दिसंबर 27, 2012

जब हुई दर्द से जान पहचान है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 जब हुई दर्द से जान पहचान है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जब हुई दर्द से जान पहचान है
ज़िंदगी तब हुई कुछ तो आसान है।

क़त्ल होने लगे धर्म के नाम पर
मुस्कुराने लगा देख हैवान है।

कुछ हमारा नहीं पास बाकी रहा
दिल भी है आपका आपकी जान है।

चार दिन ही रहेगी ये सारी चमक
लग रही जो सभी को बड़ी शान है।

लोग अब ज़हर को कह रहे हैं दवा
मौत का ज़िंदगी आप सामान है।

उम्र भर कारवां जो बनाता रहा
रह गया खुद अकेला वो इंसान है।

हम हुए आपके, आके "तनहा" कहें
बस अधूरा यही एक अरमान है।  

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