मेरे ब्लॉग पर मेरी ग़ज़ल कविताएं नज़्म पंजीकरण आधीन कॉपी राइट मेरे नाम सुरक्षित हैं बिना अनुमति उपयोग करना अनुचित व अपराध होगा । मैं डॉ लोक सेतिया लिखना मेरे लिए ईबादत की तरह है । ग़ज़ल मेरी चाहत है कविता नज़्म मेरे एहसास हैं। कहानियां ज़िंदगी का फ़लसफ़ा हैं । व्यंग्य रचनाएं सामाजिक सरोकार की ज़रूरत है । मेरे आलेख मेरे विचार मेरी पहचान हैं । साहित्य की सभी विधाएं मुझे पूर्ण करती हैं किसी भी एक विधा से मेरा परिचय पूरा नहीं हो सकता है । व्यंग्य और ग़ज़ल दोनों मेरा हिस्सा हैं ।
अप्रैल 29, 2023
POST : 1657 ठन - ठन की बात ( सत्ता का कॉमेडी शो ) डॉ लोक सेतिया
ख़त्म आखिर एक दिन होगा सब खेल , क्या मिटेगी भूख सुन राशन की बात ।
तोरा मन दर्पण कहलाये तोरा मन दर्पण कहलाये भले बुरे सारे कर्मों को , देखे और दिखाये ।
तोरा मन दर्पण कहलाये , तोरा मन दर्पण कहलाये ।
अप्रैल 21, 2023
POST : 1656 बोझ ढोते झूठी विरासत का ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया
बोझ ढोते झूठी विरासत का ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया
ग़ज़ल
POST : 1655 विरासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
विरासत बोझ बनती जा रही है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 20, 2023
POST : 1654 ज़मीं हो दर्द जैसे आस्मां खुशियां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ज़मीं हो दर्द जैसे आस्मां खुशियां ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 19, 2023
POST : 1653 यह नया दौर है हर तरफ शोर था ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
यह नया दौर है हर तरफ शोर था ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 18, 2023
POST : 1652 सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
सच बोलना तुम न किसी से कभी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
POST : 1651 बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बेदिली से दुआ की है ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
बेदिली से दुआ की है
तुमने भारी खता की है ।
मारकर यूं ज़मीर अपना
खुद से तुमने जफ़ा की है ।
बढ़ गया है मरज़ कुछ और
ये भी कैसी दवा की है ।
तुम सज़ा दो गुनाहों की
हमने ये इल्तिज़ा की है ।
बिक गये चन्द सिक्कों में
बात शर्मो-हया की है ।
POST : 1650 कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
कहने को तो बयान लगते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।
वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।
हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।
POST : 1649 जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
जो भूला लोकतंत्र आचार ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
जो भूला लोकतंत्र आचार
हुई सत्ता की जय जयकार ।
चुना था जिनको हमने , वही
बिके हैं आज सरे-बाज़ार ।
लुटा कर सब कुछ भी अपना
बचा ली है उसने सरकार ।
टांक तो रक्खे हैं लेबल
मूल्य सारे ही गए हैं हार ।
देखिए उनकी कटु-मुस्कान
नहीं लगते अच्छे आसार ।
अप्रैल 17, 2023
POST : 1648 कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे ( सूरते हाल ) डॉ लोक सेतिया
कहीं खो गए हैं यहां के सवेरे ( सूरते हाल ) डॉ लोक सेतिया
यहां रौशनी में छिपे हैं अंधेरे
कहीं खो गये हैं यहां के सवेरे ।
बचाता हमें कौन लूटा सभी ने
बने लोग सारे वहां खुद लुटेरे ।
कहने को तो बयान लगते हैं
खाली लेकिन म्यान लगते हैं ।
वोट जिनको समझ रहे हैं आप
आदमी बेजुबान लगते हैं ।
हैं वो लाशें निगाह बानों की
आपको पायदान लगते हैं ।
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए
देश के वो किसान लगते हैं ।
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन
बेखबर साहिबान लगते हैं ।
अप्रैल 11, 2023
POST : 1647 वैधानिक चेतावनी ख़तरा है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
वैधानिक चेतावनी ख़तरा है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 07, 2023
POST : 1646 ग़ुलामी हमारी पसंद रही है ( इतिहास भूगोल से कथाओं तक ) डॉ लोक सेतिया
ग़ुलामी हमारी पसंद रही है ( इतिहास भूगोल से कथाओं तक )
डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 06, 2023
POST : 1645 असर देखिये क्या हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
असर देखिये क्या हो ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
