दौलतों से बड़ी मुहब्बत है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"
दौलतों से बड़ी मुहब्बत हैहर किसी की हुई ये हालत है ।
बेच डाला ज़मीर तक अपना
देशसेवा बनी , तिजारत है ।
लोग चुप-चाप ज़ुल्म सहते हैं
कौन करता यहां बगावत है ।
हमने दर्पण उन्हें दिखाया था
बस इसी बात की अदावत है ।
आज दावा किया है ज़ालिम ने
उसके दम पर बची शराफत है ।
बेच डाला ज़मीर तक अपना
देशसेवा बनी , तिजारत है ।
लोग चुप-चाप ज़ुल्म सहते हैं
कौन करता यहां बगावत है ।
हमने दर्पण उन्हें दिखाया था
बस इसी बात की अदावत है ।
आज दावा किया है ज़ालिम ने
उसके दम पर बची शराफत है ।
काश कोई हमें समझ लेता
दिल में रहती अभी भी हसरत है ।
वो हमें गैर मानते तब भी
हम हैं मज़बूर उनसे उल्फत है ।
झूठ को लोग सच समझते हैं
सच परखने की किसको फुर्सत है ।
झूठ को लोग सच समझते हैं
सच परखने की किसको फुर्सत है ।
हम उसी राह चल रहे ' तनहा '
बदलना राह उनकी फितरत है ।
बदलना राह उनकी फितरत है ।
1 टिप्पणी:
Wahhh 👌
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