Wednesday, 21 November 2012

फिर नये सिलसिले क्या हुए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फिर नये सिलसिले क्या हुए ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फिर नये सिलसिले क्या हुए
सब पुराने गिले क्या हुए।

बीज बोये थे फूलों के सब 
गुल नहीं पर खिले क्या हुए।

इक अकेला मुसाफिर बचा
थे कई काफिले क्या हुए।

बात तक जब  नहीं हो सकी 
यार बिछुड़े मिले क्या हुए।

देखने सब उधर लग गये  
उनके पर्दे हिले क्या हुए।

इश्क ने तोड़ डाले सभी 
आपके सब किले क्या हुए।

साथ "तनहा" नहीं रह सके
खत्म फिर फासिले क्या हुए।

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