मार्च 31, 2014

POST : 428 अनुमति लेना ज़रूरी है ( ब्लॉग की पोस्ट शेयर करने को )

    अनुमति लेना ज़रूरी है ( ब्लॉग की पोस्ट शेयर करने को )

अब किसी का नाम लेना सही नहीं है। और ऐसे लोग हैं भी बहुत कम , अधिकतर लोग जो साहित्य सेवा से जुड़े हैं वे ऐसा नहीं करते। मगर अभी इन दिनों किसी ने मुझे कमेंटस के स्थान पर ये सूचित किया कि हमने आपकी इस रचना को अपनी जगह पर लिख दिया है। वे ये भी लिखते हैं कि मुझे सूचित करना ज़रूरी समझते हैं। मगर उनको मालूम होना चाहिये कि मैंने अपने ब्लॉग पर सपष्ट निर्देश दे रखा है कि मेरी बिना अनुमति किसी रचना या पोस्ट को उपयोग नहीं कर सकते। क्या आप किसी की कोई चीज़ बिना उसकी अनुमति उपयोग कर सकते हैं और करने के बाद सूचित करते हैं कि मुझे पसंद आई थी उठा ली थी। बुरा नहीं माने मैं इसको बेहद आपतिजनक कार्य मानता हूं। आप साहित्य का साथ अनाचार को साहित्य कर्म या साहित्य सेवा कदापि न कहें। बहुत बार फेसबुक पर भी मेरी रचना किसी ने अपनी पोस्ट पर लिखी , मना करने पर कहते हैं कि लिंक से लोग नहीं पढ़ते इसलिये उन्होंने ये किया मेरे लिये कि और लोग पढ़ सकें। भाई आपको मेरी चिंता नहीं करनी है , न ही इस बात की कि लोग पढ़ते हैं या नहीं। मुझे किसी को विवश नहीं करना पढ़ने को। जो चाहे पढ़ सकता है और नहीं पढ़ना चाहता तो वो भी हर किसी का अधिकार है। आप किसी के अधिकार में हस्ताक्षेप क्यों करना चाहते हैं। जो भी ये सब किया करते हैं , जो कर चुके उसको अपनी जगह से मिटा दें और दोबारा ऐसा नहीं किया करें। मुझे इतनी ईमानदारी और नैतिकता की आपेक्षा हर उस व्यक्ति से है जिसको साहित्य से कोई सरोकार है।

मार्च 30, 2014

POST : 427 इक पतित नारी की जीवन गाथा ( सत्य कहानी ) डा लोक सेतिया

 इक पतित नारी की जीवन गाथा ( सत्य कहानी ) डा लोक सेतिया

        बहुत साल पहले की घटना है , इक पत्रिका में किसी महिला की आपबीती प्रकाशित हुई थी। तब उम्र नहीं थी गहराई से उसको लेकर सोचने की , मगर मैं उस नारी की व्यथा को कभी भुला नहीं सका। जब फेसबुक पर मित्रता के नाम पर अशलीलता का फैला हुआ जाल देखा तब उसको अपनी कल्पना के माध्यम से इक लघुकथा का रूप दिया। आज कुछ कुछ उसी तरह की कहानी लिखने जा रहा हूं जो मुझे लगता है कि बहुत लोग जो फेसबुक पर हैं उनको खुद से जुड़ी लग सकती है। शायद जितना मैं लिख सकता उससे कहीं बढ़कर। चलो भूमिका को छोड़ आपको इक नारी की पीड़ा की उसकी बेबसी की उसके गंदगी में कीचड़ में फसने से रसातल में गिरने की कहानी सुनाता हूं। और उसका अंत जो हुआ वो भी , जो शायद होना ही था , होता ही है , लेकिन जो ऐसा करते हैं वो ये शायद ही सोचते हैं कि किसी दिन उनका बनाया जाल ही खुद उनको फंसा सकता है।

