग़ज़ल 1 6 9 ( बहाने अश्क जब बिसमिल आये ) - लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये - लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये  ,
सभी कहने लगे पागल आये।

हुई इंसाफ की बातें लेकिन ,
ले के खाली सभी आंचल आये।

सभी के दर्द को अपना समझो ,
तुम्हारी आंख में भर जल आये।

किसी की मौत का पसरा मातम ,
वहां सब लोग खुद चल चल आये।

भला होती यहां बारिश कैसे ,
थे खुद प्यासे जो भी बादल आये।

कहां सरकार के बहते आंसू ,
निभाने रस्म बस दो पल आये।

संभल के पांव को रखना "तनहा" ,
कहीं सत्ता की जब दलदल आये।

ग़ज़ल 11 0 ( हमको जीने के सब अधिकार दे दो ) - लोक सेतिया "तनहा"

 हमको जीने के सब अधिकार दे दो - लोक सेतिया "तनहा"

हमको जीने के सब अधिकार दे दो ,
मरने की फिर सज़ा सौ बार दे दो।

अब तक सारे ज़माने ने रुलाया ,
तुम हंसने के लिए दिन चार दे दो।

पल भर जो दूर हमसे रह न पाता ,
पहले-सा आज इक दिलदार दे दो।

बुझ जाये प्यास सारी आज अपनी ,
छलका कर जाम बस इक बार दे दो।

पर्दों में छिप रहे हो किसलिये तुम ,
आकर खुद सामने दीदार दे दो।

दुनिया ने दूर हमको कर दिया था ,
रहना फिर साथ है इकरार दे दो।

दिल देने आज "तनहा" आ गया है ,
ले लो दिल और दिल उपहार दे दो। 

ग़ज़ल 1 0 6 ( हमको मिली सौगात है ) - लोक सेतिया "तनहा"

 हमको मिली सौगात है   - लोक सेतिया "तनहा"

हमको मिली सौगात है ,
अश्कों की जो बरसात है।

होती कभी थी चांदनी ,
अब तो अंधेरी रात है।

जब बोलती है खामोशी ,
होती तभी कुछ बात है।

पीता रहे दिन भर ज़हर ,
इंसान क्या सुकरात है।

होने लगी बदनाम अब ,
इंसानियत की जात है।

रोते सभी लगती अगर ,
तकदीर की इक लात है।

"तनहा" कभी जब खेलता ,
  देता सभी को मात है।

Thursday, 27 December 2012

ग़ज़ल 1 0 4 ( जब हुई दर्द से जान पहचान है ) - लोक सेतिया "तनहा"

 जब हुई दर्द से जान पहचान है - लोक सेतिया "तनहा"

जब हुई दर्द से जान पहचान है ,
ज़िंदगी तब हुई कुछ तो आसान है।

क़त्ल होने लगे धर्म के नाम पर ,
मुस्कुराने लगा देख हैवान है।

कुछ हमारा नहीं पास बाकी रहा ,
दिल भी है आपका आपकी जान है।

चार दिन ही रहेगी ये सारी चमक ,
लग रही जो सभी को बड़ी शान है।

लोग अब ज़हर को कह रहे हैं दवा ,
मौत का ज़िंदगी आप सामान है।

उम्र भर कारवां जो बनाता रहा ,
रह गया खुद अकेला वो इंसान है।

हम हुए आपके, आके "तनहा" कहें ,
बस अधूरा यही एक अरमान है।  

Sunday, 23 December 2012

अलविदा पुरातन स्वागतम नव वर्ष ( कविता ) 7 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अलविदा पुरातन , स्वागतम नव वर्ष ( कविता ) लोक सेतिया

अलविदा पुरातन वर्ष ,
ले जाओ साथ अपने ,
बीते वर्ष की सभी ,
कड़वी यादों को ,
छोड़ जाना पास हमारे ,
मधुर स्मृतियों के अनुभव।

करना है अंत ,
तुम्हारे साथ ,
कटुता का देश समाज से ,
और करने हैं समाप्त  ,
सभी गिले शिकवे ,
अपनों बेगानों से ,
अपने संग ले जाना ,
स्वार्थ की प्रवृति को ,
तोड़ जाना जाति धर्म ,
ऊँच नीच की सब दीवारें।
 
इंसानों को बांटने वाली ,
सकुंचित सोच को मिटाते जाना  ,
ताकि फिर कभी लौट कर ,
वापस न आ सकें ये कुरीतियां ,
तुम्हारी तरह ,
जाते हुए वर्ष ,
अलविदा।

स्वागतम नूतन वर्ष  ,
आना और अपने साथ लाना ,
समाज के उत्थान को ,
जन जन के कल्याण को ,
स्वदेश के स्वाभिमान को ,
आकर सिखलाना सबक हमें ,
प्यार का भाईचारे का ,
सत्य की डगर पर चलकर ,
सब साथ दें हर बेसहारे का ,
जान लें भेद हम लोग ,
खरे और खोटे का ,
नव वर्ष ,
मिटा देना आकर ,
अंतर ,
तुम बड़े और छोटे का।  

Saturday, 22 December 2012

ग़ज़ल 1 0 1 ( रुक नहीं सकता जिसे बहना है ) - लोक सेतिया "तनहा"

रुक नहीं सकता जिसे बहना है - लोक सेतिया "तनहा"

रुक नहीं सकता जिसे बहना है ,
एक दरिया का यही कहना है।

मान बैठे लोग क्यों कमज़ोरी ,
लाज औरत का रहा गहना है।

क्या यही दस्तूर दुनिया का है ,
पास होना दूर कुछ रहना है।

बांट कर खुशियां ज़माने भर को ,
ग़म को अपने आप ही सहना है।

बिन मुखौटे अब नहीं रह सकते ,
कल उतारा आज फिर पहना है।

साथ दोनों रात दिन रहते हैं ,
क्या गरीबी भूख की बहना है।

ज़िंदगी "तनहा" बुलाता तुझको ,
आज इक दीवार को ढहना है। 

ग़ज़ल 9 9 ( उसको न करना परेशान ज़िंदगी )

 उसको न करना परेशान ज़िंदगी - लोक सेतिया "तनहा" 

उसको न करना परेशान ज़िंदगी ,
टूटे हुए जिसके अरमान ज़िंदगी।

होने लगा प्यार हमको किसी से जब ,
करने लगे लोग बदनाम ज़िंदगी।

ढूंढी ख़ुशी पर मिले दर्द सब वहां ,
जायें किधर लोग नादान ज़िंदगी।

रहने को सब साथ रहते रहे मगर ,
इक दूसरे से हैं अनजान ज़िंदगी।

होती रही बात ईमान की मगर ,
आया नज़र पर न ईमान ज़िंदगी।

सब ज़हर पीने लगे जान बूझ कर ,
होने लगी देख हैरान ज़िंदगी।

शिकवा गिला और "तनहा" न कर अभी ,
बस चार दिन अब है महमान ज़िंदगी। 

Friday, 21 December 2012

ग़ज़ल 9 7 ( गये भूल हम जिंदगानी की बातें ) - लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें - लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें ,
सुनाते रहे बस कहानी की बातें।

तराशा जिन्हें हाथ से खुद हमीं ने ,
हमें पूछते अब निशानी की बातें।

गये डूब जब लोग गहराईयों में ,
तभी जान पाये रवानी की बातें।

रही याद उनको मुहब्बत हमारी ,
नहीं भूल पाये जवानी की बातें।

हमें याद सावन की आने लगी है ,
चलीं आज ज़ुल्फों के पानी की बातें।

गये भूल देखो सभी लोग उसको ,
कभी लोग करते थे नानी की बातें।

किसी से भी "तनहा" कभी तुम न करना ,
कहीं भूल से बदगुमानी की बातें। 

ग़ज़ल 6 0 ( शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है ) - लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है  - लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है ,
उनसे मिला दर्द लगता इनायत है।

जीने ही देते न मरने ही देते हैं ,
ये इश्क वालों की कैसी रिवायत है।

करना अगर प्यार ,कर के निभाना तुम ,
देता सभी को वो , इतनी हिदायत है।

बस आखिरी जाम भर कर अभी पी लें ,
उसने हमें आज दे दी रियायत है।

जिनको हमेशा ही तुम लूटते रहते ,
उनसे ही जाकर के मांगी हिमायत है।

आगाज़ देखा न अंजाम को जाना ,
"तनहा" यही तो सभी की हिकायत है।

Tuesday, 18 December 2012

ग़ज़ल 1 6 8 ( जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ) - लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर - लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ,
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर।

यही काम करता रहा है ज़माना ,
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर।

गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  ,
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर।

वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है ,
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर।

किसी ने लगाया है काला जो टीका ,
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर।

भरोसे का मतलब नहीं जानते जो ,
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर।

रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" ,
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर।

Friday, 14 December 2012

ग़ज़ल 1 6 7 ( दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये ) - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये - लोक सेतिया "तनहा"

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये  ,
और क्या चाहिये शायरी के लिये।

उसके आंसू बहे , ज़ख्म जिसको मिले ,
कौन रोता भला अब किसी के लिये।

जी न पाये मगर लोग जीते रहे ,
सोचते बस रहे ख़ुदकुशी के लिये।

शहर में आ गये गांव को छोड़ कर ,
अब नहीं रास्ता वापसी के लिये।

इस ज़माने से मांगी कभी जब ख़ुशी ,
ग़म हज़ारों दिये इक ख़ुशी के लिये।

तब बताना हमें तुम इबादत है क्या ,
मिल गया जब खुदा बंदगी के लिये।

आप अपने लिए जो न "तनहा" किया ,
आज वो कर दिया अजनबी के लिये।     

Thursday, 6 December 2012

ग़ज़ल 3 2 ( क्या अजब हादिसा हो गया ) - लोक सेतिया "तनहा"

क्या अजब हादिसा हो गया - लोक सेतिया "तनहा"

क्या अजब हादिसा हो गया ,
झूठ सच से बड़ा हो गया।

कश्तियां डूबने लग गई ,
नाखुदाओ ये क्या हो गया।

सच था पूछा ,बताया उसे ,
किसलिये फिर खफ़ा हो गया।

साथ रहने की खा कर कसम ,
यार फिर से जुदा हो गया।

राज़ खुलने लगे जब कई ,
ज़ख्म फिर इक नया हो गया।

हाल अपना   , बतायें किसे ,
जो हुआ , बस हुआ , हो गया।

देख हैरान "तनहा" हुआ ,
एक पत्थर खुदा हो गया।

ग़ज़ल 9 ( आपके किस्से पुराने हैं बहुत ) - लोक सेतिया "तनहा"

आपके किस्से पुराने हैं बहुत - लोक सेतिया "तनहा"

आपके किस्से पुराने हैं बहुत ,
सुन रखे ऐसे फसाने हैं बहुत।

बेमुरव्वत तुम अकेले ही नहीं ,
आजकल के दोस्ताने हैं बहुत।

वक़्त को कोई बदल पाया नहीं ,
वक़्त ने बदले ज़माने हैं बहुत।

हो गये दो जिस्म यूं तो एक जां ,
फासले अब भी मिटाने हैं बहुत।

दब गये ज़ख्मों की सौगातों से हम ,
और भी अहसां उठाने हैं बहुत।

मिल न पाये ज़िंदगी के काफ़िये ,
शेर लिख लिख कर मिटाने हैं बहुत।

फिर नहीं शायद कभी मिल पायेंगे  ,
आज "तनहा" पल सुहाने हैं बहुत। 
 

Wednesday, 5 December 2012

ग़ज़ल 8 ( पूछते सब ये क्या हो गया ) - लोक सेतिया "तनहा"

पूछते सब ये क्या हो गया - लोक सेतिया "तनहा"

पूछते सब ये क्या हो गया ,
बोलना तक खता हो गया।

आदमी बन सका जो नहीं ,
कह रहा मैं खुदा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से ,
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।

भीख लेने लगे लगे आजकल  ,
इन अमीरों को क्या हो गया।

नाज़ जिसकी  वफाओं पे था ,
क्यों वही बेवफा हो गया।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे ,
काबिले बद-दुआ हो गया।

कुछ न "तनहा" उन्हें कह सका ,
खुद गुनाहगार-सा हो गया। 

ग़ज़ल 1 6 6 ( कश्ती वही साहिल वही तूफाँ वही हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

 कश्ती वही साहिल वही तूफ़ां वही हैं - लोक सेतिया "तनहा"

कश्ती वही साहिल वही तूफां वही हैं ,
खुद जा रहे मझधार में नादां वही हैं।

हम आपकी खातिर ज़माना छोड़ आये  ,
दिल में हमारे अब तलक अरमां वही हैं।

कैसे जियें उनके बिना कोई बताओ ,
सांसे वही धड़कन वही दिल जां वही हैं।

सैलाब नफरत का बड़ी मुश्किल रुका था ,
आने लगे फिर से नज़र सामां वही हैं।

हालात क्यों बदले हुए आते नज़र हैं ,
जब रह रहे दुनिया में सब इन्सां वही हैं।

दामन छुड़ा कर दर्द से कुछ चैन पाया ,
फिर आ गये वापस सभी महमां वही हैं।

करने लगे जो इश्क आज़ादी से "तनहा" ,
इस वतन पर होते रहे कुरबां वही हैं।

Tuesday, 4 December 2012

ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ( नज़्म ) 4 3 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

 ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ( नज़्म ) लोक सेतिया 

ख्यालों में रह रह के आये जाये कोई ,
तसव्वुर में आ आ के मुस्काये कोई।

सराहूं मैं किस्मत को ,जो पास मेरे ,
कभी खुद से घबरा के आ जाये कोई।

वो भूली सी , बिसरी हुई सी कहानी ,
हमें याद आये , जो दोहराये कोई।

ठहर जाए जैसे समां खुशनुमां सा ,
मेरे पास आ कर ठहर जाये कोई।

किसी गुलसितां में खिलें फूल जैसे ,
खबर हमको ऐसी सुना जाये कोई। 

Monday, 3 December 2012

ग़ज़ल 4 4 ( बेवफा हमको कह गये होते )

बेवफ़ा हमको कह गये होते ,
हम ये इल्ज़ाम सह गये होते !
बहते मौजों के साथ पत्थर भी ,
जो न साहिल पे रह गये होते !
ग़म भी हमको सकून दे जाता ,
हंस के उसको जो सह गये होते !
ज़ेब देते किसी के दामन को ,
अश्क जो यूं न बह गये होते !
यूं न हम राह देखते उनकी ,
जो न आने को कह गये होते !
थाम लेते कभी उसे बढ़कर ,
दूर "तनहा" न रह गये होते !

Thursday, 29 November 2012

ग़ज़ल 1 6 5 ( गाँव अपना छोड़ कर , हम पराये हो गये ) - लोक सेतिया "तनहा"

 गांव अपना छोड़ कर हम पराये हो गये - लोक सेतिया "तनहा"

गांव  अपना छोड़ कर , हम  पराये हो गये  ,
लौट कर आए मगर बिन  बुलाये हो गये।

जब सुबह का वक़्त था लोग कितने थे यहां ,
शाम क्या ढलने लगी ,  दूर साये हो गये।

कर रहे तौबा थे अपने गुनाहों की मगर  ,
पाप का पानी चढ़ा फिर नहाये  हो गये।

डायरी में लिख रखे ,पर सभी खामोश थे ,
आपने आवाज़ दी , गीत गाये  हो गये।

हर तरफ चर्चा सुना बेवफाई का तेरी ,
ज़िंदगी क्यों  लोग तेरे सताये  हो गये।

इश्क वालों से सभी लोग कहने लग गये  ,
देखना गुल क्या तुम्हारे खिलाये हो गये।

दोस्तों की दुश्मनी का नहीं "तनहा" गिला ,
बात है इतनी कि सब आज़माये  हो गये। 

Wednesday, 28 November 2012

ग़ज़ल 1 6 4 ( हाल अच्छा क्यों रकीबों का है ) - लोक सेतिया "तनहा"

हाल अच्छा क्यों रकीबों का है - लोक सेतिया "तनहा"

हाल अच्छा क्यों रकीबों का है ,
ये भी शिकवा कुछ अदीबों का है।

मिल रहा सब कुछ अमीरों को क्यों ,
हक बराबर का गरीबों का है।

मांगकर मिलता नहीं छीनो अब  ,
फिर सभी अपने  नसीबों का है।

किसलिये  डरना किसी ज़ालिम से  ,
डर नहीं कोई सलीबों का है।

दर्द गैरों का दिया कुछ "तनहा" ,
और कुछ अपने हबीबों का है।

Friday, 23 November 2012

ग़ज़ल 1 6 3 ( दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से ) - लोक सेतिया "तनहा"

दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से - लोक सेतिया "तनहा"

दूर रहते हो क्यों तुम हर किसी से ,
पास आ कर मिलो इक दिन सभी से।

पास जितना उसे तुम बांट देना ,
मांगना फिर सभी कुछ ज़िंदगी से।

कह दिया क्या उसे मरने चला है ,
देख लो हो गया क्या दिल्लगी से।

रोकना चाहते हो रोक लो अब ,
छोड़ शिकवा गिला आवारगी से।

आज नासेह से पूछा किसी ने ,
क्या खुदा मिल गया है बंदगी से।

रुक सका आज तक तूफां कभी है ,
रोकते हो मुझे क्यों आशिकी से।

जिनकी खातिर जिये "तनहा" अभी तक ,
मर गये  आज उनकी बेरुखी से। 

Wednesday, 21 November 2012

अमर कहानी ( कविता ) 7 4 भाग दो - डॉ लोक सेतिया

अमर कहानी ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बेहद कठिन है ,
लिखना ,
जीवन की कहानी ,
नहीं आसान होता ,
समझना ,
जीवन को ,
करते हैं  ,
प्रतिदिन संग्राम ,
जीने के लिये  ,
कथाकार की ,
कल्पना जैसा ,
होता नहीं ,
कभी किसी का ,
जीवन वास्तव में।

बदलती रहती ,
पल पल परिस्थिति ,
मिलना बिछुड़ना ,
हारना जीतना ,
सुख दुःख जीवन में ,
नहीं सब होता ,
किसी के भी बस में ,
कदम कदम विवशता  ,
आती है नज़र ,
सब कुछ घटता जीवन में ,
देख नहीं पाता कोई भी ,
अनदेखा,
अनसुना भी ,
रह जाता ,
बहुत कुछ है ,
जीत जाता हारने वाला ,
और जीतने वाले ,
की हो जाती हार ,
अक्सर जाती यहां बदल,
उचित अनुचित की परिभाषा ,
किसे मालूम क्या है ,
पूर्ण सत्य जीवन का।
 
कैसे तय कर सकती है ,
किसी कथाकार की कलम ,
नायक कौन ,
कौन खलनायक ,
जीवन में ,
कहां बच पाता लेखक भी ,
अपने पात्रों के मोह से ,
निष्पक्ष हो ,
समझना होगा ,
जीवन के पात्रों को ,
निभाना होगा ,
कर्तव्य उसे ,
जीवन की कहानी के ,
सभी पात्रों से  ,
न्याय करने का ,
उसकी कलम ,
लिख पाएगी तभी  ,
कोई कालजयी कहानी ,
जो अमर बनी  ,
रहेगी युगों युगों तक। 

ग़ज़ल 1 6 2 ( फिर नये सिलसिले क्या हुए ) - लोक सेतिया "तनहा"

फिर नये सिलसिले क्या हुए - लोक सेतिया "तनहा"

फिर नये सिलसिले क्या हुए ,
सब पुराने गिले क्या हुए।

बीज बोये थे फूलों के सब  ,
गुल नहीं पर खिले क्या हुए।

इक अकेला मुसाफिर बचा ,
थे कई काफिले क्या हुए।

बात तक जब  नहीं हो सकी  ,
यार बिछुड़े मिले क्या हुए।

देखने सब उधर लग गये   ,
उनके पर्दे हिले क्या हुए।

इश्क ने तोड़ डाले सभी  ,
आपके सब किले क्या हुए।

साथ "तनहा" नहीं रह सके ,
खत्म फिर फासिले क्या हुए।

Tuesday, 20 November 2012

ग़ज़ल 1 5 2 ( बिकने लगी जब माँ करोड़ों करोड़ में ) - लोक सेतिया "तनहा"

बिकने लगी जब मां करोड़ों करोड़ में - लोक सेतिया "तनहा"

बिकने लगी जब माँ करोड़ों करोड़ में ,
सब लोग शामिल हो गए खुद ही दौड़ में।

जीने के बारे सोचते लोग अब नहीं ,
सारा ज़माना लग गया जोड़ तोड़ में।

तुम वक़्त की रफ़्तार को रोकना नहीं ,
बचना नहीं आसान इस की मरोड़ में।

कैसे बतायें क्या लिखा क्या नहीं लिखा ,
मिलती कहां हर बात दुनिया के जोड़ में।

हम तो सभी को साथ लेते गये मगर ,
कुछ लोग खुद बिछुड़े बदल राह मोड़ में।

करने लगे हैं प्यार नेता भी देश से ,
उठने लगी हो खाज जैसे कि कोड़ में।

"तनहा" ज़माना दौड़ता और हांफता ,
शामिल  कभी होते नहीं आप होड़ में। 

Monday, 19 November 2012

ग़ज़ल 1 3 9 ( हैं खुदा जो वही अब यहाँ रह रहे हैं )

हैं खुदा जो वही अब यहां रह रहे हैं - लोक सेतिया "तनहा"

हैं खुदा जो वही अब यहां रह रहे हैं ,
आदमी सब न जाने कहां रह रहे हैं।

बोलने की किसी को इजाज़त नहीं है ,
हर ज़ुबां सिल चुकी हम जहां रह रहे हैं।

ले चलो उस तरफ को जनाज़ा हमारा ,
यार सारे हमारे वहां रह रहे हैं।

लोग कहने लगे हम नहीं साथ रहते ,
तुम बता दो सभी को ,कि हां रह रहे हैं।

बाद मरने के जन्नत में जाकर ये देखा ,
हो गई भीड़ अहले जहां रह रहे हैं।

ढूंढता फिर रहा आपको है ज़माना ,
आप क्यों इस तरह बन निहां रह रहे हैं।

जुर्म साबित नहीं जब हुआ है तो "तनहा" ,
किसलिये फिर झुकाए दहां रह रहे हैं।

ग़ज़ल 1 3 8 ( मधुर सुर न जाने कहाँ खो गया है ) - लोक सेतिया "तनहा"

मधुर सुर न जाने कहां खो गया है - लोक सेतिया "तनहा"

मधुर सुर न जाने कहां खो गया है ,
यही शोर क्यों हर तरफ हो गया है।

बता दो हमें तुम उसे क्या हुआ है ,
ग़ज़लकार किस नींद में सो गया है।

घुटन सी हवा में यहां लग रही है ,
यहां रात कोई बहुत रो गया है।

नहीं कर सका दोस्ती को वो रुसवा ,
मगर दाग अपने सभी धो गया है।

करेंगे सभी याद उसको हमेशा ,
नहीं आएगा फिर अभी जो गया है।

कहां से था आया सभी को पता है ,
नहीं जानते पर किधर को गया है।

मिले शूल "तनहा" उसे ज़िंदगी से ,
यहां फूल सारे वही बो गया है।

Friday, 16 November 2012

ग़ज़ल 1 6 1 ( बतायें तुम्हें क्या किया हमने ) - लोक सेतिया "तनहा"

बतायें तुम्हें क्या किया हमने - लोक सेतिया "तनहा"

बतायें तुम्हें क्या किया हमने ,
ज़माने को ठुकरा दिया हमने।

बुझी प्यास अपनी उम्र भर की ,
कोई जाम ऐसा पिया हमने।

तुझे भूल जाने की कोशिश में ,
तेरा नाम हर पल लिया हमने।

नहीं दुश्मनों से गिला करते ,
उन्हें कह दिया शुक्रिया हमने।

पुरानी ग़ज़ल को संवारा है ,
बदल कर नया काफिया हमने।

गुज़ारी है लम्बी उम्र लेकिन ,
नहीं एक लम्हा जिया हमने।

रहा अब नहीं दाग़ तक "तनहा" ,
तेरा ज़ख्म ऐसे सिया हमने।

Monday, 12 November 2012

ग़ज़ल 1 3 7 ( नहीं आफताब चाँद तारे नहीं हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं आफ़ताब चांद तारे नहीं हैं - लोक सेतिया "तनहा"

नहीं आफ़ताब चांद तारे नहीं हैं ,
कहीं ढूंढते मगर सहारे नहीं हैं।

रुकेगा नहीं कभी सफीना हमारा ,
हमें मिल सके अभी किनारे नहीं हैं।

हमारी नहीं उन्हें ज़रूरत ही कोई ,
हां हम वालदैन के दुलारे नहीं हैं।

छुपाना नहीं कभी उसे सब बताना ,
तुम्हारे हुए मगर तुम्हारे नहीं हैं।

वही आसमां भी है ,वही है ज़मीं भी ,
चमकते हुए वही सितारे नहीं हैं।

न हाथों में तीर है ,न शमशीर कोई ,
लड़ेंगे मगर अभी तो हारे नहीं हैं।

उन्हें दोस्तों ने मार डाला है "तनहा" ,
रकीबों की चाल के वो मारे नहीं हैं।

ग़ज़ल 1 3 6 ( इसी जहाँ में सभी का जहान होता है ) - लोक सेतिया "तनहा"

इसी जहां में सभी का जहान होता है - लोक सेतिया "तनहा"

इसी जहां में सभी का जहान होता है ,
नई ज़मीन नया आसमान होता है।

वही ज़माना फिर आ गया कहीं वापस ,
कभी कभी तो हमें यूं गुमान होता है।

लिखा हुआ तो बहुत है किताब में लेकिन ,
अमल जो कर के दिखाए महान होता है।

वहीं मसल के किसी ने हैं फेंक दी कलियां ,
जहां सजा के रखा फूलदान होता है।

जो दर्द लेकर खुशियां सभी को देता हो ,
वो आदमी खुद गीता कुरान होता है।

चलो तुम्हें हम घर गांव में दिखा देंगे ,
यहां शहर में तो केवल मकान होता है।

नया परिंदा आकाश में लगा उड़ने ,
ये देखता "तनहा" खुद उड़ान होता है।

Sunday, 11 November 2012

ग़ज़ल 1 4 1 ( खत्म बीज करने फसल आ रही है ) - लोक सेतिया "तनहा"

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है - लोक सेतिया "तनहा"

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है ,
न जाने ये कैसी नसल आ रही है।

नहीं ज़िंदगी की शिकायत करेंगे ,
हमें जब बुलाने अज़ल आ रही है।

किसी की अमानत उसी को है देनी ,
न जाये कहीं दिल फिसल आ रही है।

उसे याद अब तक है मिलने का वादा ,
वो वादा निभाने को कल आ रही है।

सभी ख़्वाब देखें , हक़ीकत न देखें ,
सियासत बताने ये हल आ रही है।

बहारों को लाने खिज़ा खुद गई है ,
रुको तुम अभी एक पल आ रही है।

सुनी और "तनहा" बहुत आज रोये ,
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है।

Saturday, 10 November 2012

मेरी खबर ( कविता ) 7 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                       मेरी खबर ( कविता )

पहचाना नहीं ,
आज तुमने मुझे ,
तुम्हें फुर्सत नहीं थी ,
मिलने की ,
करनी थी मुझको ,
जो बातें तुमसे  ,
रहेंगी उम्र भर ,
सब अब अधूरी।

मगर शायद ,
वर्षों बाद ,
पढ़ कर ,
सुबह का तुम अखबार ,
या सुन कर ,
किसी से  समाचार ,
आओगे घर मेरे ,
तुम भी एक बार ,
ढूंढ कर मेरा ठिकाना।




मुमकिन है ,

सोचो तब तुम ,
कोई तो दे जाता ,
मैं तुम्हें निशानी ,
काश दोहराते ,
पुरानी हम यादें ,
सुनते-सुनाते ,
जुबां से अपनी ,
नई हम कहानी।

मिला है जो ,
जवाब तुमसे अभी ,
वही खुद अपने से ,
मिलेगा तुम्हें कभी ,
नहीं मिल सकूंगा मैं।

होगी शायद ,
तुमको भी निराशा ,
होगी खत्म तुम्हारी भी ,
मुझसे मिलने की ,
हर आशा।

ये सब जीते जी ,
नहीं  कर सकूंगा मैं ,
जो किया है तुमने ,
वो नहीं दोहराऊंगा मैं ,
होगा ऐसा इसलिये  ,
मेरे दोस्त उस दिन ,
क्योंकि मैं ,
अलविदा ,
कह चुका हूंगा ,
दुनिया को ,
और आये होगे ,
तुम मेरे घर पर ,
पढ़कर ,
सुनकर ,
मेरे मरने की खबर।

Friday, 9 November 2012

वो साहित्य कहाँ है ( कविता ) 7 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

               वो साहित्य कहां है ( कविता )

कब का मिट चुका ,
लुट चुका ,
जिसको चाहते हैं ,
ढूंढना हम सब ,
उजड़ा उजड़ा सा है चमन ,
मुरझाये हुए हैं फूल सभी ,
रुका हुआ ,
प्रदूषित जल तालाब का ,
कुम्हलाए हुए ,
कंवल के सभी फूल।

हवाओं में है ,
अजब सी घुटन ,
बेचैन हो रहा ,
हमारा तन मन ,
हो रहा है जैसे मातम कोई।

कहां गई ,
खुशियों की महफिलें।

कहां भूल आये  ,
सभी सदभावना ,
क्यों खो गई संवेदनाएं हमारी ,
आता नहीं अब कहीं नज़र ,
होता था कभी जो ,
अपनी पहचान।

सुगंध थी जिसमें फूलों की ,
महक थी जो बहारों की ,
नदी का वो बहता पानी ,
समुन्दर सी गहराई लिये ,
प्यार का सबक पढ़ाने वाला ,
मानवता की राह दिखाने वाला ,
नई रौशनी लाने वाला ,
अंधेरे सभी मिटाने वाला ,
आशा फिर से जगाने वाला ,
पढ़ने वाला ,
पढ़ाने वाला ,
साहित्य वो है कहां।

सुगंध प्यार की ( कविता ) 7 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सुगंध प्यार की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सुनी हैं हीर रांझा ,
कैस लैला की ,
सबने कहानियां ,
मैंने देखा है ,
दो प्यार करने वालों को ,
खुद अपनी नज़रों से ,
कई बार अपने घर के सामने।

मज़दूरी करना ,
है उनका काम ,
पति पत्नी हैं वो दोनों ,
रहमान और अनीता ,
हैं दोनों के नाम।

पूछो मत  ,
क्या है उनका धर्म ,
देना मत ,
उनके प्यार को ,
ऐसा इल्ज़ाम।

रहमान को देखा ,
मज़दूरी करते हुए ऐसे ,
इबादत हो ,
काम करना जैसे ,
नहीं सुनी उनसे ,
प्यार की बातें कभी ,
करते हैं जैसे ,
सब लोग अक्सर कभी।

