जुलाई 16, 2026

POST : 2085 ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

     ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया  

ख़ुद हमीं मझधार जाते रहे 
जब किनारे पास आते रहे । 
 
अजनबी सब लोग भाये हमें
जो थे अपने वो सताते रहे । 
 
पास , चाहे दूर सबसे रहे 
प्यार की रस्में निभाते रहे ।  
 
आप पंछी की तरह उड़ गए 
मौसमों से आते - जाते रहे । 
 
उनको आना था न आये कभी 
ख़्वाब में आ कर सताते रहे ।  
 
कल कहां था दिल कहां आज है 
ख़ुद ही खोकर दिल को पाते रहे । 
 
बेख़बर लहरों से ' तनहा ' रहे 
रेत के घर  , फिर बनाते रहे । 
 

 
  
 

कोई टिप्पणी नहीं: