नवंबर 04, 2012

POST : 217 दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दौलतों से बड़ी मुहब्बत है 
हर किसी की हुई ये हालत है ।

बेच डाला ज़मीर तक अपना
देशसेवा बनी , तिजारत है ।

लोग चुप-चाप ज़ुल्म सहते हैं 
कौन करता यहां बगावत है ।

हमने दर्पण उन्हें दिखाया था 
बस इसी बात की अदावत है ।

आज दावा किया है ज़ालिम ने
उसके दम पर बची शराफत है ।
 
काश कोई हमें समझ लेता   
दिल में रहती अभी भी हसरत है ।
 
वो हमें गैर मानते तब भी  
हम हैं मज़बूर उनसे उल्फत है ।

झूठ को लोग सच समझते हैं 
सच परखने की किसको फुर्सत है ।
 
हम उसी राह चल रहे  ' तनहा ' 
बदलना राह उनकी फितरत है ।