देखा है मैंने ,
प्यार भरी नज़रों से ,
निहारते ,
अनीता को ,
अक्सर रहमान को  ,
सुना है रहमान को ,
उसका नाम ,
पल पल पुकारते।

निभाती है ,
सुबह से शाम तक ,
उसका साथ ,
न हो चाहे ,
हाथों में उसका हाथ ,
अपने पल्लू से ,
पोंछती रहती ,
उसका पसीना ,
कितना मधुर सा ,
लगता है ,
प्यार भरा एहसास।

कभी कुछ पिलाना ,
कभी कुछ खिलाना ,
कभी लेकर उससे कुदाल,
खुद चलाना।

कभी गीत प्यार वाले ,
भी गाते नहीं ,
मुहब्बत है तुमसे ,
जताते नहीं ,
नहीं रूठते हैं ,
मनाते नहीं।

उम्र भर साथ निभाना है ,
नहीं कहता ,
इक दूजे को कोई भी ,
जानते हैं दोनों ,
बताते नहीं।

Thursday, 8 November 2012

झूठा है दर्पण ( कविता ) 7 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

         झूठा है दर्पण ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

किया सम्मानित ,
सरकार ने ,
साहित्यकार को ,
और दे दी गई ,
इक स्वर्ण जड़ित ,
कलम भी ,
सम्मान राशि के साथ।

रुक जाता ,
लिखते लिखते ,
उनका हाथ ,
जब भी चाहते ,
लिखना वो ,
जनता के दुःख दर्द की ,
कोई बात।

शायद इसलिये  ,
या फिर अनजाने में ही ,
मुझे भेज दी ,
उन्होंने वही कलम ,
शुभकामना के साथ।




देखा भीतर से ,

जब कलम को ,
लगे कांपने मेरे भी हाथ ,
आया नज़र ,
स्याही की जगह लहू ,
डरा गई मुझको ये बात।

ऐसी ही कलमें ,
आजकल लिख रहीं हैं  ,
नित नया नया इतिहास ,
गरीबों के खून के छींटे  ,
आ रहे नज़र ,
उनके दामन पर ,
जो करते तो हैं ,
देशसेवा की बातें  ,
कर रहे हर दिन ,
जनता का धन बर्बाद।

आयोजित करते ,
आडम्बरों के समारोह  ,
प्रतिदिन शान दिखाने ,
दिल बहलाने को ,
नहीं कर पाते ,
वो लोग कभी ,
गरीबों के दुःख दर्द का ,
कोई एहसास।
 
करते जिन की हैं बातें ,
उन भूखे नंगों का ,
कर रहे ये कैसा उपहास।

कौन दिखाये ,
दर्पण उनको ,
कौन लगाये ,
उन पर कोई आरोप ,
जब शामिल हैं ,
इनमें ,
समाज को ,
आईना दिखाने वाले ,
अपनी सूरत ,
देखें कैसे दर्पण में ,
और कैसे सब को दिखायें ,
सरकारी सम्मानों का ,
क्या है सच ,
वो हमें कैसे खुद बतायें।  

ठंडी ठंडी छाँव ( कविता ) 6 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

      ठंडी ठंडी छांव ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

घर के आंगन का वृक्ष हूं मैं ,
मेरी जड़ें गहराई तक फैली हैं ,
अपनी माटी में ,
प्यार से सालों साल सींचा है ,
माली ने पाला है जतन से ,
घर को देता हूं छाया मैं।

आये हो घर में तुम अभी अभी ,
बैठो मेरी शीतल शीतल छांव में ,
खिले हैं फूल कितने मुझ पर ,
निहारो उनको प्यार से ,
तोड़ना मत ,
मसलना नहीं ,
मेरी शाखों ,
पत्तों ,
कलियों को ,
लगेंगे फल जब इन पर ,
घर के लिये  ,
तुम्हारे लिये  ,
करो उसका अभी इंतज़ार।

काटना मत मुझे कभी भी ,
जड़ों से मेरी ,
जी नहीं सकूंगा  ,
इस ज़मीन को छोड़ कर ,
मैं कोई मनीप्लांट नहीं ,
जिसे ले जाओ चुरा कर ,
और सजा लो किसी नये गमले में।




देखो मुझ पर बना है घौसला ,

उस नन्हें परिंदे का ,
उड़ना है उसे भी खुले गगन में ,
अपने स्वार्थ के पिंजरे में ,
बंद न करना उसको ,
रहने दो आज़ाद उसको भी घर में ,
बंद पिंजरे में उसका चहचहाना ,
चहचहाना नहीं रह जायेगा ,
समझ नहीं पाओगे तुम दर्द उसका।

जब भी थक कर कभी ,
आकर बैठोगे मेरी ठंडी ठंडी छांव में ,
माँ की लोरी जैसी सुनोगे ,
इन परिंदों के चहचहाने की आवाज़ों को ,
और यहां चलती मदमाती हवा में ,
आ जाएगी तुम्हें मीठी मीठी नींद।

Wednesday, 7 November 2012

जीने का अधिकार मिले ( कविता ) शून्य ( डॉ लोक सेतिया )

 जीने का अधिकार मिले ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कोई आस्तिक हो ,
या हो नास्तिक ,
ईश्वर के लिये  ,
सभी हों एक समान ,
होना ही चाहिये  ,
दुनिया का सिर्फ यही विधान।

नहीं जानता मैं क्या हूं ,
आस्तिक या कि नास्तिक ,
शायद नहीं आता मुझको,
करना विनती- प्रार्थना ,
गुलामी करना नहीं भाता मुझे  ,
किसी को गुलाम बनाना ,
भी नहीं चाहता हूं मैं ,
हम सब हैं बराबर जब इंसान ,
किसी का किसी पर ,
नहीं जब कोई एहसान ,
क्यों  होता है  ऐसा फिर भगवान  ,
बेबस ही लगता क्यों  ,
यहां  हर इक इंसान।

चाहता हूं मैं ,
सिर्फ जीने का अधिकार ,
कोई किसी का भी  भक्त नहीं हो  ,
कोई न हो किसी की  सरकार ,
मिले जीने की पूरी कभी तो आज़ादी  ,
आरज़ू है अभी तक ,
बाकी यही आधी ,
सौ साल नहीं ,
उम्र हो चाहे बस इक साल  ,
ज़िंदगी का पर  ,
न हो बुरा ऐसा तो हाल ,
जीना है मुझको अपनी मर्ज़ी से  ,
नहीं और जीना ,
जैसा चाहते हों लोग सारे ,
मर मर कर  ही  ,
अब तक ज़िंदा रहा हूं  ,
कहां एक पल भी जी सका मैं ,
हद हो चुकी है  ,
ज़ुल्मों सितम की  ,
नहीं भीख भी चाहिये  ,
पर तेरे करम की ,
क्यों किसी को ,
अपना मालिक सब मानें  ,
कभी खुद को इंसान  ,
इंसान ही सिर्फ माने  ,
किसी के आदेश से ,
न हो जीना मरना  ,
अगर कर सको ,
अब यही बस तुम करना।
*******************************
( भगवान बनना मुश्किल बहुत है, नहीं आसां मगर इन्सान भी बनना। कभी तू भी मुझ सा ही बनना।  )

Sunday, 4 November 2012

मैं ( नज़्म ) शून्य भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 मैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

मैं कौन हूं
न देखा कभी किसी ने
मुझे क्या करना है
न पूछा ये भी किसी ने
उन्हें सुधारना है मुझको
बस यही कहा हर किसी ने।

और सुधारते रहे
मां-बाप कभी गुरुजन
नहीं सुधार पाए हों दोस्त या कि दुश्मन।

चाहा सुधारना पत्नी ने और मेरे बच्चों ने
बड़े जतन किए उन सब अच्छों ने
बांधते रहे रिश्तों के सारे ही बंधन
बनाना चाहते थे मिट्टी को वो चन्दन।

इस पर होती रही बस तकरार
मानी नहीं दोनों ने अपनी हार
सोच लिया मैंने , जो कहते हैं सभी
गलत हूंगा मैं , वो सब ही होंगें सही
चाहा भी तो कुछ कर न सका मैं
सुधरता रहा , पर सुधर सका न मैं।

बिगड़ा मैं कितना
कितनी बिगड़ी मेरी तकदीर
कितने जन्म लगेंगें ,
बदलने को मेरी तस्वीर 
जैसा चाहते हैं सब ,
वैसा तभी तो मैं बन पाऊं।

पहले जैसा हूं , खत्म तो हो जाऊं
मुझे खुद मिटा डालो , यही मेरे यार करो
मेरे मरने का वर्ना कुछ इंतज़ार करो। 

स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म ) 6 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

  स्वीकार करने अपने गुनाह ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

स्वीकार करने हैं ,
सभी अपने गुनाह ,
तलाश करता हूं ,
ऐसी इक इबादतगाह।

मेरी ज़ुबां से सुने ,
मेरी ही दास्तां ,
बन कर के पादरी ,
जहां पर खुद खुदा।

मंज़ूर है मुझको ,
हर इक कज़ा ,
मांग लूंगा मैं ,
अपने सब जुर्मों की सज़ा।




पूछना है लेकिन ,

इक सवाल भी मुझे ,
मिलता क्या है ,
हमें रुला के तुझे।




तेरे ही बंदे ,

क्यों इतने परेशान हैं ,
हम सभी देख कर ,
हैरान हैं ,
मंदिर सब तेरे ,
बने आलीशान हैं ,
फिर किसलिये बेघर ,
इतने इंसान हैं।

बना कर ये दुनिया ,
कहां खो गया है ,
देख खोल कर आंखें ,
क्या सो गया है।

ग़ज़ल 1 6 0 ( दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ) - लोक सेतिया "तनहा"

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है - लोक सेतिया "तनहा"

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ,
अब सभी की हुई ये हालत है।

बेचते हो ज़मीर तक अपना ,
देशसेवा नहीं तिजारत है।

इक तमाशा दिखा लगे कहने ,
देख लो हो चुकी बगावत है।

आईना हम किसे दिखा बैठे ,
यार करने लगा अदावत है।

आज दावा किया है ज़ालिम ने ,
उसके दम पर बची शराफत है।

दोस्त कोई कभी तो मिल जाये  ,
इक ज़रा सी यही तो हसरत है।

आप गैरों को चाहते लेकिन ,
आपसे ही हमें तो उल्फत है।

जब बुलाएं कभी ,नहीं आते ,
दूर से देखने की आदत है।

राह देखा किये वही "तनहा" ,
बदलना राह उनकी फितरत है।

Saturday, 3 November 2012

ग़म हमारे कोई भुला जाये ( नज़्म ) 4 2 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

ग़म हमारे कोई भुला जाये ( नज़्म ) - लोक सेतिया "तनहा"

ग़म हमारे कोई भुला जाये  ,
मुस्कुराना हमें सिखा जाये।

कोई अपना हमें बना जाये  ,
दिल हमारा किसी पे आ जाये।

ज़िंदगी खुद ही एक दिन चल कर ,
ग़म के मारों से मिलने आ जाये।

मुस्कुराते हैं फूल कांटों में ,
राज़ इसका कोई बता जाये।

रह के दिन भर मेरे ख्यालों में ,
रात सपनों में कोई आ जाये।

कागज़ के फूल सजाने के ( नज़्म ) 4 0 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

कागज़ के फूल सजाने के ( नज़्म ) लोक सेतिया "तनहा"

कागज़ के फूल सजाने के ,
अंदाज़ न सीखे ज़माने के।

आये वो ,रस्म निभा के चले ,
अरमान जिन्हें थे बुलाने के।

बेबात ही हम से हैं वो खफा ,
उन के हैं ढंग सताने के।

मसरूफ थे या वादा भूले ,
अच्छे हैं बहाने , न आने के।

पत्थर दिल के ये आज सभी ,
बन बैठे खुदा बुतखाने के।

हक तो जीने का नहीं है कोई ( नज़्म ) 3 9 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हक़ तो जीने का नहीं है कोई ( नज़्म ) लोक सेतिया "तनहा"

हक़ तो जीने का नहीं है कोई ,
फिर भी जीता ही कहीं है कोई।

आह भरना भी जहां होता गुनाह ,
रोया जा-के वहीं है कोई।

मौत की मिलके दुआएं मांगें ,
अब इलाज इसका नहीं है कोई।

आएगा वो मेरी मैयत पे ज़रूर ,
कब कहीं आता युं हीं है कोई।

किसको ढूंढे है नज़र , सहरा में ,
मिलता कब "तनहा" कहीं है कोई। 

Friday, 2 November 2012

मन मोहना बड़े झूठे ( हास्य व्यंग्य कविता ) 12 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

मन मोहना बड़े झूठे ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

चेहरे का उनके ,
रंग,
पहले से था काला।

कालिख लगा सका न ,
कोयला घोटाला।

सबक सिखा गया ,
इमानदार अफसर को ,
मुजरिम नहीं ,
मंत्री जी का है साला।

घोटाले करने वाले ,
बरी हो जाएंगे सब ,
हुआ है कभी साबित ,
यहां पर कोई घोटाला।

हुड़दंग करने की ,
संसद में इजाज़त है ,
लगा लो अदालत में ,
मुहं पर मगर ताला।

फ़िल्मी सितारों से ,
डाकू लुटेरों तक ,
सत्ता की राजनीति  ,
सब की हो गई खाला।

मनमोहन कहते ,
डरना न आरोपों से ,
दिन चार बाद ,
होगा ही अब उठाला।

भाई भाई हैं  ,
पक्ष-विपक्ष के सब नेता ,
खंजर भी छिपा है ,
हाथों में है फूलमाला।

वो भी बिके हुए ,
ये भी बिके हुए ,
दोनों को चलाता सदा ,
इक ही पैसे वाला।

गुठलियाँ नहीं आम खाओ ( व्यंग्य कविता ) 1 1 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

गुठलियां नहीं , आम खाओ ( व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

गुठलियाँ खाना छोड़ कर ,
अब आम खाओ ,
देश के गरीबो ,
मान भी जाओ।

देश की छवि बिगड़ी ,
तुम उसे बचाओ ,
भूख वाले आंकड़े ,
दुनिया से छुपाओ।

डूबा हुआ क़र्ज़ में ,
देश भी है सारा ,
आमदनी नहीं तो ,
उधार ले कर खाओ।

विदेशी निवेश को ,
कहीं से भी लाओ ,
इस गरीबी की ,
रेखा को बस मिटाओ।

मान कर बात ,
चार्वाक ऋषि की ,
क़र्ज़ लेकर सब ,
घी पिये  जाओ।

अब नहीं आता ,
साफ पानी नल में ,
मिनरल वाटर पी कर ,
सब काम चलाओ।

होना न होना ,
तुम्हारा एक समान ,
सारे जहां से अच्छा ,
गीत मिल के गाओ।

Thursday, 1 November 2012

अपने ही संग ( कविता ) 6 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अपने ही संग ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

रुको जानो स्वयं को ,
किसलिए खो बैठे हो ,
अस्तित्व अपना ,
भागते रहोगे कब तक ,
झूठे सपनों के पीछे तुम।

देखो ,कोई पुकार रहा है ,
आज तुम्हें ,
तुम्हारे ही भीतर से ,
तलाश करो कौन है वो ,
मिलेगा तुम्हें नया सवेरा ,
नई मंज़िल ,
एक नया क्षितिज ,
एक किनारा।

