सब पराए हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया
सब पराए हैं ज़िंदगी
देख आए हैं ज़िंदगी ।
बिन बुलाए चले गए
लौट आए हैं ज़िंदगी ।
हम खिज़ाओं के दौर में
फूल लाए हैं ज़िंदगी ।
दोस्ती की तलाश में
ज़ख़्म खाए हैं ज़िंदगी ।
छा रही हर तरफ ख़िज़ा
गुल खिलाए हैं ज़िंदगी ।
छोड़ कर कुल जहान को
दूर आए हैं ज़िंदगी ।
दर्द के गीत खूब सब
गुनगुनाए हैं ज़िंदगी ।
2 टिप्पणियां:
Kya kahne sir hum khizao ke daur me phool 👌👍
👌👍
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