जो ख़ुदा हैं वही बस यहां रह रहे हैं ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
जो ख़ुदा हैं वही बस यहां रह रहे हैंजो थे इन्सान जाने कहां रह रहे हैं ।
लोग चुप हैं मगर , ख़ामोशी बोलती है
सिल चुकी हर जुबां हम जहां रह रहे हैं ।
फिर से जाना है वापस हमें उस गली में
यार सारे अभी तक वहां रह रहे हैं ।
यार सारे अभी तक वहां रह रहे हैं ।
पूछते लोग मिल कर नहीं साथ रहते
तुम सभी को बता दो कि हां रह रहे हैं ।
तुम सभी को बता दो कि हां रह रहे हैं ।
हमको जन्नत की चाहत न दोजख़ से डरते
हमसे बेहतर हैं अहले - जहां रह रहे हैं ।
हमसे बेहतर हैं अहले - जहां रह रहे हैं ।
खो गए आप , सब लोग कहने लगे हैं
किसलिए आप होकर निहां रह रहे हैं ।
प्यार करना नहीं जुर्म कोई है ' तनहा '
प्यार करना नहीं जुर्म कोई है ' तनहा '
लोग नाहक झुकाए , दहां रह रहे हैं ।

1 टिप्पणी:
अहा...बहुत अच्छे शेर
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