             नीता इक अध्यापिका थी , रौशन शर्मा की बेटी को टयूशन पढ़ाने उसके घर जाया करती थी। उसके घर की आर्थिक दशा उसको ऐसा करने को विवश करती थी। एक दिन जब नीता गई टयूशन पढ़ाने तब घर पर उनकी बेटी और पत्नी नहीं थी और रौशन अकेला था। नीता को रोक लिया था उसने ये बता कर कि बेटी अभी आने वाली है मां के साथ बाज़ार तक गई है। और उस दिन रौशन ने ज़ोर ज़बरदस्ती करके नीता की अस्मत लूट ली थी। अपना सर्वस्व लुटा कर जब नीता बिलख रही थी तब रौशन ने उसको बहुत सारे पैसे जितने शायद वो टयूशन से वर्ष भर में लेती थी देकर कहा था लो मेरी तरफ से कोई उपहार ले लेना। और ये बात किसी से मत कहना वरना तुम्हारी ही बदनामी होगी। नीता ने लिखा था तब अपना नाम बदल कर पत्रिका को कि तब उसको समझ नहीं आ रहा था कि अपनी अस्मत लुटने पर रोये या पहली बार इतने पैसे पाकर खुश हो। रौशन को आता था महिलाओं को चिकनी चुपड़ी बातों से बहलाना। उसने जब अपनी बात का असर होता देखा नीता पर तो कहने लगा मुझसे भूल हो गई है तुम्हारे हुस्न का जादू चल गया था मुझ पर और मैं तुमसे सच में प्यार करता हूं। लेकिन मुझे तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती नहीं करनी चाहिये थी , कसम खाता हूं अब कभी नहीं करूंगा ऐसा दोबारा। लेकिन अगर तुम चाहोगी तो मैं तुमको जो भी चाहिये देता रहूंगा। तुम ये बात मन से निकल दो कि हमने कुछ गलत किया है , जिस बात से हमको ख़ुशी मिलती हो और किसी का कोई बुरा नहीं उसमें बुराई नहीं है। आखिर अपना तन मन हमारा है , हम जो पसंद हो करें , किसी को बताने की कोई ज़रूरत नहीं , इस तरह रौशन ने नीता को मना लिया था कि इस घटना का ज़िक्र किसी से नहीं करेगी। मगर अभी तक वो कश-म-कश में उलझी थी कि क्या करे क्या नहीं , इसलिये उसने अब किसी के घर जाकर टयूशन पढ़ाना ही बंद कर दिया था। जिनको पढ़ना हो वो उसके घर आ सकते हैं , रौशन चाहता था नीता को अपने जाल में फंसाये रखना इसलिये उसने भी बेटी को नीता के घर टयूशन पर भेजना शुरू कर दिया। नीता चाह कर भी उस घटना को भुला नहीं पा रही थी। मगर फिर उसने अपनी आर्थिक मज़बूरी से विवश हो कर एक दिन रौशन का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया था। रौशन उसके घर आता अपनी वासना पूरी करता और नीता को बहुत से पैसे देता। मगर क्योंकि नीता अपने घर पर हमेशा अकेली नहीं मिलती थी इसलिये उसने नीता को अपनी ही एक जगह उपलब्ध करवा दी थी टयूशन का काम करने को। यूं सब को यही मालूम था कि किराये पर ली है जबकि किराया उसको अपना बदन सौंप कर ही चुकाना होता था।

                  वक़्त बीतता गया और नीता ने खुद को बदल लिया था समय के साथ। अब वो दिखाने को टयूशन का काम करती थी मगर वास्तव में उसी को अपना कारोबार बना लिया था , हर किसी से शारीरिक संबंध बनाना और पैसे लेना। रौशन की बेटी जवानी की दहलीज पर थी और नीता के घर अभी भी नियमित आती जाती थी। नीता उसको कई प्रकार से सहयोग किया करती , उसको परीक्षा में नकल करवाना , उसकी बुरी आदतों को पूरा करने को जब तब पैसे देना। रौशन की बेटी को नीता बहुत प्यारी लगती थी , क्योंकि वो उसको जो चाहती वो करने में सहायता देती रहती थी। शायद कहीं अनजाने में वो अपने साथ उसके पिता द्वारा किये अपकर्म का बदला ले रही थी उसकी बेटी को उसी राह जाते देख कर। अक्सर जब कोई नीता के पास आता तब वो रौशन की बेटी को कुछ अशलील तस्वीरें देखने को , कुछ ऐसे पत्रिकाएं पढ़ने को देकर साथ के कमरे में चली जाती अपना कारोबार करने। तब वो छुप कर दरवाज़े की दरार से नीता को सब करते देखती कितनी बार। और ऐसे में उसने एक दिन नीता को ये बता दिया था कि क्या मुझे ये सब सिखा सकती हैं। और इस तरह रौशन की बेटी ही नहीं और लड़कियों को भी नीता ने उसी जाल में फंसा लिया जिसमें खुद मज़बूरी में फंस गई थी।