देखो तुम्हारे अंदर है ,
परिंदा एक जो व्याकुल है ,
गगन में उड़ने के लिये ,
स्वयं को स्वतंत्र कर दो ,
निराशा के इस पिंजरे से ,
फिर से इक बार करो  ,
जीने की नई पहल।

भुला कर दुःख दर्द को ,
खोलो खुशियों का दरवाज़ा ,
छुड़ा अपना दामन ,
परेशानियों से ,
सजा लो अधरों पर मुस्कान।

पौंछ कर ,
अपनी पलकों के आंसू ,
आरम्भ करो फिर से जीना ,
अपने ढंग से ,
अपने ही लिये।

देखना कोई ,
होगा हर कदम ,
साथ साथ तुम्हारे ,
नज़र आये चाहे  नहीं ,
करते रहना ,
उसके करीब होने का ,
आभास पल पल तुम।

मेरे खत ( कविता ) 6 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

       मेरे खत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरे बाद मिलेंगे तुम्हें,
मेरे ये खत मेज़ की दराज से,
शायद हो जाओ पढ़ कर हैरान ,
मत होना लेकिन परेशान।

लिखे हैं किसके नाम  ,
सोचोगे बार बार तुम,
मैं था सदा से सिर्फ तुम्हारा ,
पाओगे यही हर बार तुम।

हर खत को पढ़कर तुम तब ,
सुध बुध अपनी खोवोगे,
करोगे मन ही मन मंथन ,
और जी भर के रोवोगे।

मैंने तुमको जीवन प्रयन्त ,
किया है टूट के प्यार,
कर नहीं सका कभी भी ,
चाह कर भी मैं इज़हार।

कर लेना तुम विश्वास तब ,
मेरे इस प्यार का तुम ,
किया उम्र भर जो मैंने ,
उस इंतज़ार का तुम। 

हवाओं को महका दो ( नज़्म ) 3 8 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हवाओं को महका दो - ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

हवाओं को महका दो ,
फज़ाओं को बतला दो।

बरसती रहें शब भर ,
घटाओं को समझा दो।

उठा कर के घूंघट को ,
ज़रा सा तो सरका दो।

तुम्हें देखता रहता ,
ये दर्पण भी हटवा दो।

खुली छोड़ कर जुल्फें ,
हमें आज बहका दो।

हमें तुम कभी "तनहा" ,
किसी से तो मिलवा दो।

Wednesday, 31 October 2012

तुम्हारी नज़रें ( कविता ) 6 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

    तुम्हारी नज़रें ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जानते नहीं ,
पहचानते नहीं ,
जुबां से कह न सके ,
तुमने माना भी नहीं।

अजनबी बन गये हो तुम ,
मुझे भी मालूम न था ,
लेकिन ,
मेरे बचपन के दोस्त  ,
छिप सकी न ये बात ,
तुम्हारी उन नज़रों से ,
जो पहचानती थी मुझे।
 
तुम अब तक ,
नहीं सिखा सके ,
उन्हें बदल जाना ,
तभी तो पड़ गया आज ,
तुम्हें ,
मुझसे नज़रें चुराना।   

क्या सच क्या झूठ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

क्या सच क्या झूठ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

प्रचार ज़रूरी है।  हर कोई प्रचार का भूखा है। क्या क्या नहीं करते लोग प्रचार पाने के लिए।  यहां तक कि कभी लोग ऐसा भी कह देते हैं कि बदनाम हुए तो क्या नाम तो हुआ।  नेताओं को प्रचार की भूख पागलपन तक होती है।  सत्ता मिलते ही राज्य  भर में इनकी तस्वीरें सब जगह नज़र आने लगती हैं।  लगता है लोगों का मानना है कि बिना प्रचार कोई उन्हें याद नहीं रखेगा।  तभी सब नेता जनता का पैसा अपने  बाप दादा की समाधियां बनाने पर बर्बाद करते हैं जबकि जनता को उसकी ज़रूरत अपने जीने की ज़रूरतों के लिए होती है। नेताओं के लिए देश की जनता कभी महत्वपूर्ण रही नहीं है।  कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अगर भगवान के मंदिर सब कहीं न बने होते तो शायद लोग उसपर विश्वास ही न करते।
   एक लेखक का मानना है कि अगर रामायण राम के भक्त ने न लिखी होती और लिखने वाला रावण को नायक बना कर लिखता तो हम आज रावण को बुराई का प्रतीक न समझते।  रावण ने अपनी बहिन की नाक काटने वाले से बदला लिया था।  इस बारे क्या किसी ने विचार किया है कि अग्निपरीक्षा लेने के बाद भी राम ने अपनी पत्नी सीता को बिना कारण महलों से निष्कासित कर वन में भेज दिया  , क्यों ?
कहीं ये राजा का न्याय न हो कर एक पुरुषवादी सोच तो नहीं थी।
रामायण लिखने वाले ने इस पर क्यों कुछ नहीं लिखा कि जो धर्म पत्नी आपके साथ चौदह वर्ष बनवास में रहे ,आपको भी अवसर आने पर उसके साथ वन में जाना चाहिए था।  मगर कोई धर्म हमें सोचने सवाल करने की इजाज़त नहीं देता।  विशेष बात ये है कि जब भी जो किसी का प्रचार करता है , उसको महान बनाने को तब उसके विचारों और आदर्शों की नहीं नाम -छवि का ही प्रचार किया जाता है।  इसका ही अंजाम है कि हम प्रतिमाओं के सामने नतमस्तक होते हैं , आचरण को अपनाना कभी ज़रूरी नहीं समझते।  बड़े बड़े लोगों का प्रचार कितना सच्चा है और कितना झूठा कौन जाने।     

Tuesday, 30 October 2012

मतभेद ( कविता ) 6 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

  मतभेद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

आज स्पष्ट ,
हो गई तस्वीर ,
जब मेरे विचारों की ,
ताज़ी हवा से ,
छट गई सारी धुंध ,
मिट गई हर दुविधा ,
हो गया अंतर्द्वंद का अंत। 

जान लिया ,
कि जाते हैं बदल ,
सही और गलत के ,
सारे मापदंड अब दुनिया में।

मगर मुझे चलना है ,
उसी राह पर ,
जिसे सही मानता हूं मैं ,
लोग चलते रहें,
उन राहों पर ,
सही मानते हों वो जिन्हें।

काश ,
जान लें सभी ,
विचारों के मतभेद के ,
इस अर्थ को ,
और हो जाए ,
अंत टकराव का ,
दुनिया वालों का ,
हर किसी से। 

मतभेद,
हो सकता है सभी का,
औरों से ही नहीं ,
कभी कभी ,
खुद अपने आप से भी।

शून्यालाप ( कविता ) 6 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

शून्यालाप ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

अंतिम पहर जीवन का ,
समाप्त हुआ अब बनवास ,
त्याग कर बंधन सारे ,
चल देना है अनायास ,
कोई राह नहीं,
कुछ चाह नहीं ,
समाप्त हुआ वार्तालाप।

विलीन हो रही आस्था ,
टूट रहा हर विश्वास ,
तम ने निगल लिया सूरज ,
जाने कैसा है अभिशाप।

फैला है रेत का सागर ,
जल रहा तन मन आज ,
शब्द स्तुति के सब बिसरे ,
छूट गया प्रभु का साथ ,
मनाया उम्र भर तुमको ,
माने न तुम कभी मगर ,
खो जाना एक शून्य में ,
बनाना है शून्य को वास।

अब खोजना नहीं किसी को ,
न आराधना की है आस ,
करना है समाप्त अब ,
खुद से खुद का भी साथ।

आत्म मंथन ( कविता ) 6 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

   आत्म मंथन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

जाने कैसा था वो जहां ,
जाने कैसे थे वो लोग ,
बेगाने लगते थे अपने ,
अपनों में था बेगानापन।

हर पल चाहत पाने की ,
कदम कदम खोने का डर ,
आकांक्षाओं आपेक्षाओं का ,
लगा रहता था हरदम मेला ,
लेकिन भीड़ में रह कर भी ,
हर कोई होता था अकेला।

झूठ छल फरेब मुझको  ,
हर तरफ आता था नज़र ,
औरों से लगता था कभी ,
कभी खुद से लगता था डर।

किसी मृगतृष्णा के पीछे ,
शायद सभी थे भाग रहे ,
भटकते रहते दिन भर को ,
रातों को सब थे जाग रहे।
 
अब जब खुद को पाया है ,
चैन तब रूह को आया है ,
नहीं कोई भी मदहोशी है ,
छाई बस इक ख़ामोशी है।

छोड़ उस झूठे जहां को ,
अब हूं अपने ही संग मैं ,
अब नहीं कर पाएगा कभी ,
मुझे मुझ से अलग कोई ,
सब कुछ मिल गया मुझे ,
पा लिया है खुद को आज। 

ग़ज़ल 1 5 9 ( यहाँ रौशनी में छिपे हैं अँधेरे ) - लोक सेतिया "तनहा"

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे - लोक सेतिया "तनहा"

यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे ,
कहीं खो गये हैं यहां के सवेरे।

खुली इस तरह से वो जुल्फें किसी की ,
लगा छा गये आज बादल घनेरे।

करें याद फिर से वो बातें पुरानी ,
बने जब हमारे सभी ख़्वाब तेरे।

किया जुर्म हमने मुहब्बत का ऐसा ,
ज़माना खड़ा है हमें आज घेरे।

बचाता हमें कौन लूटा सभी ने ,
बने लोग सारे वहां खुद लुटेरे।

कहीं भी नहीं है हमारा ठिकाना ,
सुबह शाम ढूंढे नये रोज़ डेरे।

दिया साथ सबने ज़रा देर "तनहा" ,
कदम दो कदम सब चले साथ मेरे। 

Thursday, 25 October 2012

तुम मेरे ग़म में शामिल नहीं हो ( नज़्म ) 3 7 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो - लोक सेतिया "तनहा"

तुम मिरे ग़म में शामिल नहीं हो ,
इक तुम्हीं मुझ को हासिल नहीं हो।
 
जान कुर्बान की जिस ने तुम पर ,
कैसे तुम उसके कातिल नहीं हो।
 
जो कहे आईना ,मान लेंगे ,
तुम मुहब्बत के काबिल नहीं हो।

जान पाओगे तुम खुद को क्योंकर ,
खुद ही अपने मुक़ाबिल नहीं हो।




दिल पे गुज़रती है जो बेरुखी से ,

उस से तुम भी तो गाफ़िल नहीं हो।
 
बेमुरव्वत हो ऊपर से लेकिन ,
सच कहो साहिबे-दिल नहीं हो।

तुम ज़रा अपने दिल से ये पूछो ,
मेरी कश्ती के साहिल नहीं हो।

देख कर तुमको ये सोचता हूं ,
क्या तुम्ही मेरी मंज़िल नहीं हो।

इश्क का हो इज़हार , बहुत मुश्किल है ( नज़्म ) 3 6 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

 इश्क़ का हो इज़हार , बहुत मुश्किल है - लोक सेतिया "तनहा"

इश्क का हो इज़हार ,बहुत मुश्किल है ,
दुहरी इस की धार ,बहुत मुश्किल है।

जीत न पाया दिल के खेल में कोई ,
जीत के भी है हार ,बहुत मुश्किल है।

हो न अगर दीदार तो घबराये दिल ,
होने पर दीदार बहुत मुश्किल है।

इस को खेल न तुम बच्चों का जानो ,
दुनिया वालो प्यार बहुत मुश्किल है।

इश्क का दुश्मन है ये ज़माना लेकिन ,
कोई नहीं है यार ,बहुत मुश्किल है।

तूने किसी का दिल तोड़ा है बेदर्दी ,
टुकड़े हुए हैं हज़ार ,बहुत मुश्किल है।

प्यार तो अफसाना है एक नज़र का ,
होता है एक ही बार ,बहुत मुश्किल है।

देर से आने की है उनकी आदत ,
हम हैं इधर बेज़ार ,बहुत मुश्किल है।

कहते हैं वो तुम बिन मर जाएंगे ,
जां देना ,सरकार ,बहुत मुश्किल है।

Wednesday, 24 October 2012

क्यों परेशान हूँ ( कविता ) 6 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 क्यों परेशान हूं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मन है उदास क्यों ,
जा रहा हूं  मैं किधर ,
ढूंढ रहा हूं किसको   ,
चाहिए क्या मुझे ,
कहां है मेरी मंज़िल  ,
कैसी हैं राहें मेरी ,
प्रश्न ही प्रश्न हर तरफ ,
आ रहे हैं मुझको नज़र ,
नहीं कहीं कोई भी जवाब।

जीवन की सारी खुशियां ,
कहां मिलेंगी सबको ,
खिलते हैं फूल ऐसे कहां ,
जो मुरझाते नहीं फिर कभी ,
कहां हैं वो सब लोग ,
जो बांटते हों सिर्फ प्यार ,
कहीं तो होगा वो आंगन ,
जिसमें न हो कोई दीवार।

कहां है दुनिया वो ,
जिसकी है मुझको तलाश ,
कोई तो मिलेगा मुझे कभी ,
और देगा उसका पता मुझे ,
एक प्रश्न चिन्ह बन गया ,
जीवन है मेरा ,
बता दो कोई तो मुझे ,
क्या है मेरा जवाब।

नहीं आता हमें ( नज़्म ) 3 5 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

नहीं आता हमें ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

लगाना दिल नहीं आता हमें ,
दुखाना दिल नहीं आता हमें।

मिलाना हाथ आता है मगर ,
मिलाना दिल नहीं आता हमें।

उन्हें आता नहीं हम पर यकीं ,
दिखाना दिल नहीं आता हमें।

हमें सब को मनाना आ गया ,
मनाना दिल नहीं आता हमें।

तुम्हारा दिल तुम्हारे पास है ,
चुराना दिल नहीं आता हमें।

बहुत चाहा नहीं माना कभी ,
रिझाना दिल नहीं आता हमें।

जिसे देना था "तनहा" दे दिया ,
बचाना दिल नहीं आता हमें।

सपनों में जीना ( कविता ) 6 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सपनों में जीना ( कविता )

देखता रहा ,
जीवन के सपने ,
जीने के लिये  ,
शीतल हवाओं के ,
सपने देखे ,
तपती झुलसाती लू में ।

फूलों और बहारों के ,
सपने देखे ,
कांटों से छलनी था ,
जब बदन ,
मुस्कुराता रहा ,
सपनों में ,
रुलाती रही ज़िंदगी ।

भूख से तड़पते हुए ,
सपने देखे ,
जी भर खाने के ,
प्यार सम्मान के ,
सपने देखे ,
जब मिला ,
तिरस्कार और ठोकरें ।

महल बनाया सपनों में ,
जब नहीं रहा बाकी ,
झोपड़ी का भी निशां  ,
राम राज्य का देखा सपना ,
जब आये नज़र ,
हर तरफ ही रावण ।

आतंक और दहशत में रह के ,
देखे प्यार इंसानियत ,
भाई चारे के ख़्वाब ,
लगा कर पंख उड़ा गगन में ,
जब नहीं चल पा रहा था ,
पांव के छालों से ।

भेदभाव की ऊंची दीवारों में ,
देखे सदभाव समानता के सपने ,
आशा के सपने ,
संजोए निराशा में ,
अमृत समझ पीता रहा विष ,
मुझे है इंतज़ार बसंत का ,
समाप्त नहीं हो रहा ,
पतझड़ का मौसम।

मुझे समझाने लगे हैं सभी ,
छोड़ सपने देखा करूं वास्तविकता ,
सब की तरह कर लूं स्वीकार ,
जो भी जैसा भी है ये समाज ,
कहते हैं सब लोग ,
नहीं बदलेगा कुछ भी ,
मेरे चाहने से ।

