जून 20, 2026

POST : 2077 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

 बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 

बिकते जहां पे नेता , बाज़ार मिल गया है
भटके हुओं को आखिर घर- बार मिल गया है ।   
 
अपना नसीब इक दिन शायद बदल ही जाए 
हलवा उन्हें  , हमें बस आचार मिल गया है । 
 
जितने गुनाह उनके सब माफ़ हो गए हैं 
देखो यहां खुला इक दरबार मिल गया है । 
 
सोना जहां पड़ा था , दौलत जहां पड़ी थी 
सब लुट गया है ख़ाली भंडार मिल गया है । 
 
जंगल में अब भी बाक़ी कुछ पेड़ तो खड़े हैं 
कुछ लोग कह रहे हैं विस्तार मिल गया है । 
 
देखो यहां नया इक भगवान आ गया है 
लो आपको ये सारा संसार मिल गया है । 
 
सच बोलना मना है ' तनहा ' न कुछ भी कहना 
बस झूठ लिख रहा है अख़बार मिल गया है ।