बदली है ज़माने की नज़र देखिये क्या हो ,
होना तो है कुछ आज मगर देखिये क्या हो ।
ये रात तो दिलकश थी बड़े खुश थे सितारे ,
तुम पास हमारे थे तो हम पास तुम्हारे ,
अब आयी है नजदीक सहर देखिये क्या हो ।
ये कश्ती चली जाती थी मौजो के सहारे ,
सोचा था पहुच जायेंगे एक रोज़ किनारे ,
पर सामने आया है भंवर देखिये क्या हो ।
मुश्किल में सभी देते है उस दर पे सदाएं ,
सुनते है के सुनता है खुदा सबकी दुआएं ,
मगर अपनी दुआओं का असर देखिये क्या हो ।
अप्रैल 05, 2023
POST : 1644 चाह इक मिस कॉल की ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया
चाह इक मिस कॉल की ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 03, 2023
POST : 1643 समरथ को नहीं दोष गौसाईं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया
समरथ को नहीं दोष गौसाईं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया
अप्रैल 02, 2023
POST : 1642 पढ़ाई किसी काम न आई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
पढ़ाई किसी काम न आई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया
कुनबा डूबा क्यों ( लोक कथा )
सबसे बड़ा झूठ ( लोक कथा )
अप्रैल 01, 2023
POST : 1641 चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया
चुप नहीं रहते तो यूं कहा करो ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया
POST : 1640 अपना यही विचार है ( पहली अप्रैल ) डॉ लोक सेतिया
अपना यही विचार है ( पहली अप्रैल ) डॉ लोक सेतिया
परिभाषा एक ( कविता )
है लेन देन ही सच्चा प्यार ।
वेतन है दुल्हन तो रिश्वत है दहेज
दाल रोटी संग जैसे अचार ।
मुश्किल है रखना परहेज़
रहता नहीं दिल पे इख्तियार ।
यही है राजनीति का कारोबार
जहां विकास वहीं भ्रष्टाचार ।
सुबह की तौबा शाम को पीना
हर कोई करता बार बार ।
याद नहीं रहती तब जनता
जब चढ़ता सत्ता का खुमार ।
हो जाता इमानदारी से तो
हर जगह सबका बंटाधार ।
बेईमानी के चप्पू से ही
आखिर होता बेड़ा पार ।
भ्रष्टाचार देव की उपासना
कर सकती सब का उध्धार ।
तुरन्त दान है महाकल्याण
नौ नकद न तेरह उधार ।
इस हाथ दे उस हाथ ले
इसी का नाम है एतबार ।
गठबंधन है सौदेबाज़ी
जिससे बनती हर सरकार ।
परिभाषा दो ( कविता )
आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो ।
जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो
कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो ।
क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो
निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो ।
सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो
मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो ।
बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो
पाक करेगा दुश्मनी , उसको भाई लिखो ।
देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो
नहीं लगी दहलीज पर , कोई काई लिखो ।
पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो
जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो ।
मार्च 31, 2023
POST : 1639 ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है , उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई ( तैं की दर्द न आया ) डॉ लोक सेतिया
ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है , उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई
( तैं की दर्द न आया ) डॉ लोक सेतिया
गोपालदास नीरज जी की ग़ज़ल :-
जला के अपना ही घर हमने रोशनी की है
सबूत है मेरे घर में धुएं के ये धब्बे
कभी यहाँ पे उजालों ने ख़ुदकुशी की है
ना लड़खडायाँ कभी और कभी ना बहका हूँ
मुझे पिलाने में फिर तुमने क्यूँ कमी की है
कभी भी वक़्त ने उनको नहीं मुआफ़ किया
जिन्होंने दुखियों के अश्कों से दिल्लगी की है
(अश्कों = आँसुओं)
किसी के ज़ख़्म को मरहम दिया है गर तूने
समझ ले तूने ख़ुदा की ही बंदगी की है
गोपालदास नीरज ।
ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
ख़ुदकुशी आज कर गया कोई ज़िंदगी तुझ से डर गया कोई।
तेज़ झोंकों में रेत के घर सा
ग़म का मारा बिखर गया कोई।
न मिला कोई दर तो मज़बूरन
मौत के द्वार पर गया कोई।
खूब उजाड़ा ज़माने भर ने मगर
फिर से खुद ही संवर गया कोई।
ये ज़माना बड़ा ही ज़ालिम है
उसपे इल्ज़ाम धर गया कोई।
और गहराई शाम ए तन्हाई
मुझको तनहा यूँ कर गया कोई।
है कोई अपनी कब्र खुद ही "लोक"
जीते जी कब से मर गया कोई।




















