देते हैं भगवान को धोखा ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया
कब तक धर्म और ईश्वर के नाम पर ठगों चोरों लुटेरों की तिजोरियां भरते रहोगे , सब कुछ सामने देख कर भी आंखों वाले अंधे बनकर अपनी मूर्खता को उचित ठहराते रहोगे । पहले अपने धर्म को समझने की आवश्यकता है समझने को पढ़कर चिंतन की ज़रूरत है । आपका धर्म आपको कभी नहीं कहता है कि आस्था के नाम पर सही गलत की पहचान ही मत करो बल्कि वास्तविक धर्म दीन दुखियों की गरीबों की भूखों की सहायता करना होता है ये संदेश देता है। धर्म और ईश्वर के नाम पर संचय करना कभी धर्म हो ही नहीं सकता है इसलिए आपको मानवधर्म समझ कर जितना संभव हो किसी ज़रूरतमंद की सहायता करनी चाहिए । भला ईश्वर को किसी से कुछ भी क्यों चाहिए होगा , भगवान के नाम पर जो अपना कारोबार व्यौपार करते हैं उनको अपने स्वार्थों से बढ़कर कुछ भी नहीं लगता है । आपको लोभ मोह माया का त्याग करने का उपदेश देने वाले खुद कितना अधिक खुद जमा किये हैं कोई दान पुण्य किसी की सहायता कदापि नहीं करते हैं बल्कि कुछ सामाजिक सेवा करने का दिखावा और आडंबर भी करते है तो खुद अपनी ख़ातिर । गरीबों पर रत्ती भर रहम नहीं करने वाली सरकार कुछ लोगों को कितनी ही कीमती ज़मीन कहने को एक रूपये में 90 साल को पटे पर देने का कार्य कर चोर चोर मौसेरे भाई का रिश्ता निभाती है ताकि वो लोग शासन की अनुचित और धर्म समाज विरोधी कार्यप्रणाली पर समर्थन देने का कार्य करें । ऐसे तमाम साधु सन्यासी क्या खुद धर्म और ईश्वर को समझते हैं ।
अगर आपको धर्म दान पुण्य करना है तो दिखावा करने और बदले में कुछ भी चाहत रखने की जगह ज़रूरतमंद लोगों की सहायता करना सही होगा । भगवान कोई हिसाब किताब नहीं रखता है कि आपने कितना चढ़ावा धन दौलत अर्पित की है ताकि बदले में आपको कुछ उपहार वरदान दे या फिर आपके बुरे कर्मों को माफ़ कर दे । ऐसा समझते हैं तो आपको भगवान को लेकर कुछ भी समझ नहीं है , ऊपरवाला सब देखता है जानता है और सही समय पर निर्णय न्याय भी करता है । ये अलग बात है कि हम समझ नहीं पाते हमको जो भी अच्छा बुरा परिणाम हासिल हुआ वो अपने ही बीजे हुए कर्मों का फल मिलता है। सुःख दुःख का परेशानियों का कारण हम खुद ही होते है कोई भी हमको बचा नहीं सकता अपने अच्छे बुरे कार्यों के परिणाम से। जिनसे आपको ऐसी उम्मीद आशा अपेक्षा रहती है खुद उनको भी कर्मफल का परिणाम मिलता है , सामने है सभी आपको समझ नहीं आता तो आपकी समझ पर निर्भर है । क्या आपने ईमानदारी से मेहनत से कमाई की है तो आपकी नेक कमाई किसी गलत कार्य में ऐसे व्यक्ति को नहीं देनी चाहिए जो दान का सही पात्र नहीं हो। किसी की चिकनी चुपड़ी बातों पर भरोसा कर ऐसे दान या सहायता नहीं देनी चाहिए जिसका गलत उपयोग किया जा सकता है और अगर ऐसा हुआ भी है तो आपको ऐसे लोगों संगठनों और संस्थानों का विरोध करना चाहिए जो धर्म ईश्वर और समाजसेवा की आड़ में अपनी तिजोरियां भरते हैं ।
छाई हुई घटा घनघोर है ( हास्य-कविता )
डॉ लोक सेतिया
चोर सबको कहता लुटेरा अजब तौर है ,
देश की सियासत का यही नया दौर है ।
अब अंधेरे उजालों को समझाने लगे हैं
बंद आंखों से देख समझो हो गई भौर है ।
सबको ये तमाशा लाज़मी देखना होगा
हम्माम में सभी नंगे है ये तो हर ठौर है ।
इक पहेली है सच क्या और झूठ क्या
लबों पर है कुछ दिल की बात और है ।
हमने इरादा किया बनाएंगे राह इक नई
फुर्सत मिले सोचते हैं काबिल ए गौर है ।
शहंशाह को भूख है जो मिटती ही नहीं है
छीन लो गरीबों से हाथ अगर इक कौर है ।
उनका दस्तूर है सब परस्तिश उनकी करें
उनकी मर्ज़ी जो चाहें वही ख़ुद सिरमौर है ।
खुद मसीहा है हर गुनाह उसका मुआफ़ है
जो है उसका मुख़ालिफ़ शख़्स वो चोर है ।
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