मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
मई 10, 2023
POST : 1661 करम गिनते हैं ज़ुल्म का हिसाब नहीं ( मेरी सरकार ) डॉ लोक सेतिया
मई 06, 2023
POST : 1660 ख़ुदा उनको फिर याद आने लगे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ख़ुदा उनको फिर याद आने लगे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
मई 04, 2023
POST : 1659 कैसी पढ़ाई कैसी लिखाई ( हास्य रस ) डॉ लोक सेतिया
कैसी पढ़ाई कैसी लिखाई ( हास्य रस ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 30, 2023
POST : 1658 72 साल की दास्तां ( मुसाफ़िर हूं मैं राहों का ) डॉ लोक सेतिया
नहीं उदास नहीं ( सफ़रनामा ) डॉ लोक सेतिया
मुझे लिखना है ( कविता )
कोई नहीं पास तो क्याबाकी नहीं आस तो क्या ।
टूटा हर सपना तो क्या
कोई नहीं अपना तो क्या ।
धुंधली है तस्वीर तो क्या
रूठी है तकदीर तो क्या ।
छूट गये हैं मेले तो क्या
हम रह गये अकेले तो क्या ।
बिखरा हर अरमान तो क्या
नहीं मिला भगवान तो क्या ।
ऊँची हर इक दीवार तो क्या
नहीं किसी को प्यार तो क्या ।
हैं कठिन राहें तो क्या
दर्द भरी हैं आहें तो क्या ।
सीखा नहीं कारोबार तो क्या
दुनिया है इक बाज़ार तो क्या ।
जीवन इक संग्राम तो क्या
नहीं पल भर आराम तो क्या ।
मैं लिखूंगा नयी इक कविता
प्यार की और विश्वास की ।
लिखनी है कहानी मुझको
दोस्ती की और अपनेपन की ।
अब मुझे है जाना वहां
सब कुछ मिल सके जहां ।
बस खुशियां ही खुशियां हों
खिलखिलाती मुस्कानें हों ।
फूल ही फूल खिले हों
हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।
वो सब खुद लिखना है मुझे
नहीं लिखा जो मेरे नसीब में ।
अप्रैल 29, 2023
POST : 1657 ठन - ठन की बात ( सत्ता का कॉमेडी शो ) डॉ लोक सेतिया
ठन - ठन की बात ( सत्ता का कॉमेडी शो ) डॉ लोक सेतिया
भूल जन की बात करते मन की बात , सुन चुके सब आपकी ठन ठन की बात ।
ख़त्म आखिर एक दिन होगा सब खेल , क्या मिटेगी भूख सुन राशन की बात ।
तोरा मन दर्पण कहलाये तोरा मन दर्पण कहलाये
भले बुरे सारे कर्मों को , देखे और दिखाये ।
मन ही देवता , मन ही ईश्वर , मन से बड़ा न कोय
मन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय
इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये ।
तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये
सुख की कलियाँ , दुख के कांटे , मन सबका आधार
मन से कोई बात छुपे ना , मन के नैन हज़ार
जग से चाहे भाग लो कोई , मन से भाग न पाये ।
तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये ।
भले बुरे सारे कर्मों को , देखे और दिखाये
तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये ।
अप्रैल 21, 2023
POST : 1656 बोझ ढोते झूठी विरासत का ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया
बोझ ढोते झूठी विरासत का ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया
ग़ज़ल
POST : 1655 विरासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
विरासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 20, 2023
POST : 1654 ज़मीं हो दर्द जैसे आस्मां खुशियां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ज़मीं हो दर्द जैसे आस्मां खुशियां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 19, 2023
POST : 1653 यह नया दौर है हर तरफ शोर था ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
यह नया दौर है हर तरफ शोर था ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 18, 2023
POST : 1652 सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
POST : 1651 बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बेदिली से दुआ की है
तुमने भारी खता की है ।
मारकर यूं ज़मीर अपना
खुद से तुमने जफ़ा की है ।
बढ़ गया है मरज़ कुछ और
ये भी कैसी दवा की है ।
तुम सज़ा दो गुनाहों की
हमने ये इल्तिज़ा की है ।
बिक गये चन्द सिक्कों में
बात शर्मो-हया की है ।
POST : 1650 कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।
वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।
हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।
POST : 1649 जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
जो भूला लोकतंत्र आचार
हुई सत्ता की जय जयकार ।
चुना था जिनको हमने , वही
बिके हैं आज सरे-बाज़ार ।
लुटा कर सब कुछ भी अपना
बचा ली है उसने सरकार ।
टांक तो रक्खे हैं लेबल
मूल्य सारे ही गए हैं हार ।
देखिए उनकी कटु-मुस्कान
नहीं लगते अच्छे आसार ।
अप्रैल 17, 2023
POST : 1648 कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे ( सूरते हाल ) डॉ लोक सेतिया
कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे ( सूरते हाल ) डॉ लोक सेतिया
यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे
कहीं खो गये हैं यहां के सवेरे ।
बचाता हमें कौन लूटा सभी ने
बने लोग सारे वहां खुद लुटेरे ।
कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।
वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।
हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।
अप्रैल 11, 2023
POST : 1647 वैधानिक चेतावनी ख़तरा है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
वैधानिक चेतावनी ख़तरा है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 07, 2023
POST : 1646 ग़ुलामी हमारी पसंद रही है ( इतिहास भूगोल से कथाओं तक ) डॉ लोक सेतिया
ग़ुलामी हमारी पसंद रही है ( इतिहास भूगोल से कथाओं तक )
डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 06, 2023
POST : 1645 असर देखिये क्या हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
असर देखिये क्या हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
बदली है ज़माने की नज़र देखिये क्या हो ,
होना तो है कुछ आज मगर देखिये क्या हो ।
ये रात तो दिलकश थी बड़े खुश थे सितारे ,
तुम पास हमारे थे तो हम पास तुम्हारे ,
अब आयी है नजदीक सहर देखिये क्या हो ।
ये कश्ती चली जाती थी मौजो के सहारे ,
सोचा था पहुच जायेंगे एक रोज़ किनारे ,
पर सामने आया है भंवर देखिये क्या हो ।
मुश्किल में सभी देते है उस दर पे सदाएं ,
सुनते है के सुनता है खुदा सबकी दुआएं ,
मगर अपनी दुआओं का असर देखिये क्या हो ।
अप्रैल 05, 2023
POST : 1644 चाह इक मिस कॉल की ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया
चाह इक मिस कॉल की ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 03, 2023
POST : 1643 समरथ को नहीं दोष गौसाईं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया
समरथ को नहीं दोष गौसाईं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 02, 2023
POST : 1642 पढ़ाई किसी काम न आई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
पढ़ाई किसी काम न आई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
कुनबा डूबा क्यों ( लोक कथा )
सबसे बड़ा झूठ ( लोक कथा )
अप्रैल 01, 2023
POST : 1641 चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया
चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया
POST : 1640 अपना यही विचार है ( पहली अप्रैल ) डॉ लोक सेतिया
अपना यही विचार है ( पहली अप्रैल ) डॉ लोक सेतिया
परिभाषा एक ( कविता )
है लेन देन ही सच्चा प्यार ।
वेतन है दुल्हन तो रिश्वत है दहेज
दाल रोटी संग जैसे अचार ।
मुश्किल है रखना परहेज़
रहता नहीं दिल पे इख्तियार ।
यही है राजनीति का कारोबार
जहां विकास वहीं भ्रष्टाचार ।
सुबह की तौबा शाम को पीना
हर कोई करता बार बार ।
याद नहीं रहती तब जनता
जब चढ़ता सत्ता का खुमार ।
हो जाता इमानदारी से तो
हर जगह सबका बंटाधार ।
बेईमानी के चप्पू से ही
आखिर होता बेड़ा पार ।
भ्रष्टाचार देव की उपासना
कर सकती सब का उध्धार ।
तुरन्त दान है महाकल्याण
नौ नकद न तेरह उधार ।
इस हाथ दे उस हाथ ले
इसी का नाम है एतबार ।
गठबंधन है सौदेबाज़ी
जिससे बनती हर सरकार ।
परिभाषा दो ( कविता )
आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो ।
जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो
कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो ।
क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो
निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो ।
सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो
मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो ।
बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो
पाक करेगा दुश्मनी , उसको भाई लिखो ।
देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो
नहीं लगी दहलीज पर , कोई काई लिखो ।
पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो
जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो ।





