बढ़ता ही रहेगा अंतर ,
बड़े छोटे ,
अमीर गरीब के बीच ,
और बढ़ती जाएंगी ,
दिवारें नफरत की ,
दूभर हो जाएगा जीना भी ,
नहीं बचा सकता कोई भी ,
जब सब क़त्ल ,
कर रहे इंसानियत का ।

मगर मैं नहीं समझना चाहता ,
यथार्थ की सारी ये बातें ,
चाहता हूं देखता रहूं ,
सदा प्यार भरी ,
मधुर कल्पनाओं के सपने ,
क्योंकि यही है मेरे लिये ,
जीने का सहारा और विश्वास।

Tuesday, 23 October 2012

अभी और कितने स्मारक ( कविता ) 5 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अभी और कितने स्मारक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वसूला गया होगा ,
गरीब जनता से कर ,
भरने को खजाना  उस बादशाह का ,
जिसने बेरहमी से किया होगा ,
खर्च जनता की अमानत को ,
बनवाने के लिये ,
अपनी प्रेमिका की याद में ,
ताजमहल उसके मरने के बाद।

कितने ही मजदूरों ,
कारीगरों का बहा होगा पसीना ,
घायल हुए होंगे उनके हाथ ,
तराशते हुए पत्थर ,
नहीं लिखा हुआ ,
उनका नाम कहीं पर।

क्यों करे कोई याद ,
उन गरीबों को , बदनसीबों को ,
देखते हुए ताज ,
यही सोच रहा हूं मैं आज।

कुछ और सोचते होगे तुम ,
मेरे करीब खड़े होकर ,
जानता हूं वो भी मैं ,
साथी मेरे ,
रश्क हो रहा है मुमताज से तुम्हें ,
नाज़ है ,
इक शहंशाह के ऐसे प्यार पर तुमको।

खुबसूरत लग रहा है नज़ारा तुम्हें ,
भर लेना चाहते हो उसे आंखों में ,
यादों में बसाने के लिये  ,
अपने प्यार के लिये ,
मांगने को दुआएं ,
उठा रखे हैं दोनों हाथ तुमने ,
कर रहे हो वादा ,
फिर एक बार ,
किसी को लेकर साथ आने का।

अब तलक चला आ रहा है चलन वही ,
शासकों का उनके बाद ,
उनके नाम स्मारक बनवाने का ,
जनता के धन से सरकारी ज़मीन पर ,
बनाई जाती हैं ,
सत्ताधारी नेताओं के पूर्वजों की समाधियां।

नियम कायदा कानून ,
सब है इनके लिये  ,
आम जनता के लिये  ,
नहीं बनता कभी ऐसा आशियाना ,
जिन्दा लोग ,
नहीं प्राथमिकता सरकार के लिये ,
मोहरे हैं हम सब ,
उनकी जीत हार के लिये।

लोकतंत्र में पीछे रह गये सब लोग ,
देश पर बोझ बन गये  ,
ये सब के सब राजनेता लोग ,
जब इस बार चढ़ाना ,
किसी समाधि पर फूल ,
सोचना रुक कर वहां एक बार ,
क्या थी उनकी विचारधारा ,
क्या है हमको वो स्वीकार।

जो कहलाते जनता के हितचिन्तक ,
उनके नाम बनाई जाएं समाधियां ,
और जनता रहे बेघर-बार ,
करना ही होगा कभी तो विचार। 

Monday, 22 October 2012

बस यही कारोबार करते हैं ( नज़्म ) 3 4 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

 बस यही कारोबार करते हैं ( नज़्म ) लोक सेतिया 

बस यही कारोबार करते हैं ,
हमसे इतना वो प्यार करते हैं।

कर न पाया जो कोई दुश्मन भी ,
वो सितम हम पे यार करते हैं।

नज़र आते हैं और भी नादां ,
वो कुछ इस तरह वार करते हैं।

खुद ही कातिल को हम बुला आये  ,
यही हम बार बार करते हैं।

इस ज़माने में कौन है अपना ,
बस यूं ही इंतज़ार करते हैं।

ज़ुल्म भी हंस के खुद ही सहते हैं ( नज़्म ) 3 3 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

ज़ुल्म भी हंस के खुद ही सहते हैं ( नज़्म ) लोक सेतिया

ज़ुल्म भी हंस के खुद ही सहते हैं ,
आप कैसे जहां में रहते हैं।

कत्ल करते हैं वो जिसे चाहा ,
इसको जम्हूरियत वो कहते हैं।

प्यार की बात आप करते हैं ,
अश्क अपने तभी तो बहते हैं।

ख़्वाब मेरे हैं टूटते ऐसे ,
रेत के ज्यों घरोंदे ढहते हैं।

हम नहीं अब तलक समझ पाए ,
दुश्मनों को ही दोस्त कहते हैं। 

गर्दिश में मुझे यूँ छोड़ के जाने वाले ( नज़्म ) 3 2 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले - लोक सेतिया "तनहा"

गर्दिश में मुझे यूं छोड़ के जाने वाले
ले ,छोड़ गए तुझको भी ज़माने वाले।

मुझको भी आया अब तो आंसू पीना ,
तेरा अहसां है मुझको रुलाने वाले।

होने वाले वो कब हैं किसी के यारो ,
बाज़ार मुहब्बत का ये सजाने वाले।

हो कर बेज़ार ये आखिर क्यों रोते हैं ,
खुद कर के सितम यूं हमको सताने वाले।

यूं तो रह जाते न हम सब "तनहा"
जो न रूठे होते वो हमको मनाने वाले।

Sunday, 21 October 2012

उम्र कैद ( हास्य कविता ) 1 0 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

उम्र कैद ( हास्य कविता ) लोक सेतिया

यूं ही नहीं होती ,
उम्रकैद की किसी को सज़ा।

साबित करना होता है ,
उसका बड़ा कोई गुनाह।

साबित नहीं हो पाते ,
सभी के किए अपराध ,
मिलते हैं बचाव के ,
अवसर बार बार ,
रख सकते हैं
अपराधी अपना वकील ,
जो देता है बचाव में ,
नई नई फिर दलील।

अदालत का रहता ,
वही उसूल हर बार ,
बेगुनाह को न हो सज़ा ,
बच जाये भले गुनहगार ,
आम अपराध की ,
सज़ा मिलती कुछ साल ,
चलता कानून भी ,
धीमी धीमी है चाल।

हर सुविधा मिलती जेल में ,
चुका कर मोल ,
देखता जा चुपचाप ,
कुछ न बोल ,
ध्यान रखती कैदियों का खुद सरकार ,
करती रहती है कई जेल सुधार।

उम्र कैद मिलती सबको ,
विवाह रचाने पर ,
रोक नहीं कैदी के बाहर जाने पर ,
जेल के कर के दिन भर सभी प्रबंध  ,
खुद लौट आता मुजरिम अपने ठिकाने पर।

उसे उम्र भर काटनी होती है सज़ा ,
जेलर को लाया था जो घर बुला ,
सज़ा उसकी न हो सकती कभी माफ़ ,
कोई सुनता नहीं फिर उसकी कोई फ़रियाद ।

गंभीर है जुर्म शादी रचाने का ,
विवाह संगठित श्रेणी का ,
माना जाता इक अपराध।

साथ छोड़ जाते हैं ,
सब पुराने साथी ,
गये थे कभी जो बन कर बाराती ,
भोगता सज़ा बस अकेला दूल्हा ,
जलता है ऐसे सुबह शाम चूल्हा ,
है राज़ मगर जानते सभी हैं ,
लेकिन किसी को बचाते न कभी हैं  ,
पति पत्नी का उम्र भर ,
का यही है नाता ,
इक देता हर पल सज़ा ,
दूजा खुश हो है पाता। 

Wednesday, 17 October 2012

आस्था ( कविता ) 5 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

      आस्था ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

सुलझे न जब मुझसे ,
कोई उलझन ,
निराशा से भर जाये ,
जब कभी जीवन ,
नहीं रहता ,
खुद पर है जब विश्वास ,
मन में जगा लेता ,
इक तेरी ही आस।

नहीं बस में कुछ भी मेरे
जनता हूं ,
है सब हाथ में तेरे ,
ये मानता हूं ,
तेरे भरोसे ,
बेफिक्र हो जाता हूं ,
मुश्किलों से अपनी ,
न घबराता हूं।

लेकिन कभी मन में ,
करता हूं विचार ,
कितना सही है ,
आस्तिक होने  का आधार ,
शायद है कुछ अधूरी ,
तुझ पे मेरी आस्था ,
फिर भी दिखा देती है ,
अंधेरे में कोई रास्ता।

दुनिया बदल रहा हूँ ( नज़्म ) 3 1 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

दुनिया बदल रहा हूं ( नज़्म ) लोक सेतिया

दुनिया बदल रहा हूं ,
खुद को ही छल रहा हूं।

डरने लगा हूं इतना ,
छुप कर के चल रहा हूं।

चलती हवा भी ठण्डी ,
फिर भी मैं जल रहा हूं।

क्यों आज ढूंढते हो ,
गुज़रा मैं कल रहा हूं।

अब थाम लो मुझे तुम ,
कब से फिसल रहा हूं।

लावा दबा हुआ है ,
ऐसे उबल रहा हूं।

"तनहा" वहां किसी दिन ,
मैं भी चार पल रहा हूं। 

Tuesday, 16 October 2012

मेरा संकल्प है ( कविता ) 5 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 मेरा संकल्प है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

लेता हूं शपथ ,
बनाना है ऐसा समाज ,
जिसमें कोई अंतर कोई भेदभाव ,
न हो इंसानों में।

मिटाना है अंतर,
छोटे और बड़े का ,
अमीर और गरीब का।

नहीं रहेगा,
एक शासक न दूसरा शासित ,
कोई न हो भूखा ,
कहीं पर किसी भी दिन ,
न ही होगा कोई बेबस और लाचार ,
सभी को मिलेंगे,
एक समान ,
जीने के सभी अधिकार।

रुकना नहीं है मुझे ,
चलते जाना है ,
उस दिशा में ,
जहां सब रहें सुख चैन से ,
करने को समाज के ,
उज्जवल भविष्य का निर्माण।

प्रतिदिन करता हूं ,
खुद से ये वादा ,
चाहे कुछ भी हो उसका अंजाम ,
टकराना है झूठ से ,
अन्याय से ,
अत्याचार करने वालों से ,
जनहित के लिए।

डरना नहीं कभी ,
सत्ता का दुरूपयोग करने वालों से ,
उठानी है अपनी आवाज़ ,
भ्रष्टाचार के खिलाफ ,
जीवन के हर मोड़ पर ,
निभाना है संकल्प ,
मातृभूमि के प्रति ,
अपना दायित्व निभाने का।

किया था वादा तुमने कृष्ण ( कविता ) 5 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

           किया था वादा तुमने कृष्ण ( कविता )

धरती पर बढ़ जाता है ,
जब अधर्म ,
उसका अंत करने को ,
लेते हो तुम जन्म ,
गीता में कहा था तुमने ,
हे कृष्ण।

आज हमें हर तरफ ,
आ रहे हैं नज़र ,
कितने ही कंस हैं,
तुम्हारी जन्म भूमि पर। 




हम हर वर्ष ,

मनाते हैं जन्माष्टमी का त्यौहार ,
रख कर दिल में उम्मीद  ,
कि आओगे तुम ,
निभाने अपना वादा ,
और कर दोगे अंत इन सब का।

क्या भूल गये ,
अपना किया वादा तुम ,
अच्छा होता ,
न करते तुम ऐसा वादा ,
दिया होता गीता में ,
सब को ये सन्देश ,
कि हम सब को ,
स्वयं बनना होगा कृष्ण ,
पाप और अधर्म का ,
अंत करने के लिये  ,
तब शायद न ले पाते ,
नित नये नये कंस जन्म,
इस धरती पर।  
हे कृष्ण।

Monday, 15 October 2012

अच्छा ही है ( कविता ) 7 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

अच्छा ही है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अच्छा है ,
सफल नहीं हो सका मैं ,
अच्छा है ,
मुझे नहीं मिला ,
बहुत सारा पैसा कभी ,
अच्छा है ,
मिले हर दिन मुझे ,
नये नये दुःख दर्द ,
अच्छा है ,
बेगाने बन गये ,
अपने सब धीरे धीरे।

अच्छा है ,
मिलता रहा ,
बार बार धोखा मुझको ,
अच्छा है ,
नहीं हुआ कभी ,
मेरे साथ न्याय ,
अच्छा है ,
पूरी नहीं  हुई ,
एक दोस्त की मेरी तलाश।

अच्छा है ,
मैं रह गया भरी दुनिया में ,
हर बार ही अकेला ,
अच्छा है ,
पाया नहीं कभी ,
सुख भरा जीवन ,
अच्छा है नहीं जी सका ,
चैन से कभी भी मैं।

अगर ये सब ,
मिल गया होता मुझे तो ,
समझ नहीं पाता ,
क्या होते हैं दर्द पराये ,
शायद कभी न हो सकता मुझको ,
वास्तविक जीवन का ,
सच्चा एहसास ,
संवारा है  ,
ज़िंदगी की कश-म-कश ने ,
मुझको  ,
निखारा है  ,
हालात की तपिश ने ,
मुझको ,
आग में तपने के बाद ,
ही तो बनता है ,
खरा सोना कुंदन।

चला नहीं ,
बाज़ार में दुनिया के ,
तो क्या हुआ ,
विश्वास है पूरा मुझको ,
अपने खरेपन पर ,
नहीं पहचान सके ,
लोग मुझे तो क्या ,
खुद को पहचानता हूं ,
मैं ठीक से ,
अपनी पहचान ,
नहीं पूछनी किसी दूसरे से ,
जानता हूं अपने  आप को मैं ,
अच्छा है। 

हम दोनों की सोच ( कविता ) 7 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

हम दोनों की सोच ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरे दिल में ,
नहीं रहती तुम ,
तुम्हारा एहसास ,
रहता है ,
मेरे मन में  ,
मस्तिष्क में।

मैं चाहता नहीं तुम्हें ,
तुम्हारे ,
रंग रूप के कारण ,
मुझे तो भाती है ,
तुम्हारी वो सोच ,
मिलती है ,
जो सोच से मेरी।

मुझे रहना है ,
बन कर वही सोच ,
तुम्हारे दिमाग में ,
दिल में तुम्हारे ,
नहीं रहना है  मुझको।

होता नहीं उसमें ,
प्यार का कोई  एहसास ,
मुहब्बत का हो ,
या  फिर नफरत का ,
दर्द का या कि ख़ुशी का ,
सब होता है एहसास ,
दिमाग में हमारे ,
धड़कता है दिल भी ,
जब आता है  कोई  ,
एहसास मन मस्तिष्क में।

आधुनिक युग का प्रेमी मैं ,
जीता हूं यथार्थ में ,
रहता है दिल में ,
केवल लाल रंग का खून ,
जो नहीं प्यार जैसा रंग ,
दिल में रहने की ,
बात है वो कल्पना ,
जिसे मानते रहे ,
सच अब तक सभी प्रेमी।

प्यार हमारा ,
रिश्तों का कोई  ,
अटूट बंधन नहीं  ,
लगने लगे जो ,
बाद में  ,
एक कैद दोनों को।

