मार्च 14, 2026

POST : 2069 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

 
रिमझिम रिमझिम सी बरसात और होती  
ऐसी कोई  ,  मुलाक़ात और होती ।  
 
कहने को आज रंगीन थी वो महफ़िल
आते तुम भी अगर , बात और होती ।
 
कर लेते हम कभी दिल की उनसे बातें 
होता दिन और , वो रात और होती । 
 
दामन फ़ैला नहीं ये किसी के आगे 
झोली में वरना ख़ैरात और होती । 
 
जो इस दुनिया के बाज़ार में न बिकता 
ऐसे दूल्हे की , बरात और होती ।  
 
बाज़ी हारे थे हम , खेल खेल में ही 
खेले हम होते , शह - मात और होती ।  
 
दुनिया के दर्दो - ग़म सब मिटा दे कोई 
' तनहा ' ऐसी करामात और होती ।  
 

 
   

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