फेसबुक से अलग दुनिया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
आप भी शायद ऐसा करते हों किसी को ढूंढने को फेसबुक पर तलाश करते हों अथवा किसी का नंबर व्हाट्सएप पर है कि नहीं इस चिंता में रहते हों । तमाम लोग अपनी पहचान के लोगों से इसी तरह से संपर्क में रहते हैं । सोशल मीडिया पर कौन कैसा मौजूद लगता है अंदाजा लगा लेते है मिलने की ज़रूरत नहीं हाल चाल बढ़िया है व्हाट्सएप्प पर संदेश से समझ लेते हैं । कुछ लोग दुनिया छोड़ चले गए लेकिन उनकी फेसबुक व्हाट्सएप्प कोई परिजन जीवित रखे है , अमर होने का कितना सरल उपाय है । हैरान मत होना कभी किसी दिन आपको खुद जिस नाम की फेसबुक है वही जानकारी दे कि आज पुण्यतिथि है । हमेशा दिवंगत आत्मा के परिजन ऐसी सूचना देते थे कि बाबूजी माताजी के निधन की दुःखद घड़ी में शोकसभा इत्यादि की बात । आजकल जिस किसी को देखते हैं फोन पर व्यस्त रहते हैं , कहते हैं दायरा बड़ा है दिन में सैंकड़ों से वार्तालाप करना पड़ता है । लेकिन अधिकांश लोग मिलते जुलते कुछ ख़ास लोगों से है वो भी मतलब या ज़रूरत की बात , अन्यथा कब किसी से मिलना जुलना क्या बात करना फ़ोन पर छूट गया याद ही नहीं । कुछ लोग मिलते ही हैं दो अवसर पर शादी समारोह या श्रद्धांजलि सभाओं में , जाने कितनी मधुरता बची है रिश्ते नातों में । किसी शायर ने कहा था आंखे खुली रही मरने के बाद किसी के इंतज़ार में , आज ये वास्तविकता बनता जा रहा है । आप जिनको चाहते हैं बुलाना मिलना अपने सुःख दुःख बांटना किसी कोशिश कर लें नहीं आने को सौ नहीं हज़ार बहाने हैं , क्या क्या गिनवाएं । लेकिन जिस दिन आपकी मौत की खबर मिलेगी ऐसे दौड़े चले आएंगे जैसे इसी का इंतज़ार था , नहीं कोई किसी की मौत नहीं मांगता लेकिन जिस की खोज खबर ज़िंदगी में नहीं ली मरने पर अधिक आंसू बहाने से क्या होगा ।
आपने खुद को कैद कर लिया है इक स्मार्ट फोन की बनावटी दुनिया में भूल गए हैं कि असली दुनिया कोई और है जो हुआ करती थी । हमने काल्पनिक संसार बना लिया है जिस में ख़ुशी से ग़म तक सभी दिखाई शानदार लगते हैं वास्तव में पर्दे के पीछे खोखलापन रहता है । आपको सोशल मीडिया पर नज़र आना है तो कैसे लगते हैं महत्वपूर्ण हैं कहां हैं क्यों हैं इसकी चिंता छोड़ देते हैं । लगता है अब कोई किसी से अपने मन की बात नहीं करता होगा , कोई बताता नहीं किसी को क्या क्या परेशानी है सभी कहते हैं अच्छे हैं । लेकिन मुझे दुनिया अपने आस पास की ऐसी सतरंगी दिखाई नहीं देती है , ऐसे हालात में कोई कितने झूठ बोल सकता है कि मैं अच्छा हूं और बाकी सब भी शानदार है । हर शख़्स बनने लगा सरकारी इश्तिहार है , सरकार बताती है जिसे पतझड़ समझ रहे हैं वही असली बहार है । फेसबुक व्हाट्सएप और स्मार्ट फोन ने हमको झूठ बोलने में माहिर बना दिया है , कहां है क्या वास्तव में व्यस्त हैं किसे खबर है । इस नकली दुनिया के रिश्ते नाते कितने सही कितने झूठे हैं ये राज़ कोई नहीं जानता है । आख़िर में इक कविता नाट्यशाला से अंत करते हैं ।
नाट्यशाला ( कविता ) डॉ लोक सेतिया
मैंने देखे हैंकितने ही
नाटक जीवन में
महान लेखकों की
कहानियों पर
महान कलाकारों के
अभिनय के ।
मगर नहीं देख पाऊंगा मैं
वो विचित्र नाटक
जो खेला जाएगा
मेरे मरने के बाद
मेरे अपने घर के आँगन में ।
देखना आप सब
उसे ध्यान से
मुझे जीने नहीं दिया जिन्होंने कभी
जो मारते रहे हैं बार बार मुझे
और मांगते रहे मेरे लिये
मौत की हैं दुआएं ।
कर रहे होंगे बहुत विलाप
नज़र आ रहे होंगे बेहद दुखी
वास्तव में मन ही मन
होंगे प्रसन्न ।
कमाल का अभिनय
आएगा तुम्हें नज़र
बन जाएगा मेरा घर
एक नाट्यशाला ।

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