पास रहें चाहे दूर ,
हम करते रहेंगे  ,
प्यार इक दूजे को ,
सोच कर समझ कर ,
जान कर ,
समझती हो मुझे तुम ,
तुम्हें जानता हूं मैं  ,
मिलते हैं दोनों के विचार ,
करते हैं एक दूसरे का ,
हम सम्मान ,
हमारे बीच नहीं है ,
कोई दीवार ,
न ही हम बंधे हैं ,
किसी अनचाहे बंधन में ,
करते रहे , करते हैं ,
करेंगे हमेशा ही  ,
हम आपस में सच्चा प्यार।

Sunday, 14 October 2012

ग़ज़ल 8 9 ( इंसान बेचते हैं ,भगवान बेचते हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते हैं , भगवान बेचते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

इंसान बेचते है  ,   भगवान बेचते हैं ,
कुछ लोग चुपके चुपके ईमान बेचते हैं।

लो हम खरीद लाये इंसानियत वहीं से ,
हर दिन जहां शराफत शैतान बेचते हैं।

अपने जिस्म को बेचा  उसने जिस्म की खातिर ,
कीमत मिली नहीं ,  पर नादान बेचते है।

सब जोड़ तोड़ करके सरकार बन गई है ,
जम्हूरियत में ऐसे फरमान बेचते हैं।

फूलों की बात करने वाले यहां सभी हैं ,
लेकिन सजा सजा कर गुलदान बेचते हैं।

अब लोग खुद ही अपने दुश्मन बने हुए हैं ,
अपनी ही मौत का खुद सामान बेचते हैं।

सत्ता का खेल क्या है उनसे मिले तो जाना ,
लाशें खरीद कर जो , शमशान बेचते हैं। 

ग़ज़ल 8 1 ( फलसफा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं - लोक सेतिया "तनहा"

फलसफा ज़िंदगी का हमें सिखाने लगे हैं ,
अब छुपा आंसुओं को वो मुस्कराने लगे हैं।

जान पाये नहीं जो कभी हमारी वफ़ा को ,
बात दिल की कहां वो जुबां पे लाने लगे हैं।

मिल गया खेत को बेच कर ये गर्दोगुबार ,
हर कहीं इस तरह कितने कारखाने लगे हैं।

आपकी इस बज़्म में हमीं नहीं बिनबुलाये ,
और कुछ लोग अक्सर यहां पे आने लगे हैं।

अब नहीं काम करती दवा न कोई दुआ ही ,
लोग "तनहा" यहां ज़हर खुद ही खाने लगे हैं।

ग़ज़ल 4 1 ( जाग जाओ बहुत सो लिये ) - लोक सेतिया "तनहा"

जाग जाओ बहुत सो लिये - लोक सेतिया "तनहा"

जाग जाओ बहुत सो लिये  ,
दिन चढ़ा ,आंख तो खोलिये।

रौशनी कब से है मुन्ताज़िर ,
खिड़कियां ज़ेहन की खोलिये।

बेगुनाही में खामोश क्यों ,
बोलिये और सच बोलिये।

राह में था अकेला कोई ,
बढ़ के साथ उसके हम हो लिये।

हम को कोई न ग़म था मगर ,
ग़म पे औरों के हम रो लिये।

खुद को धोखा न देना कभी ,
आप अपने से सच बोलिये।

ज़िंदगी का करो सामना ,
राज़ "तनहा" सभी खोलिये। 

ग़ज़ल 4 0 ( यहाँ तो आफ़ताब रहते हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

यहां तो आफ़ताब रहते हैं - लोक सेतिया "तनहा"

यहां तो आफताब रहते हैं ,
कहां, कहिये ,जनाब रहते हैं।

शहर का तो है बस नसीब यही ,
सभी खानाखराब रहते हैं।

क्या किसी से करे सवाल कोई ,
सब यहां लाजवाब रहते हैं।

सूरतें कोई कैसे पहचाने ,
चेहरे सारे खिज़ाब रहते हैं।

पत्थरों के मकान हैं लेकिन ,
गमलों ही में गुलाब रहते हैं।

रूह का तो कोई वजूद नहीं ,
जिस्म ही बेहिसाब रहते हैं। 

Saturday, 13 October 2012

मरने से डर रहे हो ( नज़्म ) 2 7 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

मरने से डर रहे हो - लोक सेतिया "तनहा"

मरने से डर रहे हो ,
क्यों रोज़ मर रहे हो।

अपने ही हाथों क्यों तुम ,
काट अपना सर रहे हो।

क्यों कैद में किसी की ,
खुद को ही धर रहे हो।

किस बहरे शहर से तुम ,
फ़रियाद कर रहे हो।

कातिल से ले के खुद ही ,
विषपान कर रहे हो।




पत्थर के आगे दिल क्यों ,

लेकर गुज़र रहे  हो।

Friday, 12 October 2012

आज हैं अपराधी बनेगें कल नेता ( व्यंग्य कविता ) शून्य ( डॉ लोक सेतिया )

आज हैं अपराधी बनेंगे कल नेता - लोक सेतिया "तनहा"

हर बात को देखने का होता है ,
सबका अपना अपना नज़रिया,
किसी को कुछ भी लगे ,
हमको तो ,
भाता है अपना सांवरिया।

किसलिए हो रहे हैं ,
इन अपराधियों को देख कर आप हैरान ,
आने वाले दिनों में यही ,
बढ़ाएंगे देश की देखना शान।

अगर नए नए अपराध नहीं होंगे ,
अपराधी न होंगे ,
तो मिलेंगे कैसे आपको भविष्य के ,
संसद और विधायक।

शासन करने ,
राज करने के लिए ,
नहीं चाहिएं सोचने समझने वाले ,
राजा बनते हैं हमेशा ही ,
मनमानी करने वाले।

सब को हक है ,
राजनीती करने का लोकतंत्र में ,
भ्रष्टाचार का विरोध कर  ,
नहीं जीत सकता कोई कभी चुनाव ,  
अपराध जगत है ,
आम लोगों के लिए सत्ता की एक नाव।

जिनके बाप दादा नहीं हों नेता अभिनेता  ,
उनको बिना अपराध कौन टिकट देता ,
देखो आज आपको ,
लग रहा जिनसे बहुत डर ,
कल दिया करोगे उनको ,
रोज़ खुद जीने के लिए कर ,
सरकार कैसे मिटा दे ,
भला सारे अपराध देश से ,
लोकतंत्र में नेताओं की बढ़ गई है ज़रूरत ,
नेता बन या तूं भी या फिर जा मर।

भ्रष्टाचार और अपराध का ,
राजनीती से है पुराना नाता  ,
एक है पाने वाला दूसरा है उसका दाता ,
समझ लो इनके रिश्तों को आप भी आज ,
बताओ इनमें  कौन है ,
किसका बाप ,
और कौन किसकी औलाद। 

हदिसे दिल पे आते रहे ( नज़्म ) 2 6 भाग एक ( डॉ लोक सेतिया )

हादिसे दिल पे आते रहे - लोक सेतिया "तनहा"

हादिसे दिल पे आते रहे ,
दास्तां हम सुनाते रहे।

बेगुनाही भी थी इक खता ,
हम सज़ा जिसकी पाते रहे।




मौत हमसे रही दूर ही ,

लाख हम ज़हर खाते रहे।

हमने सपने संजोए थे जो ,
ज़िंदगी भर रुलाते रहे।

तंग आकर करूं ख़ुदकुशी ,
लोग इतना सताते रहे।

दिल बहल जाये ,कुछ ,इसलिये  ,
शायरी में लगाते रहे। 

मेरा दिल वो बातें भुलाने लगा है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 2 5 भाग एक

मिरा दिल वो बातें भुलाने लगा है - लोक सेतिया "तनहा"

मिरा दिल वो बातें भुलाने लगा है ,
सुकूं सा मुझे अब तो आने लगा है।

कोई फूल तन्हा ज़रा देर खिलकर ,
बहारों में मुरझाया जाने लगा है।

उसे भूल जाऊं ये कसमें दिलाकर ,
गया ,जो वो फिर याद आने लगा है।

ख्यालों में ,ख़्वाबों में रह-रह के हमको ,
तुम्हारा तस्व्वुर सताने लगा है।

कभी हमने-तुमने जो गाया था मिलकर ,
वही गीत दिल गुनगुनाने लगा है। 

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ( नज़्म 2 4 भाग एक ) - लोक सेतिया "तनहा"

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे - लोक सेतिया "तनहा"

मेरे दुश्मन मुझे जीने की दुआ न दे ,
मौत दे मुझको मगर ऐसी सज़ा न दे।

उम्र भर चलता रहा हूं शोलों पे मैं ,
न बुझा इनको ,मगर अब तू हवा न दे।

जो सरे आम बिके नीलाम हो कभी ,
सोने चांदी से तुले ऐसी वफ़ा न दे।

आ न पाऊंगा यूं तो तिरे करीब मैं ,
मुझको तूं इतनी बुलंदी से सदा न दे।

दामन अपना तू कांटों से बचा के चल ,
और फूलों को कोई शिकवा गिला न दे।

किस तरह तुझ को सुनाऊं दास्ताने ग़म ,
डरता हूं मैं ये कहीं तुझको रुला न दे।

ज़िंदगी हमसे रहेगी तब तलक खफा ,
जब तलक मौत हमें आकर सुला न दे। 

Thursday, 11 October 2012

यही सपना है मेरा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया - भाग दो

यही सपना है मेरा - डॉ लोक सेतिया

रात एक बेहद खुबसूरत सपना देखा ,
मैं एक नई दुनिया में रह रहा हूं ,
हरा भरा मैदान है ,
पेड़ पौधे ,
फूल हैं ,
परिंदों की चहचहाह्टें।

मैं सवतंत्र हूं वहां पर ,
कोई चिंता नहीं ,
घर की कोई दीवार नहीं ,
रिश्तों नातों की कोई जंजीरें नहीं।

कोई रोकने वाला नहीं ,
कोई टोकने वाला नहीं,
कोई दुःख नहीं ,
कोई कमी नहीं ,
किसी तरह की कोई ज़रूरत नहीं।

कोई डर नहीं ,
घबराहट नहीं,
हर तरफ बस जीवन ही जीवन है ,
प्यार ही प्यार है।




इस जहां में ,

पुरानी दुनिया की कोई भी बुराई  नहीं है,
न कोई स्वार्थ न लोभ लालच ,
कुछ भी नहीं दिखाई देता वहां ,
न धन दौलत न सुख सुविधा ,
न कोई आधुनिक साधन,
मगर कुछ भी कमी नहीं लग रही थी।

इन सब की कोई ज़रूरत ही नहीं थी वहां पर ,
लग रहा था बस मेरा एक ,
दोस्त वहीं कहीं आस पास है ,
कोई नाम नहीं जिसका ,
रंग रूप का पता भी नहीं ,
कोई चेहरा नहीं पहचान नहीं।

केवल एक एहसास है ,
वहां किसी के होने का ,
प्यार - अपनेपन का ,
हम दोनों रहते हैं प्यार से ,
जैसे सोचते थे ,
चाहते थे मगर रह पाए नहीं जीवन भर।

कई बार नींद टूटी ,
मगर जागना नहीं चाहा ,
फिर से सो जाता ,
और देखने लगता वही सपना।




काश जागता न कभी मैं ,

आज सुबह के उस सपने से ,
लोग कहते हैं ,
सुबह के सपने सच हो जाते हैं।




सच हो जाए काश ,

मेरा आज का वही सपना। 

ग़ज़ल 1 2 8 ( ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है ) - लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है - लोक सेतिया "तनहा"

ख़ुदकुशी न करने की कसम निभाई है ,
ज़िंदगी हमें जिस मोड़ पर भी लाई है।

झूमकर हमारी मौत पर सभी नाचें ,
आरज़ू सभी को आखिरी बताई है।

किस तरह जिया है, किस तरह मरा कोई ,
ग़म नहीं किसी को रस्म बस निभाई है।

कब तलक सहें हम ज़ुल्म इन खुदाओं के ,
इंतिहा हुई अब , ए खुदा दुहाई है।

है बहुत अंधेरी शाम आज की लेकिन ,
हो रही सुबह पैगाम ये भी लाई है।

है गुनाह क्यों दुनिया में प्यार करना भी ,
तूं बता ज़माने क्यों नज़र चुराई है।

चार दिन को आये सब यहां मुसाफिर हैं ,
पर नहीं किसी ने राह तक दिखाई है।

अब नहीं मिलेंगे इंतज़ार मत करना ,
कह गया है कोई , ज़िंदगी पराई है।

छोड़ उस जहां को आ गये यहां "तनहा" ,
क्या हसीं नज़ारा ,जब हुई रसाई है।

Wednesday, 10 October 2012

जाँच आयोग ( हास्य व्यंग्य कविता ) 9 भाग तीन - डॉ लोक सेतिया

जांच आयोग ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

काम नहीं था ,
दाम नहीं था ,
वक़्त बुरा था आया ,
ऐसे में देर रात ,
मंत्री जी का संदेशा आया ,
घर पर था बुलाया।

नेता जी ने अपने हाथ से उनको ,
मधुर मिष्ठान खिलाया ,
बधाई हो अध्यक्ष ,
जांच आयोग का तुम्हें बनाया।

खाने पीने कोठी कार ,
की छोड़ो चिंता ,
समझो विदेश भ्रमण का ,
अब है अवसर आया।

घोटालों का शोर मचा ,
विपक्ष ने बड़ा सताया ,
नैया पार लगानी तुमने ,
सब ने हमें डुबाया।

जैसे कहें आंख मूंद ,
सब तुम करते जाना ,
रपट बना रखी हमने ,
बिलकुल न घबराना।

बस दो बार ,
जांच का कार्यकाल बढ़ाया ,
दो साल में रपट देने का ,
जब वक़्त था आया।

आयोग ने मंत्री जी को ,
पाक साफ़ बताया ,
उसने व्यवस्था को ,
घोटाले का दोषी पाया।

लाल कलम से ,
फाइलें कर कर काली ,
खोदा पर्वत सारा ,
और चुहिया मरी निकाली।        

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) 8 भाग तीन - डॉ लोक सेतिया

सवाल है ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

जूतों में बंटती दाल है ,
अब तो ऐसा हाल है ,
मर गए लोग भूख से ,
सड़ा गोदामों में माल है।

बारिश के बस आंकड़े ,
सूखा हर इक ताल है,
लोकतंत्र की बन रही ,
नित नई मिसाल है।

भाषणों से पेट भरते ,
उम्मीद की बुझी मशाल है,
मंत्री के जो मन भाए ,
वो बकरा हलाल है।

कालिख उनके चेहरे की ,
कहलाती गुलाल है,
जनता की धोती छोटी है ,
बड़ा सरकारी रुमाल है।

झूठ सिंहासन पर बैठा ,
सच खड़ा फटेहाल है,
जो न हल होगा कभी ,
गरीबी ऐसा सवाल है।

घोटालों का देश है ,
मत कहो कंगाल है,
सब जहां बेदर्द हैं ,
बस वही अस्पताल है।

कल जहां था पर्वत ,
आज इक पाताल है,
देश में हर कबाड़ी ,
हो चुका मालामाल है।

बबूल बो कर खाते आम ,
हो  रहा कमाल है,
शीशे के घर वाला ,
रहा पत्थर उछाल है।

चोर काम कर रहे ,
पुलिस की हड़ताल है,
हास्य व्यंग्य हो गया ,
दर्द से बेहाल है।

जीने का तो कभी ,
मरने का सवाल है।
ढूंढता जवाब अपने ,
खो गया सवाल है।

Tuesday, 9 October 2012

तीन छोटी कवितायेँ ( पूँजी // शोर // फुर्सत ) डॉ लोक सेतिया - 5 5 भाग दो

1     पूंजी ( कविता )

