रिमझिम - रिमझिम सी बरसात और होती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
रिमझिम रिमझिम सी बरसात और होती
ऐसी कोई , मुलाक़ात और होती ।
कहने को आज रंगीन थी वो महफ़िल
आते तुम भी अगर , बात और होती ।
कर लेते हम कभी दिल की उनसे बातें
होता दिन और , वो रात और होती ।
दामन फ़ैला नहीं ये किसी के आगे
झोली में वरना ख़ैरात और होती ।
जो इस दुनिया के बाज़ार में न बिकता
ऐसे दूल्हे की , बरात और होती ।
बाज़ी हारे थे हम , खेल खेल में ही
खेले हम होते , शह - मात और होती ।
दुनिया के दर्दो - ग़म सब मिटा दे कोई
' तनहा ' ऐसी करामात और होती ।
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