सीएजी का कॉपीराइट ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया
हमारे सैंयां क्यों रूठे नाता अपना अटूट कभी न टूटे
शिक्षित परिश्रमी काबिल सभी गुण होकर भी हम तो
सामाजिक विषमताओं के जाल में फंसकर भटकते थे
कभी इधर कभी उधर नाकाम थे अनाम थे गुमनाम थे।
देश के सबसे बड़ी अदालत के सबसे बड़े न्यायाधीश
आपको अखरते हैं हिकारत से ही सही आपने समझा
करीब क्या दूर भी दिखाई नहीं देते हम किसी को भी
अनुकंपा की हमको नाम दिया कॉक्रोच हैं हम लोग ।
आपकी अनचाही संतान हैं जैसे गरीबों की बस्तियां
आपने बनाया है आपकी शरण में रहना नसीब अपना
आपकी इक बात से हम सभी जाग उठे हैं तमाम लोग
आपको बनाना चाहिए कॉक्रोच का कोई नया आयोग।
आपने अपना दामन छुड़ाना चाहा है फुर्सत नहीं कहा
अपनी ही निर्मित रचना से ऐसा बर्ताव ठीक नहीं जनाब
ख़त्म नहीं कर सकते हमको न अपने नाते को अब आप
आपको नहीं मालूम हमारी ताकत चलेगा इक अभियोग ।
दिल एक मंदिर की नायिका समझ बैठे हैं शायद आप हमें
अभागी गीत गाकर सुनाती है विवशता अपनी पति को
हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे तुम कहते भूल जाओ
पति के प्यार के पिंजरे में ही रहना उसकी नियति जीवन भर ।
हम कॉक्रोच आपकी बनाई व्यवस्था का शिकार कीड़े मकोड़े
आप महान कहलाते दुनिया भर के लिए पालक तारणहार हैं
याद करो कभी आप भी हम जैसी कोई किसी की संतान थे
अनगिनत परीक्षाओं बाद परिणाम कुछ नहीं कैसे वरदान थे ।
आपकी विवशता भी हम समझते हैं ख़त्म कर नहीं करते हैं
संविधान आपको सभी को एक समान न्याय देने के कहता है
आपको परेशानी है हम जैसों का ख़ात्मा नहीं कर सकते आप
आपने नामकरण किया था तभी कुछ न्याय की आस रखते हैं ।
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