नाम बड़े और दर्शन छोटे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया
कहावत बचपन से सुनते आये हैं आज ऐसे ही लोग तमाम जगह दिखाई देते हैं । दुनिया ने अमेरिका के राष्ट्रपति को ऐसा करते हुए देखा शांति का नोबेल पुरुस्कार पाने की हसरत की खातिर लाज शर्म छोड़ कोशिशें करते रहे । मैंने जॉर्ज सविले की इक बात को बार बार दोहराया है जो उद्धरण नीचे दिया गया है । लेकिन आजकल शोहरत पाने का पागलपन छाया हुआ है और जिसे देखो खुद ही अपनी बढ़ाई करना करवाना चाहता है । देश का ख़ज़ाना लुटवाया जाता रहा है किसी को देश ही नहीं दुनिया में सबसे बड़े शिखर पर दिखलाने को यशस्वी उपाधि जोड़ने से यशोगान करने से ख्याति नहीं मिलती है उल्टा इक कसौटी सामने खड़ी हो जाती है । इतिहास में जितने भी महान लोग हुए हैं उन्होंने महान कहलाने की ख़ातिर कभी कुछ नहीं किया उनके कार्यों ने उनको महानता के शिखर पर बिठा दिया । अब लोग प्रयास करते हैं उस शोहरत को पाने की ही नहीं उनको छोटा साबित कर खुद को बड़ा साबित करने की भी कोशिश करने से खुद और भी छोटे दिखाई देते हैं । जिस शोहरत को पाने को पैसा खर्च कर विज्ञापन देने से लेकर प्रतिदिन आडंबर करने को तमाशे दिखाने पड़ते हों ऐसी खोखली शोहरत को कहते हैं शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है , शायर डॉ बशीर बद्र जी का शेर है । इधर जब किसी की ऐसी ही हालत हुई है तब लोग उसको भारत रत्न देने की बात उठाकर क्या जले पर नमक छिड़कने की बात करना चाहते हैं । ऐसे दोस्त दुश्मन से बढ़कर ख़तरनाक होते हैं मगर यही होता है जब किसी को चाटुकारिता भाने लगती है तब कुछ स्वार्थी उसकी जय-जयकार गुणगान कर बदले में कुछ न कुछ हासिल करते रहते हैं । सुनते थे बादशाह अपने दरबार में कुछ ऐसे भांड रखा करते थे लेकिन जानते थे भांड ऐसा अपने बादशाह को झूठी ख़ुशी देने को करते हैं यही उनका धंधा हुआ करता था हुनर आता था सरकार की ख़ामियों को भी ख़ासियत बताना । बादशाहों को दिल बहलाने को ये सब कुछ करना पसंद हुआ करता था बदले में इनामात दिया करते थे और सभी दरबारी बादशाह की वाहवाही पर तालियां बजाते थे । लेकिन लोकतंत्र में यही सब से बड़ा रोग क्या अपराध कहलाता है तब भी हर खोटा सिक्का खुद को बेशक़ीमती समझने की भूल दोहराता है पैसे खर्च कर अपने नाम तस्वीर के बैनर लगवाना वैसा ही है जैसे कोई किराए पर हंसने रोने वाले बुलाकर ख़ुशी अथवा दुःख का तमाशा करता है , रुदाली फ़िल्म का यही विषय था । आज यही चलन बन गया है राजनीति नहीं प्रशासन के अधिकारी भी अपने वास्तविक कर्तव्य को निभाना छोड़ इसी को लेकर प्रयासरत रहते हैं स्थानीय अख़बारों से सोशल मीडिया तक पर खुद मिंयां मिट्ठू बनना आदत बन जाती है । काश बड़े अधिकारी बड़े पद पर बैठ अपना फ़र्ज़ ईमानदारी से निभाने पर ध्यान केंद्रित करते तो उनको जो मिलता वो सही और सार्थक होता भले उस से अपने निजी स्वार्थ अधूरे रहते धन दौलत और पदोन्नति के लेकिन भीतर कोई आत्मग्लानि नहीं रहती कुछ अनुचित करने की ।
आज किसी को मुंह छुपाए रहना पड़ रहा है , देश के साथ धोखा छल कपट कर इतने बड़े पद पर रहकर भी आपने आपराधिक आचरण अनुचित हथकंडे अपना कर खुद अपने साथ इक महान संस्था की गरिमा को छलनी छलनी कर दिया है । विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र क्या इतना नीचे गिर सकता है , इतिहास में आपके समय को कितना कालिख़ भरा और अंधकारमय लिखा जाएगा जिस से देश समाज की प्रतिष्ठा धूल में मिल जाएगी । ' ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने , लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ' मुज़फ़्फ़र रज़्मी जी का शेर आधुनिक युग की कड़वी हक़ीक़त बन गया है ।

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