सफलता की बता कर बातें ,
बांटनी चाही खुशियां ,
दोस्तों के संग।

प्रतिद्वंदी बन गये  ,
दोस्त सब ,
लगे करने ईर्ष्या मुझ से।

मिले जितने भी दुःख दर्द ,
दोस्तों से,सभी अपनों से ,
दुनिया वालों से छुपा कर ,
रखे अपने सीने में।

दर्द की वो सारी दौलत ,
है बाकी मेरे पास ,
नहीं समाप्त होगी ,
जो जीवन प्रयन्त।

2      शोर ( कविता )

वो सुनता है ,
हमेशा सभी की फ़रियाद ,
नहीं लौटा कभी कोई ,
दर से उसके खाली हाथ।

शोर बड़ा था ,
उसकी बंदगी करने वालों का ,
शायद तभी ,
नहीं सुन पाया ,
मेरी सिसकियों की ,
आवाज़ को आज खुदा।

3   फुर्सत ( कविता  )

मुझे पता चला ,
दुखों का पर्वत टूटा,
तुम्हारे तन मन पर।

निभानी तो है औपचारिकता ,
सांत्वना व्यक्त करने की ,
मगर करूं क्या ,व्यस्त हूं ,
अपनी दुनिया में मस्त हूं।

फुर्सत नहीं है ,
ज़रा भी अभी ,
आऊंगा तुम्हारे पास ,
मैं दिखावे के आंसू बहाने ,
मिलेगी जब कभी फुर्सत मुझे।             

दृष्टि भ्रम ( कविता ) डॉ लोक सेतिया -- 5 4 भाग दो

दृष्टि भ्र्म ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

शहर में आता है ,
नया अफसर ,
जब भी कोई ,
करता है दावा ,
नहीं मैं पहले जैसे ,
अफसरों जैसा।

पत्रकार वार्ता में ,
देता है बयान ,
मैं कर दूंगा दूर ,
जनता की सब समस्याएं ,
लगा करेगा ,
मेरा खुला दरबार ,
आ सकता है कोई भी ,
करने फरियाद  ,
मुझे होगी बेहद ख़ुशी ,
कर इस शहर वालों की सेवा ,
उन से पहले भी ,
हर इक अफसर ने ,
दिया था बयान यही ,
दिया करेंगे यही फिर ,
उनके बाद आने वाले भी।
 
बदलते रहेंगे अफसरान ,
रहेगा मगर हमेशा ,
उनका वही बयान ,
न बदला कभी ,
न बदलेगा कभी ,
प्रशासन और सरकार का बना बयान।




पढ़ सुन कर उनका बयान ,

कर उस पर एतबार ,
कोई चला जाए उनके दरबार ,
और करे जाकर उनसे ,
कर्तव्य निभाने की कभी बात  ,
लगता तब उनको ,
दे रहा चुनौती कोई सरकार को ,
सत्ता के उनके अधिकार को ,
जो न माने उसका उपकार ,
हो जाती नाराज़ है उससे सरकार।

कहलाता है जनसेवक ,
लेकिन शासक होता है शासक ,
आम है जनता अफसर हैं ख़ास ,
लाल बत्ती वाली उसकी कार ,
सुरक्षा कर्मी भी है साथ ,
है निराली उसकी शान ,
धरती के लोग जनता ,
अफसरों के लिए ,
ऊंचा आसमान।

लेकिन इक दिन ,
वो भी आता है ,
अफसर न अफसर कहलाता है ,
पद न उसका रह  जाता है ,
आम नागरिक बन तब ,
उसको है समझ आता ,
रहने को केवल धरती है ,
उड़ते थे जिस आकाश में ,
नहीं उसका कोई भी अस्तित्व ,
उसका वो नीला रंग ,
है मात्र एक दृष्टि भ्रम।         

Monday, 8 October 2012

फूल पत्थर के ( कविता ) डॉ लोक सेतिया -- 5 3 भाग दो

                     फूल पत्थर के ( कविता )

साहित्य में ,
बड़ा है उनका नाम ,
गरीबों के हमदर्द हैं ,
कुछ ऐसी बनी हुई ,
उनकी है पहचान।

गरीब बेबस शोषित लोग ,
उनकी रचनाओं के ,
होते हैं पात्र ,
मानवता के दर्द ,
की संवेदना ,
छलकती नज़र ,
आती है उनके शब्दों से।

मिले हैं दूर से ,
कई बार उनसे ,
उनके लिए ,
बजाई हैं तालियां ,
आज गये हम उनके घर ,
उनसे  करने को मुलाक़ात।

देखा जाकर वहां ,
नया एक चेहरा उनका ,
उनके घर के ,
कई काम करता है ,
किसी गरीब का ,
बच्चा छोटा सा ,
खड़ा था सहमा हुआ ,
उनके सामने ,
कह रहा था ,
हाथ जोड़ रोते हुए ,
मेरा नहीं है कसूर ,
कर दो मुझे माफ़।

लेकिन रुक नहीं रहे थे ,
उनके नफरत भरे बोल ,
घायल कर रहे थे ,
उनके अपशब्द ,
एक मासूम को ,
और मुझे भी ,
जो सुन रहा था हैरान हो कर।

डरने लगा था मन मेरा ,
देख उनके चेहरे पर ,
क्रूरता के भाव ,
उतर गया था जैसे ,
उनका मुखौटा ,
वो खुद लगने लगे थे ,
खलनायक ,
अपनी ही लिखी कहानी के।

लौट आया था मैं उलटे पांव ,
वे वो नहीं थे ,
जिनसे मिलने की ,
थी मुझे तमन्ना।
आजकल बिकते हैं बाज़ार में ,
कुछ खूबसूरत फूल,
पत्थर के बने हुए भी ,
लगते हैं हरदम ताज़ा ,
पास जाकर छूने से ,
लगता है पता ,
नहीं फूलों सी कोमलता का ,
उनमें कोई एहसास।

मुरझाते नहीं ,
मगर होते हैं संवेदना रहित ,
खुशबू नहीं बांटते ,
पत्थर के फूल कभी। 

नये चलन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया -- 5 2 भाग दो

नये चलन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

छोड़ गये डूबने वाले का हाथ

लोग सब कितने समझदार हैं

हैं यही बाज़ार के दस्तूर अब

जो बिक गये वही खरीदार हैं।

जीते भी, मरते भी उसूलों पर थे

न जाने होते वो कैसे इंसान थे

उधर मोड़ लेते हैं कश्ती का रुख

जिधर को हवा के अब आसार हैं।

किया है वादा, निभाना भी होगा

कभी रही होंगी ऐसी रस्में पुरानी

साथ जीने और मरने की कसमें

आजकल लगती सबको बेकार हैं।

लोग अजब ,अजब सा शहर है

देखते हैं सुनते हैं बोलते नहीं हैं 

सही हुआ, गलत हुआ, सोचकर

न होते कभी भी खुद शर्मसार हैं।    

Sunday, 7 October 2012

समझना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 5 1 भाग दो

समझना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

समझता हूं मेरे पास सब कुछ है  ,     समझना है नहीं कुछ भी पास मेरे।

समझता हूं बहुत कुछ जनता हूं  ,      समझना है नहीं मैं जानता कुछ भी।

समझता हूं खुद को बलशाली बहुत  , समझना है बड़ा ही  कमज़ोर हूं मैं।

समझता हूं मेरे साथी है कितने  ,       समझना है नहीं अपना है कोई।

समझता हूं अपने आप को दाता ,     समझना है हूं मैं बस इक भिखारी।

समझता हूं कर सकता सभी कुछ ,    समझना है नहीं कुछ हाथ में मेरे।

समझता हूं मेरा दुश्मन ज़माना है ,   समझना है खुद ही अपना हूं दुश्मन।

समझता हूं मेरे हैं राज़दार कितने ,     समझना है नहीं हमराज़ ही कोई।

समझता हूं  मैं ज़िंदा आदमी हूं ,       समझना है  होती ज़िंदगी क्या है।

समझता हूं ,समझ पाता नहीं हूं ,     समझना है अभी मुझको क्या क्या। 

मिलावट ( कविता ) डॉ लोक सेतिया - 6 भाग एक

मिलावट ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

यूं हुआ कुछ लोग अचानक मर गये ,
मानो भवसागर से सारे तर गये।

मौत का कारण मिलावट बन गई ,
नाम ही से तेल के सब डर गये।

ये मिलावट की इजाज़त किसने दी ,
काम रिश्वतखोर कैसा कर गये।

इसका ज़िम्मेदार आखिर कौन था ,
वो ये इलज़ाम औरों के सर धर गये।

क्या हुआ ये कब कहां कैसे हुआ ,
कुछ दिनों अखबार सारे भर गये।

नाम ही की थी वो सारी धर-पकड़ ,
रस्म अदा छापों की भी कुछ कर गये।

शक हुआ उनको विदेशी हाथ का ,
ये मिलावट उग्रवादी कर गये।

सी बी आई को लगाओ जांच पर ,
ये व्यवस्था मंत्री जी कर गये। 

प्यार की आरज़ू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 8 भाग एक

प्यार की आरज़ू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बहार की करते करते आरज़ू ,
मुरझा गए सब चमन के फूल ,
खिज़ा के दिन हो सके न कम  ,
यूं जिए हैं उम्र भर हम।

हमने तो इंतज़ार किया ,
उनके वादे पे एतबार किया ,
हम हैं उनके और वो हमारे हैं ,
पर इक नदी के दो किनारे हैं।

सब को हर चीज़ नहीं मिलती ,
नादानी है चाँद छूने की तमन्ना ,
हमीं न समझे इतनी सी बात ,
कि ज़िंदगी है यूं ही चलती।

प्यार की जब कभी बात होती है ,
आती हैं याद बातें तुम्हारी ,
इक खुशबू सी महकती है ,
चांदनी जब भी रात होती है।   

Saturday, 6 October 2012

खुदा से बात ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 5 0 भाग दो

                      खुदा से बात ( कविता )

कहते हैं लोग ,
दुनिया में अच्छा-बुरा ,
जो भी होता है ,
सब होता है ,
तेरी ही मर्ज़ी से। 
अन्याय अत्याचार ,
धर्म तक का होता है ,
इस दुनिया में कारोबार।

तेरी मर्ज़ी है इनमें ,
मैं कर नहीं सकता ,
कभी भी स्वीकार।

सिर्फ इसलिए ,
कि याद रखें ,
भूल न जाएं तुझको ,
देते हो सबको ,
परेशानियां ,दुःख दर्द ,
समझते हैं ,
दुनिया के  कुछ लोग।

ऐसा तो करते हैं ,
कुछ  इंसान ,
कर नहीं सकता ,
खुद भगवान।

खुदा नहीं हो सकता ,
अपने बनाए इंसानों से ,
इतना बेदर्द ,
निभाता होगा अपना हर फ़र्ज़।

लगता है ,
कर दिया है बेबस तुझको ,
अपने ही बनाए इंसानों ने ,
जैसे माता पिता ,
हैं यहां बेबस संतानों से।

अपने लिए सभी ,
करते तुझ से प्रार्थना ,
मैं विनती कर रहा हूँ ,
पर तेरे लिए ,
बचा लो इश्वर अपनी ही शान ,
फिर से बनाओ अपना ये जहान ,
होगा हम सब पर एहसान।

अब फिर बनाओ ,
दुनिया इक ऐसी ,
चाहते हो तुम खुद जैसी ,
अच्छा प्यारा खूबसूरत ,
बनाओ इक ऐसा फिर से जहां ,
जिसमें न हो ,
दुःख दर्द कोई ,
मिलती हों सबको खुशियां।

अन्याय , अत्याचार का ,
जिसमें न हो निशां ,
ऐ खुदा ,
अब बनाना ,
इक ऐसी नई दुनिया।

Friday, 5 October 2012

ग़ज़ल 1 5 8 ( क्या ज़माने ने की खता मौला ) - लोक सेतिया "तनहा"

क्या ज़माने ने की ख़ता मौला - लोक सेतिया "तनहा"

क्या ज़माने ने की खता मौला ,
मिल रही सब को क्यों सज़ा मौला।

क्या हुआ खुशिओं से भरा दामन ,
सब की झोली में कुछ गिरा मौला।

हाल दुनिया का हो गया कैसा ,
खुद कभी आ कर देखता मौला।

दर्द इतने सबको दिए कैसे ,
दर्द मिटने की दे दवा मौला।

लोग जीने से आ चुके आजिज़ ,
कौन जाने है क्या हुआ मौला।

किसलिये  दुनिया को बनाया था ,
बैठ कर इक दिन सोचता मौला।

ख़त्म हो जाएं नफरतें सारी ,
कह रहा "तनहा" कर दिखा मौला।

Thursday, 4 October 2012

सीख लें हम भी जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 9 भाग दो

सीख लें हम भी जीना ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

ईश्वर देता है ,
हम सब को जीवन ,
जीना होता है ,
हमें स्वयं ,
किसे कहते हैं ,
लेकिन जीना ,
शायद जानते नहीं ,
हम सब।

अक्सर नहीं ,
सीख पाते हम ,
किस तरह ,
जीना है हमको ,
नहीं है कोई ,
जो सिखा सकता,
है कैसे जीना सबको।

खुद सीखना होता है सभी को ,
जीने का भी सलीका ,
कई बार उम्र ,
गुज़र जाती है ,
नहीं सीख पाते ,
हम जीने का तरीका।

जीना है कैसे ,
सीखते सीखते,
कट जाता पूरा ही जीवन ,
और वक़्त ही नहीं बचता ,
कि जी सकते कभी हम।
 
लोग उलझे हैं ,
केवल इन सवालों में ,
कितना जिए ,
कैसे जिए ,
बेकार की उलझन है ये।

कितना अच्छा हो सब लोग ,
भुला कर बाकी ,
सारे सवालों को ,
तलाश करें ,
बस एक ही सवाल का ,
सही जवाब ,
किसे कहते हैं जीना ,
तभी तो जी सकेंगे ,
हम अपने जीवन को। 

ग़ज़ल 1 5 7 ( बना लो सभी के दिलों को ठिकाना ) - लोक सेतिया "तनहा"

बना लो सभी के दिलों को ठिकाना - लोक सेतिया "तनहा"

बना लो सभी के दिलों को ठिकाना ,
तुम्हें याद करता रहेगा ज़माना।

कभी काम ऐसा नहीं दोस्त करते ,
जिसे खुद बनाया उसी को मिटाना।

बहुत दूर मंज़िल ,हैं राहें भी मुश्किल ,
न रुकना कभी तुम तुम्हें चलते जाना।

इबादत तो कोई तिजारत नहीं है ,
सभी को पता है न कोई भी माना।

हमें कल था आना ,नहीं आ सके पर ,
यही हर किसी से सुना है बहाना।

अभी साथ तेरा सभी लोग देते ,
न कोई भी आए हमें तब बुलाना।

वहीं जाल होगा शिकारी किसी का ,
नज़र आ रहा है जहां पर भी दाना।

बड़ी रौनकें कल यहां पर लगी थी ,
हुआ आज वीरान क्यों कर बताना।

रहा जगता रात भर आज "तनहा" ,
अभी सो रहा है न उसको जगाना।

Wednesday, 3 October 2012

दावे ही दावे हैं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 8 भाग दो

दावे ही दावे हैं ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

चाबुक अर्थशास्त्र का जब चलता ,
संवेदना का नहीं होता काम  ,
सत्ता की तलवार देती हमेशा  ,
घायल कर अपना पैगाम।

जीत हार सब पहले से तय है  ,
झुका ले जनता अपना माथ ,
शासन के कुण्डल कवच और ,
बंधे हुए सब लोगों के हाथ।

