दिन साल महीने गिनते ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया
मुसाफ़िर हैं चलना है चलते रहना है निर्धारित लक्ष्य अथवा मंज़िल तक पहुंचना नहीं मंज़िल को पाना भी है । लेकिन होता कुछ ऐसा है कि अधिकांश लोग अक़्सर एक सिमित दायरे में या परिधि में ही चक्र लगाते रहते हैं जीवन भर । कुछ सालों से इक व्यर्थ का चलन राजनीति में चल पड़ा है किसी सरकार का एक दो तीन चार वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने का जश्न मनाना । सत्ता या कुर्सी का ऐसा मोह वास्तव में शासकों को सही मार्ग से भटकाने का काम करता है । शासन में बने रहना किस काम का अगर आपने देश समाज को कुछ भी बेहतर ही नहीं बनाया है तब । अभी किसी ने कहा कि किसी राजनेता का इतने साल निरंतर शासन में रहने का रिकॉर्ड बनाना महान बात है । ये कुछ वैसे ही है जैसे इधर कुछ लिखने वाले हर कुछ समय के बाद प्रकाशित किताबों की गिनती को बताते गर्व का प्रदर्शन करते हैं मगर कभी नहीं सोचते कि उनके लेखन में कितनी गहराई पहले से अधिक हुई है कुछ समाज को हासिल हुआ है या सिर्फ कुछ नाम शोहरत ईनामात पुरूस्कार का संचय करना ही लक्ष्य रहता है । हमने ऐसे महान राजनेता देखे हैं जो बहुत थोड़े समय तक पद पर रहे लेकिन उन्होंने उस समय में ऐसे कीर्तिमान बनाये जो कोई पचास वर्ष शासन कर भी नहीं कर सकते हैं । नाम बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती सभी को लाल बहादुर शास्त्री जी ऐसे में ऊंचे शिखर पर खड़े दिखाई देते हैं कभी कोई प्रयास नहीं किया बड़ा कहलाने का छोटे कद का आदमी कितना बड़ा किरदार हर तरह से निभाया था । कोई हुआ जिस ने उनकी तरह रेल दुर्घटना होने पर त्यागपत्र खुद दे दिया हो । आज लोकतंत्र का विध्वंस करने वाले भी कितना विरोध होता रहे पद नहीं छोड़ना चाहते बल्कि इक मिसाल कायम कर रहे हैं लोकलाज को ताक पर रखने की ।
चलिए आपको कुछ और नाम याद दिलाते हैं बाबू जगजीवन राम जी को लेकर कभी सोचा है जिस जिस विभाग में मंत्री रहे तभी कितना बेमिसाल लाजवाब कार्य देश की सरकार ने किया । हरित क्रांति से बंगलादेश बनाने में बागडोर किस ने संभाली थी तब भी श्रेय किसे मिला कोई अंतर नहीं पड़ता है लोकतंत्र में सरकार जब केवल किसी एक व्यक्ति को ही सबसे महत्वपूर्ण समझने लगती है तब समाज सही दिशा में प्रगति कभी नहीं कर सकता है । आज़ादी के 79 साल बाद भी अगर देश में आधी आबादी गरीबी और बदहाली में रहती है तब समझ लेना चाहिए शासन जिस किसी भी राजनेता के हाथ में रहा है वास्तविक समाज कल्याण किसी ने नहीं किया है । खेद है कि पिछले पचास सालों से देश की राजनीति इतनी ख़राब हो चुकी है कि सभी राजनेताओं को सिर्फ़ सत्ता की चाहत है देश सेवा और समाज कल्याण को मात्र मुखौटा बनाया जाता रहा है । शर्म की बात है कि आज फिर से 21 साल इंतज़ार करने की बात कहने लगे हैं कि 2047 तक देश शानदार बना देंगे जबकि अभी तक उस दिशा में इक कदम भी उठाया दिखाई देता नहीं है । अब कौन जीता है कौन देखेगा कुछ भी कर दिखाना नहीं बस झूठे दिलासों से जनता को बहलाना चाहते हैं जबकि लोग अब इतने भी नासमझ नहीं उनको ये खोखली बातें प्रभावित ही नहीं करती हैं ।
कोई भी शासक नहीं जानता भविष्य में इतिहास उसको कैसे देखेगा , दुनिया में सैंकड़ों साल शासन करने वाले भी लोग हुए हैं जिनको लेकर कहते थे उनके साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं है लेकिन उनका आंकलन किया गया ये समझ कर कि उनके साम्राज्य में लोग खुश थे आज़ाद थे या बेबस और ग़ुलाम थे । जिनको लगता है उनके चाटुकार लोग या खरीदे गए लेखक पत्रकार मीडिया वाले उनकी छवि को शानदार दर्शाने को सोने की क़लम से सुनहरी रंग की सियाही से उनका कालखंड स्वर्णिम लिखेंगे उनको वास्तविकता मालूम नहीं है । शासकों के गुणगान करने वालों की झूठी बातें मनघड़ंत कहानियां कभी किसी को प्रभावित नहीं करती हैं , राजाओं की झूठी कथाएं विश्वसनीय नहीं लगती बल्कि कितनी घटनाएं तब की साबित करती हैं कि उनके शासन में झूठ का परचम फहराता रहा था ।
सच सौ पर्दों में भी छुपाने से छुपता नहीं है और झूठ का कितना भी डंका पीटते रहो आखिर ढोल की पोल खुलती है और दिखाई देता है ढोल का शोर उसके भीतर के खोखलेपन का प्रतीक था । कोल्हू का बैल समझता है कितना लंबा रास्ता तय कर लिया जबकि घूमता उसी दायरे में रहता है । हाऊ मच लैंड ए मैन नीड कहानी आधुनिक युग का सच लगती है कितना दायरा दुनिया भर को नापने के प्रयास में आख़िर हाथ मलते हैं , सब कुछ गंवा के भी होश नहीं आता तभी कुछ भी नहीं कर दिखाने वाले अपनी ख़्वाबों ख़यालों की दुनिया में खोये सच्चाई से बेखबर रहते खुद ही अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं । इक गीत है निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल का निशां मालूम नहीं । धर्म की बात कहते हैं तो ऐसे कहना होगा , आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास । इतिहास का काला अध्याय सुनहरी रंग में सोने की क़लम से लिखने से क्या मिलेगा ।

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