मार्च 17, 2026

POST : 2071 फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

   फिर वही सिलसिला हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 
 
फिर वही सिलसिला हो गया 
बोला सच , वो खफ़ा हो गया । 
 
ज़िंदगी का मैं बोझा लिए 
आदमी से गधा हो गया । 
 
आई कश्ती जो मझधार में 
नाख़ुदा ही ख़ुदा हो गया । 
 
हाल दिल का न पूछे कोई 
जो हुआ , बस हुआ , हो गया ।  
 
हमने इल्ज़ाम सर पर लिया 
क़र्ज़ जितना , अदा हो गया । 
 
हम खड़े थे , खड़े रह गए 
इस तरह वो जुदा हो गया । 
 
ख़ुश है ' तनहा ' उसे देख कर 
दोस्त कितना बड़ा हो गया ।  
 
 

 
 

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