Monday, 19 November 2012

हैं खुदा जो वही अब यहां रह रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       हैं खुदा जो वही अब यहां रह रहे हैं ( ग़ज़ल )

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हैं खुदा जो वही अब यहां रह रहे हैं ,
आदमी सब न जाने कहां रह रहे हैं।

बोलने की किसी को इजाज़त नहीं है ,
हर ज़ुबां सिल चुकी हम जहां रह रहे हैं।

ले चलो उस तरफ को जनाज़ा हमारा ,
यार सारे हमारे वहां रह रहे हैं।

लोग कहने लगे हम नहीं साथ रहते ,
तुम बता दो सभी को ,कि हां रह रहे हैं।

बाद मरने के जन्नत में जाकर ये देखा ,
हो गई भीड़ अहले जहां रह रहे हैं।

ढूंढता फिर रहा आपको है ज़माना ,
आप क्यों इस तरह बन निहां रह रहे हैं।

जुर्म साबित नहीं जब हुआ है तो "तनहा" ,
किसलिये फिर झुकाए दहां रह रहे हैं।

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