ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे
जब किनारे पास आते रहे ।
अजनबी सब लोग भाये हमें
जो थे अपने वो सताते रहे ।
पास , चाहे दूर सबसे रहे
प्यार की रस्में निभाते रहे ।
आप पंछी की तरह उड़ गए
मौसमों से आते - जाते रहे ।
उनको आना था न आये कभी
ख़्वाब में आ कर सताते रहे ।
कल कहां था दिल कहां आज है
ख़ुद ही खोकर दिल को पाते रहे ।
बेख़बर लहरों से ' तनहा ' रहे
रेत के घर , फिर बनाते रहे ।

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