Tuesday, 20 November 2012

बिकने लगी जब मां करोड़ों करोड़ में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       बिकने लगी जब मां करोड़ों करोड़ में ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बिकने लगी जब माँ करोड़ों करोड़ में
सब लोग शामिल हो गए खुद ही दौड़ में।

जीने के बारे सोचते लोग अब नहीं
सारा ज़माना लग गया जोड़ तोड़ में।

तुम वक़्त की रफ़्तार को रोकना नहीं
बचना नहीं आसान इस की मरोड़ में।

कैसे बतायें क्या लिखा क्या नहीं लिखा
मिलती कहां हर बात दुनिया के जोड़ में।

हम तो सभी को साथ लेते गये मगर
कुछ लोग खुद बिछुड़े बदल राह मोड़ में।

करने लगे हैं प्यार नेता भी देश से
उठने लगी हो खाज जैसे कि कोड़ में।

"तनहा" ज़माना दौड़ता और हांफता
शामिल  कभी होते नहीं आप होड़ में। 

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