चाकलेट खा भर लो पेट ,
नहीं अगर घर में हो रोटी,
सरकार कह रही क़र्ज़ लो ,
नुचवाओ फिर बोटी बोटी।

अंधेरा करता दावा है देखो ,
रौशनी वही अब लाएगा ,
कातिल खुद सच से कहता ,
मुझ से कब तक बच पाएगा।

कराह रही मानवता तक है  ,
झेल झेल कर नित नित बाण ,
नैतिकता का पतन हो रहा ,
कैसा हो रहा भारत निर्माण।

सरकारी ऐसे विज्ञापन ,
जिस जिस को भरमाएंगे ,
मांगने अधिकार गये जब ,
क्या घर वापस आ पाएंगे।

आशियाँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 7 भाग दो

आशियां ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अपना इक आशियां बनाने में ,
अपनी सारी उम्र लगा दी थी।

और सारे जहां से दूर कहीं ,
एक दुनिया नई बसा ली थी।

फूल कलियां चांद और तारे ,
इन सभी से नज़र चुरा ली थी।

खूबसूरत सा घर बनाया था ,
प्यार से खुद उसे सजाया था।

आह ! मगर बदनसीबी अपनी ,
खुद ही अपना जहां लुटा बैठे।

इतनी ख़ुशी कि जश्न मनाने में ,
हम आशियां को ही जला बैठे। 

Friday, 28 September 2012

तीन छोटी छोटी नज़्म ( भाग एक में शामिल ) डॉ लोक सेतिया


जो भूला लोकतंत्र आचार  ,
हुई सत्ता की जय जयकार।

चुना था जिनको हमने ,वही ,
बिके हैं आज सरे-बाज़ार।

लुटा कर सब कुछ भी अपना ,
बचा ली है उसने सरकार।

टांक तो रक्खे हैं लेबल ,
मूल्य सारे ही गए हैं हार।

देखिए उनकी कटु-मुस्कान ,
नहीं लगते अच्छे आसार। 
2
कहने को तो बयान लगते हैं ,
खाली लेकिन म्यान लगते हैं।

वोट जिनको समझ रहे हैं आप ,
आदमी बेजुबान लगते हैं।

हैं वो लाशें निगाह बानों की ,
आपको पायदान लगते हैं।

ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए ,
देश के वो किसान लगते हैं।

लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन ,
बेखबर साहिबान लगते हैं।

  3

बेदिली से दुआ की है ,
तुमने भारी खता की है।

मारकर यूं ज़मीर अपना ,
खुद से तुमने जफ़ा की है।

बढ़ गया है मरज़ कुछ और ,
ये भी कैसी दवा की है।

तुम सज़ा दो गुनाहों की ,
हमने ये इल्तिज़ा की है।

बिक गये चन्द सिक्कों में ,
बात शर्मो-हया की है। 

Thursday, 27 September 2012

ग़ज़ल 1 5 6 ( हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत ) - लोक सेतिया "तनहा"

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत - लोक सेतिया "तनहा"

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत ,
किसी दिलरुबा की मिली जब मुहब्बत।

गये भूल जैसे सभी लोग जीना,
कहो जा के उनसे करें सब मुहब्बत।

नहीं मिल रहा है सभी ढूंढते हैं ,
मिलेगा खुदा जब बनी रब मुहब्बत।

चले जो मिटाने वो खुद मिट गये थे ,
कोई लाख चाहे मिटी कब मुहब्बत।

सिखाया है उनको यही बोलना बस,
कहेंगे हमेशा मेरे लब मुहब्बत।

नहीं नफरतों से मिलेगा कभी कुछ ,
उसे छोड़ कर तुम करो अब मुहब्बत।

किसे चाहते हो किसे दिल दिया है ,
कहेगी किसी से किसी शब मुहब्बत।

वही ज़िंदगी प्यार जिसमे भरा हो ,
है जीने का "तनहा" यही ढब मुहब्बत।

मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 6 भाग दो

मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

अक्सर आता है मुझे याद  ,
पहला दिन कालेज का ,
झाड़ियों के पीछे ,
पत्थरों पर बैठे हुए थे हम दोनों ,
कालेज के लान में ,
रैगिंग से हो कर परेशान  ,
कितने उदास थे हम  ,
कितने अकेले अकेले ,
पहले ही दिन कुछ ही पल में ,
हम हो गये थे कितने करीब।

अठारह बरस है अपनी उम्र  ,
आज भी लगता है कभी ऐसे ,
कितनी यादें हैं अपनी ,
जो भुलाई नहीं जाती  ,
भूलना चाहते भी नहीं थे हम कभी ,
पहली बार मुझे मिला था दोस्त ऐसा  ,
जो जानता था ,
पहचानता था मुझे वास्तव में।

बीत गये वो दिन कब जाने ,
छूट गया वो शहर ,
उसका बाज़ार ,
गलियां उसकी ,
बरसात में भीगते हुए   ,
हमारा कुछ तलाश करना ,
बाज़ार से तुम्हारे लिये ,
खो गई सपनों जैसी ,
प्यारी दुनिया हमारी।
 
मगर भूले नहीं हम ,
कभी वो सपने ,
जो सजाए थे मिलकर कभी  ,
अचानक तुम चले गए वहां ,
जहां से आता नहीं ,
लौटकर कोई।

मुझे नहीं मिला ,
फिर कोई दोस्त तुम सा  ,
खाली है मेरे जीवन में ,
इक जगह ,
रहते हो अब भी तुम वहां  ,
आज भी सोचता हूँ ,
जाकर ढूंढू  ,
उन्हीं रास्तों पर तुम्हें जहां ,
चलते रहे ,
दोनों यूं ही शामों को ,
अब कहां मिलते हैं ,
इस दुनिया में तुझसे दोस्त।

अब क्या है इस शहर में ,
इस दुनिया में ,
बिना तेरे मेरी जान मेरे दोस्त।

                    ( ये कविता मेरे दोस्त डॉ बी डी शर्मा , बीडी के नाम )

Wednesday, 26 September 2012

कोई ( कविता ) 4 5 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

    कोई ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कोई है धड़कन दिल की
कोई राहों की है धूल।

कोई शाख से टूटा पत्ता
कोई डाली पे खिला फूल।

कोई आंसू मोती जैसा
कोई हो जैसे कि पानी।

कोई आज के दौर की चर्चा
कोई भूली हुई कहानी।

कोई कविता ग़ज़ल हो जैसे
कोई बीते कल का अखबार।

कोई कहीं पर डूबी नैया
कोई माझी संग पतवार।

कोई सूना आंगन मन का
कोई है दिल का अरमान।

कोई अपने घर को भूला
कोई घर घर का महमान।

कोई नहीं कभी बिकता है
कोई बताता अपना दाम।

कोई है आगाज़ किसी का
कोई किसी का है अंजाम। 

Monday, 24 September 2012

ऐसा भी कोई तो हो ( कविता ) 4 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

ऐसा भी कोई तो हो ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अपना ले जो मुझे ,
मैं जैसा भी हूं।

हर दिन मुझको ,
न करवाए एहसास ,
मेरी कमियों का बार बार।

सोने चांदी से नहीं ,
धन दौलत से नहीं ,
प्यार हो जिसको इंसान से,
इंसानियत से। 

जिसको आता ही न हो,
मेरी ही तरह ,
दुनिया का लेन-देन का ,
कोई कारोबार।

थाम कर जो ,
फिर छोड़ जाए न कभी साथ  ,
रिश्ते-नातों को ,
जो समझे न इक व्योपार ,
जिसको आता हो ,
बहाना आंसू ,
हर किसी के दुःख दर्द में।

नफरत न हो जिसे ,
अश्क बहाने से ,
जिसमें बाकी हों ,
मानवता की संवेदनाएं ,
जन्म जन्म से ढूंढ रहा हूं ,
उसी को मैं।      

Sunday, 23 September 2012

तीन नये दृश्य ( कविता ) 4 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

तीन नये दृश्य ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

उसे निकाल दिया है ,
घर से उन्होंने ,
जो करते हैं,
उसी की बातें  ,
ईश्वर खड़ा ,
चुपचाप कहीं बाहर।

बहुत व्यस्त हैं लोग  ,
कर रहे तलाश सच की  ,
दफ्तरों में बैठकर।

करते हैं बस यही चर्चा  ,
सच को बचाना है  ,
सच ,
घायल हुआ ,
आता है ,
जब उनके पास ,
करता उनसे सवाल ,
पहचाना मुझे।

कौन हो तुम ,
क्यों आये हो ,
तुम हमारे पास ,
कहते हैं  वो ,
जो बने फिरते हैं ,
सच के  पैरोकार।

लोकतंत्र का है मंदिर  ,
करते नेता ,
उसका गुणगान ,
जनता दर्शन को तरसी ,
छुपा कहां है वो भगवान ,
आ रही जाने किधर से ,
बचाने की फ़रियाद  ,
कराह रहा लोकतंत्र  ,
मुझको कर दो आज़ाद।

समाप्त होने लगी ,
गूंगो बहरों की ये आशा  ,
देख रहे सारे नेता,
खत्म हो कब तमाशा।

हारने लगी अब ज़िंदगी  ,
लड़ते लड़ते मौत से ,
अब नहीं आता ,
कोई भी बचाने को उसे ,
हो रहा सामान ,
बस डुबाने को उसे  ,
सहमें सहमें हैं सभी ,
अब हमारे देश में ,
राज रावण हैं  करते ,
राम ही के भेस में।

गावं गावं ,
शहर शहर ,
गली गली है डर ,
लोकतंत्र जिंदा है अभी ,
या वो चुका है मर।

नाव डुबोते माझी  ,
माली चमन उजाड़ रहे  ,
कैनवास पर चित्रकार ,
कैसी  तस्वीरें उतार रहे ,
आलीशान घरों को  ,
सजाएंगी उनकी तस्वीरें ,
खो बैठेंगी ,
अपना वास्तविक अर्थ ,
रह जाएगा केवल बाकी ,
उनके ऊंचे दामों का इतिहास। 

रास्ते ( कविता ) 4 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

     रास्ते ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मंज़िल की ,
जिन्हें चाह थी ,
मिल गई ,
उनको मंज़िल।

मैं वो रास्ता हूं ,
गुज़रते रहे ,
जिससे हो कर  ,
दुनिया के सभी लोग ,
तलाश में ,
अपनी अपनी ,
मंज़िल की  ,
मैं रुका हुआ हूं ,
इंतज़ार में प्यार की।
 
रुकता नहीं ,
मेरे साथ कोई भी  ,
कुचल कर ,
गुज़र जाते हैं सब ,
मंज़िल की तरफ आगे।
 
सबको भाती हैं मंज़िलें  ,
बेमतलब लगते हैं रास्ते ,
क्या मिल पाती ,
तुम्हें मंज़िलें  ,
न होते जो रास्ते ,
रास्तों को पहचान लो  ,
उनका दर्द ,
कभी तो जान लो।

हमारा अपना ताज ( कविता ) 4 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

  हमारा अपना ताज ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मुमताज क्या चाहती थी ,
किसे पता ,
उसे क्या मिला ,
ताज बनने से ,
बनवा दिया ,
एक राजा ने ,
एक महल ,
संगेमरमर का ,
अपनी प्रेमिका ,
की याद में ,
और कह दिया ,
दुनिया ने ,
मुहब्बत की निशानी उसे।

तुम नहीं बनवा सकोगे ,
ताजमहल कोई  ,
मेरी याद में ,
मेरे बाद ,
मगर जानती हूं मैं ,
तुम चाहते हो बनाना  ,
एक छोटा सा घर मेरे लिये   ,
जिसमें रह सकें ,
हम दोनों प्यार से।

अपना बसेरा बनाने के लिये  ,
हमारी पसंद का कहीं पर ,
हर वर्ष बचाते हो ,
थोड़े थोड़े पैसे  ,
अपनी सीमित आमदनी में से  ,
किसी ताज महल से ,
कम खूबसूरत नहीं होगा  ,
हमारा प्यारा सा वो घर ,
मुमताज से कम ,
खुशकिस्मत नहीं हूं मैं  ,
प्यार तुम्हारा ,
कम नहीं है ,
किसी शाहंशाह से।

Saturday, 22 September 2012

मृगतृष्णा ( कविता ) 4 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

   मृगतृष्णा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

हम चले जाते हैं उनके पास  ,
निराशा और परेशानी में  ,
सोचकर कि वे कर सकते हैं ,
जो हो नहीं पाता है  ,
कभी भी हमसे।
 
वे जानते हैं वो सब  ,
नहीं जो भी हमें मालूम ,
तब वे बताते हैं हमें ,
कुछ दिन , महीने , वर्ष ,
रख लो थोड़ा सा धैर्य  ,
सब अच्छा है उसके बाद ,
हमें मिल जाती है  ,
इक तसल्ली सी  ,
सोचकर कि आने वाले हैं ,
दिन अच्छे हमारे।

कट जाती है उम्र इसी तरह  ,
झेलते दुःख , परेशानियां  ,
और जी लेते हैं हम ,
आने वाले अच्छे दिनों की ,
झूठी उम्मीद के सहारे।

टूटने लगता है जब धैर्य  ,
डगमगाने लगता है विश्वास  ,
फिर चले जाते हैं  ,
हम बार बार उन्हीं के पास  ,
ले आते हैं वही झूठा दिलासा  ,
और नहीं कुछ भी उनके पास ,
उनका यही तो है कारोबार  ,
झूठी उम्मीदों ,दिलासों का।

शायद होती है ,
इस की ज़रूरत हमें ,
जीने के लिये ,जब ,
निराशा भरे जीवन में ,
नहीं नज़र आती ,
कोई भी आशा की किरण  ,
जो जगा सके ज़रा सी आशा  ,
झूठी ही सही।

सच साबित होती नहीं बेशक  ,
उनकी भविष्यवाणियां कभी भी  ,
तब भी चाहते हैं ,
बनाए रखें उन पर ,
अपना विश्वास  ,
ऐसा है ज़रूरी उनके लिए भी ,
शायद उससे अधिक हमारे लिये ,
जीने की आशा के लिए। 

विवशता ( कविता ) 3 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

        विवशता ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

खाली है मेरा भी दामन ,
तुम्हारे आंचल की तरह ,
कुछ भी नहीं पास मेरे ,
तुम्हें देने को।

तुम्हारी तरह है मुझे भी ,
तलाश एक हमदर्द की ,
मेरे मन में भी है बाकी ,
कोई अधूरी प्यास।

ढूंढती हैं ,
तुम्हारी नज़रें जो मुझ में  ,
कहने को लरजते हैं ,
तुम्हारे होंट बार बार ,
समझता हूँ लेकिन  ,
समझना नहीं चाहता मैं ,
प्यार भरी नज़रों की ,
तुम्हारी उस भाषा को।

छुप सकती नहीं ,
मन की कोमल भावनाएं  ,
जानते हैं हम दोनों।

मत आना मेरे करीब तुम  ,
भरे हुए हैं ,
अनगिनत कांटे ,
दामन में मेरे ,
हैं नाज़ुक उंगलियां तुम्हारी  ,
कहीं चुभ न जाए ,
शूल कोई उनको।

किसी को देने को कोई फूल  ,
लाल पीला या गुलाबी  ,
नहीं पास मेरे ,
कभी नहीं मिल पाएंगे  ,
हम तोड़ कर ,
दुनिया के सारे बंधनों को ,
बस आंखों ही आंखों में  ,
करते रहें बात हम ,
ख़ामोशी से यूं ही करें  ,
हर दिन मुलाक़ात हम।