Saturday, 3 November 2012

हक़ तो जीने का नहीं है कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

हक़ तो जीने का नहीं है कोई ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

हक़ तो जीने का नहीं है कोई
फिर भी जीता ही कहीं है कोई।

आह भरना भी जहां होता गुनाह
रोया जा-के वहीं है कोई।

मौत की मिलके दुआएं मांगें
अब इलाज इसका नहीं है कोई।

आएगा वो मेरी मैयत पे ज़रूर
कब कहीं आता युं हीं है कोई।

किसको ढूंढे है नज़र , सहरा में
मिलता कब "तनहा" कहीं है कोई। 

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