Sunday, 11 November 2012

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ख़त्म बीज करने फसल आ रही है
न जाने ये कैसी नसल आ रही है।

नहीं ज़िंदगी की शिकायत करेंगे
हमें जब बुलाने अज़ल आ रही है।

किसी की अमानत उसी को है देनी
न जाये कहीं दिल फिसल आ रही है।

उसे याद अब तक है मिलने का वादा
वो वादा निभाने को कल आ रही है।

सभी ख़्वाब देखें , हक़ीकत न देखें
सियासत बताने ये हल आ रही है।

बहारों को लाने खिज़ा खुद गई है
रुको तुम अभी एक पल आ रही है।

सुनी और "तनहा" बहुत आज रोये
बिना काफ़िये की ग़ज़ल आ रही है।

No comments: