अप्रैल 29, 2023

ठन - ठन की बात ( सत्ता का कॉमेडी शो ) डॉ लोक सेतिया

    ठन - ठन की बात ( सत्ता का कॉमेडी शो ) डॉ लोक सेतिया 

       भूल जन की बात करते मन की बात  , सुन चुके सब आपकी ठन ठन की बात ।   

        ख़त्म आखिर एक दिन होगा सब खेल  , क्या मिटेगी भूख सुन राशन की बात ।    

  
कोई उनको दिलाए याद अहले वतन की बात , देश पर न्यौछावर करेंगे तन मन धन की बात । कब तलक कोई सुनेगा बिना बारिश बदल से घन घन की बात । बिजलियों से गुफ़्तगू करते जो लोग जानते कब भीगे किसी सावन की बात । अपने मन की बात जानते हैं सभी लोग , ज़माने को मन की बात सच सच कोई भी बताता नहीं है यही फ़ासला है जनता और सत्ता का झूठ मीठा लगता है सच भाता नहीं है । ईमानदार कभी नज़रें चुराता नहीं आईना झूठ को कभी भाता नहीं आपकी महफ़िल की कोई बात क्या करे घना अंधेरा है कोई दिया जलाता नहीं । सच कहने की यही उलझन है दिल में रहता लबों तक आता नहीं , हमसे नाम पता ठिकाना सब जान कर कौन है वो क्या है बतलाता नहीं । दर्द सहते रहो मुस्कुराते रहो , रोने वालों को कोई हंसाता नहीं । पत्थरों के शहर को जाने वाले , वहां से वापस लौट कर कोई आता नहीं । कल इक फूल ने किया अर्थी से अजब सवाल , दुल्हन को कोई इतना सजाता नहीं । दवा कह कर खिलाते हैं कुछ चारागर , ज़हर जान बूझ कर कोई खाता नहीं । ज़मीं है अपनी न कोई आसमान अपना है कहने को तो सब जहान अपना है । सोचने की बात है सब सोचना क्या यही हिंदुस्तान अपना है । अपना देश अपनी रिवायत अपनी सियासत कुछ और थी बचाना सब है ये इम्तिहान अपना है । बंद तालों को खोल कर देखो क्या लुट गया सारा सामान अपना है । 
 
   क़त्ल वो बार बार करता रहा , खुद ही मैं उस के हाथों मरता रहा । रह न जाएं कहीं निशां बाक़ी कत्ल के , सोच कर क़ातिल की ख़ातिर मैं डरता रहा । ख़ुदकुशी करने का ख़त था जेब में , याद मज़मून उस का करता रहा । प्यार मुझको बहुत आया क़ातिल पर , खुश रहना यही दुआ करता रहा । वक़्त-ए -रुख्सत पशेमान भी था वो , ज़िक्र मज़बूरियों का करता रहा । उसको सब हुनर जीतने के आते थे , हारना आता था मुझे हर कोई हरता रहा । मुझे भी प्यास थी बहुत लगी ज़हर के जाम , पीता गया वो भरता भरता गया । बात अपनी अपने मन में रही , उनकी खुशबू अहले चमन में रही । सबको मिली सज़ाएं सरकार तेरे दर पे  , हम बेगुनाह खड़े बन फिर गुनहगार तेरे दर पे । झूठी उम्मीदों पर ज़िंदा हैं पर कब तक , कहते फिरेंगे ठोकर खाने वाले , बार बार तेरे दर पे । ये क्या किया है तुम कहते थे हो मसीहा सताया कितना , कोई नहीं करेगा कभी देखना दोबारा ऐतबार तेरे दर पे । उनके मन की बात कुछ और है ये सियासत का नया तौर है नाचता उनका मनमोर है हर किसी का नहीं चलता ज़ोर है शोर थम गया है सन्नाटा हर ओर है कटी पतंग लूटने वालों के हाथ देश की बागडोर है । 
 
आपको बनाया रहनुमा जनता को मिला बनवास है , कहते हैं खुद को कौन हूं मैं बताओ सत्ता का कॉमेडी शो है गरीबों का पल पल उपहास है । सुहानी शाम राजनीति की जनता की सुबह उदास उदास है मौसम का बदला मिजाज़ है आंधी तूफ़ान कभी गर्म हवाएं आपके महलों की रौनक क्या कहे कोई ये भी कोई मधुमास है । खोटे सिक्कों से शराफ़त खरीदना दस्तूर उनको रास है । पल पल हार जीत की बाज़ी का खेल है , तय करने को होने लगा टॉस है । बदलती हैं तारीख़ें तकदीरें नहीं बदलती दिल्ली बहुत दूर है वाशिंगटन कितनी पास है । भीड़ बन कर खो बैठे हैं अपनी पहचान सभी लोग , और ऊंचे मंच पर खड़ा अजनबी चेहरा उनका बड़ा ही ख़ास है । खुले आम क़त्ल करने वाले कैद से रिहा हुए जब उनकी जय-जयकार होने लगी लिखना नया इतिहास है न्याय का पलड़ा बराबर होता ही नहीं इस तरफ सत्ता का बोझ उस तरफ इंसाफ़ है । मन की बात क्या बताएं मन बड़ा चंचल होता है आदमी करता इबादत मन किसी बाज़ार में भटकता होता है । उनके मन की बात कोई नहीं जानता न कभी कोई समझेगा शायद फिर भी मन को पा लिया तो ईश्वर को पा लिया इक फ़िल्मी भजन की शुरुआत है , प्राणी अपने प्रभु से पूछे किस बिधि पाऊं तोहे , प्रभु कहे तू मन को पा ले पा जाएगा मोहे । चलो पूरा भजन सुनते हैं मन क्या है समझते हैं । 

तोरा मन दर्पण कहलाये  तोरा मन दर्पण कहलाये भले बुरे सारे कर्मों को ,  देखे और दिखाये ।

मन ही देवता , मन ही ईश्वर , मन से बड़ा न कोयमन उजियारा जब जब फैले, जग उजियारा होय

इस उजले दर्पण पे प्राणी, धूल न जमने पाये । 

तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये 

सुख की कलियाँ , दुख के कांटे , मन सबका आधारमन से कोई बात छुपे ना , मन के नैन हज़ार 

जग से चाहे भाग लो कोई , मन से भाग न पाये ।

तोरा मन दर्पण कहलाये ,  तोरा मन दर्पण कहलाये ।

भले बुरे सारे कर्मों को , देखे और दिखाये

तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये ।

 

  

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