सितंबर 12, 2022

एहसासों के फूल ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान

   एहसासों के फूल  ( पुस्तक समीक्षा ) समीक्षक : अमृत लाल मदान 

                           रचनाकार कवि : डॉ लोक सेतिया  

गत वर्ष मुझे डॉ सेतिया ने फ़लसफ़ा - ए - ज़िंदगी शीर्षक से अपनी पहली किताब भेजी थी , जिसकी भूमिका से मुझे एक पंक्ति अभी तक नहीं भूली है । वह कहते हैं :- लिखना मेरा जूनून है , मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको इबादत की तरह समझा है । इसी वर्ष उनकी तीन किताबों का सुंदर ढंग से छपकर आना वाकई उनके जूनून को दर्शाता है , उन्हें बधाई । और उनकी जुनूनी इबादत को सलाम । 
 
उनके ताज़ा कविता संग्रह ' एहसासों के फूल ' में लगभग 75 छंदबद्ध कविताएं एवं मुक्तछंद रचनाएं संग्रहीत  हैं जो सहज सीधी ज़बान में बदलती अनुभूतियों और एहसासों को ईमानदारी से अभिव्यक्त करने में सक्षम हैं । उनमें कोई शब्दाडंबर नहीं , कोई गूढ़ दर्शन की बोझिल बातें नहीं लेकिन सब में ठोस ज़िंदगी की तरल बातें हैं , जो उनके 71 वर्ष के जीवन अनुभव से निचुड़ी हुई आई हैं । 
 
 
प्रेम अनुभूतियाँ ज़िंदगी की सबसे तरलतम और सघनतम , उदास किंतु सुखद , और सृजन की अपार संभावनाओं से परिपूर्ण अनमोल अनुभूतियाँ होती हैं । ऐसी कविताएं सिरहाने के नीचे रखी जाती हैं , युवावस्था में  , और प्रौढ़ावस्था में हृदय की तहों के नीचे या स्मृतियों में । ऐसी कुछ कविताएं और ग़ज़लें हैं : वो दर्द कहानी बन गया , जाने कब मिलोगी तुम , मन की बात , उमंग यौवन की , मेरे ख़त , मेरी खबर आदि ।    
 
 
कवि केवल प्रेमिका की याद से उपजी उदासी को ही नहीं उकेरता बल्कि वृद्धावस्था में हर उस मां की उदासी को भी शिद्दत से महसूस करता है जो युवा संतान की उपेक्षा सहती है । यह ऐसा है जैसे कोई किसान युवा हुई फसलें काट लेता है और पीछे कटी हुई जड़ों का दर्द ही टीसता रह जाता है  , माँ के आंसू ऐसी ही कविता है । 
 
 
कवि का जीवन संघर्षों में और संघर्षशील मनुष्य के जीवट और आत्मविश्वास में पूरा विश्वास है । वह एक कविता में लिखता है : जीवन इक संग्राम तो क्या \ नहीं पल भर आराम तो क्या । ' थकान ' में कहता है : जीवन भर चलता रहा \ कठिन पत्थरीली राहों पर \ पर मुझे रोक नहीं सके \ बदलते मौसम भी । 
 
 
कवि नये ज़माने की नयी नारी का उद्यघोष सीता के पश्चाताप की आवाज़ में करता है , मुझे नहीं करनी थी चाहत \ सोने का हिरण पाने की ,  और एक अन्य कविता 'औरत ' में जो संग्रह की पहली कविता है वह उसकी आवाज़ यूं बनता है : " तुमने देखा है \ केवल बदन मेरा \ प्यास बुझाने को अपनी हवस की \ बांट दिया है तुमने टुकड़ों में मुझे \ और उसे दे रहे हो चाहत का नाम । एक और खूबसूरत कविता है ' हमारा अपना ताज ' पति-पत्नी का अपना प्यार का छोटा सा बसेरा । 
 
 
सामाजिक सरोकारों की कविताओं में ' काश ' शीर्षक से कविता मुझे बहुत अच्छी लगी जिसमें कवि सच्ची धर्मनिरपेक्षता सर्व धर्म समभाव का पक्षधर तो बनता है लेकिन उससे बढ़कर वह समूची मानवता के दर्द के एहसास को प्रमुखता देता है न कि मंदिर मस्जिद जाने को । कवि प्राकृतिक परिवेश का प्रेमी है और पर्यावरण संरक्षण में विश्वास रखता है । ' ठंडी ठंडी छाँव ' वृक्ष कहता है : काटना मत मुझे कभी भी \ जड़ों से मेरी \ जी नहीं सकूंगा \ अपनी ज़मीन को छोड़कर  , मैं कोई मनी प्लांट नहीं हूं । मानि वह प्राकृतिक उत्पाद के बाज़ारवाद का भी आलोचक है । 
 
 
साहित्य में कागज़ के फूल सजाने वाले कई लोग पत्थर के फूल भी बन कर नफरती बोल बोलकर बाल श्रमिकों का कैसे दिल दुखाते हैं , ये पीड़ा एहसासों के फूल खिलाने वाले डॉ सेतिया जी बखूबी समझते हैं । उनकी दृष्टि में वो साहित्य कहीं गुम हो गया है जो सद्भावना और संवेदना से खुशियों की महफ़िलें सजाता था ।  अब तो घुटन में उन्हें इस तालाब का जल प्रदूषित लगता है और सब फूल कुम्हलाए हुए । 
 
 
समाज में फैली इन दुष्प्रवृतियों से दुःखी हो कर वह कृष्ण को उनका वायदा याद दिलाते हैं जो उन्होंने अधर्म  जाने पर नया अवतार ले कर आने को कहा था । यहां उनका संस्कृति प्रेम झलकता है ।  इस प्रकार कविता दर कविता सेतिया जी जीवन यात्रा की अच्छी बुरी अनुभूतियों की सशक्त अभिव्यक्ति करते चलते हैं । हां कहीं कहीं उनकी घिसी-पिटी उपमाएं अखरती भी हैं , यथा , फूल ही फूल खिले हों \ हों हर तरफ बहारें ही बहारें ।  फिर भी बहुत ताज़गी है उनकी कविताओं में शिल्प तथा सादी ज़बान में।  उनके लिए साधुवाद की कामना करता हूं ।  
 
  अमृत लाल मदान 
अध्यक्ष , साहित्य सभा 
कैथल ( हरियाणा ) 136027 
मोबाइल नंबर - 94662-39164 

उपरोक्त पुस्तक समीक्षा आदरणीय मदान जी ने 11सितंबर 2022 आर के एस डी ( पी जी ) कॉलेज में विमोचन करते समय पढ़ कर सुनाई । मुझे याद नहीं उनसे कभी पहले आमने सामने मुलाक़ात हुई या कोई वार्तालाप हुई हो । शायद कोई बेहद संवेदशील साहित्य सृजक ही ऐसा कर सकता है केवल पुस्तक को पढ़ कर रचनाकार की मन की भावनाओं को समझ कर इतनी सही सार्थक समीक्षा करना । मुझे अपनी रचनाओं की इस से बढ़कर कोई कीमत नहीं मिल सकती है । अमृत लाल मदान जी का धन्यवाद शब्दों में नहीं किया जा सकता है । 

(   पाठक वर्ग की सुविधा के लिए ' एहसासों के फूल ' कविता संग्रह की पुस्तक व्हाट्सएप्प नंबर 
8447540078 पर संदेश भेज मंगवा सकते हैं । जल्दी ही अमेज़न पर भी उपलब्ध करवा दी जाएगी। )
 

 

2 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (14-09-2022) को   "आओ हिन्दी-दिवस मनायें"   (चर्चा अंक 4551)  पर भी होगी।
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कृपया कुछ लिंकों का अवलोकन करें और सकारात्मक टिप्पणी भी दें।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  

Dr. Lok Setia ने कहा…

डॉ रुपचंद्र शास्त्री ' मयंक ' जी आपका आभार व्यक्त करता हूं ।
पोस्ट को चर्चा में शामिल करने पर धन्यवाद।