                रौशन नहीं जनता था कि जिस रास्ते पर उसने नीता को डाला था आज उसकी जवान बेटी उसी राह पर भटक रही है। ऐसे में इक दिन रौशन ने नीता को होटल में आने को कहा तो उसने पूछा क्या मेरी बजाय कोई नई जवान लड़की अगर हो तो आपको क्या चाहिये मैं या वो। और रौशन ने कहा था कि अगर कोई नई और जवान मिल जाये तो अधिक पसंद है। जब होटल के कमरे में नीता अपने साथ उसी की बेटी को लेकर पहुंची तब उसको होश ही उड़ गये। बहुत नाराज़ हुआ वो नीता को बदचलन बताया , नीता ने वही बात दोहराई जो कभी रौशन से उसको कही थी। किसी को भी अपना बदन अपनी मर्ज़ी से किसी को भी ख़ुशी से सौंपने में बुराई नहीं है। जो तुमने किया और मुझे सिखाया वही तुम्हारी बेटी ने भी सीख लिया है , अब तुम लाख चाहो जो हो चुका उसको बदल नहीं सकते। रौशन ने नीता को और अपनी बेटी को वहां से जाने को कह दिया था और ये विनती की थी कि ये सब किसी को नहीं बताना , मैं समझ गया मुझे अपने कर्मों का फल ही मिला है। वो चली आई थी , अगली सुबह होटल के कमरे से रौशन की लाश मिली थी।  उसने ख़ुदकुशी कर ली थी। सुसाईड नोट छोड़ गया था कि अपनी मौत का वो खुद जिम्मेदार है।

मार्च 27, 2014

POST : 426 भगवान का पेटेंट ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

      भगवान का पेटेंट ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

      अभी पिछली पोस्ट पर मैंने भगवान नहीं आदमी को इंसान बनाने की बात कही थी । इक महिला मित्र ने उसको तुरंत हटा दिया अपनी टाइम लाईन से । ऐसा नहीं कि उनको मेरी बात अनुचित लगी , उनका कहना था कि कोई भगवान नाराज़ हो जाएगा । ये कितनी हैरानी की बात है कि हम ये सोच रहे कि सच बोलने से भगवान नाराज़ हो सकता है । आपको बता दूं मैं जिस धर्म को जानता हूं उसका आदर्श वाक्य ही यही है सत्य ही ईश्वर है । बहुत सारे सिख भाई नहीं जानते कि जब वो सात सिरी अकाल बोलते हैं तो उसका अर्थ क्या है । सत्य ही ईश्वर है , यही उसका अर्थ है । जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल का अर्थ है कि जो कोई भी ऐसा बोलता है कि सत्य ही ईश्वर है भगवान उस पर कृपा करते हैं । मैंने ये पहले भी ज़िक्र किया है बार बार कि मेरी माँ इक भजन गाती रहती थी । भगवन बन कर तूं मान न कर तेरा मान बढ़ाया भक्तों ने , तुझे भगवान बनाया भक्तों ने । मेरा विचार है ये वही कह सकता है जो ईश्वर को अपना और खुद को उसका मानता हो । मुझे माँ जैसा निश्छल सवभाव , किसी के प्रति कोई दुर्भावना न रखना , किसी से कभी कटु वचन नहीं कहना और हमेशा मुस्कुराते रहना विरला ही कभी दिखाई देता है । मेरी धर्म पत्नी अक्सर जब भी सास बहू की बात आती है किसी से चर्चा में तब यही बोलती है कि उनको तो सासू माँ ने कभी एक बार भी कोई बात गुस्से या नाराज़गी से नहीं की थी । ये तो केवल परिभाषा थी , अब विषय की बात । व्यंग्य है भगवान का पेटेंट ।

         खबर छपी थी कि पेटेंट कानून पास हो गया । अमेरिका वाले नीम का हल्दी का तुलसी का और जाने किस किस की खोज का पेटेंट पहले ही करवाये बैठे हैं । खेती के बीज तक उनके नाम पर पेटेंट हैं और दवायें भी । अब इनका उपयोग उनको रायल्टी चुका कर ही कर सकते हैं । कल ऐसा भी मुमकिन है कि कोई खुद को भगवान घोषित कर दे ये पेटेंट करवा कि ये दुनिया उसी की बनाई हुई है । दूर की कौड़ी लगती है आपको , पर सब कुछ मुमकिन है । देखा नहीं टीवी पर कोई करोड़ों कमा रहा है अपने तथाकथित भक्तों को यही बतला कर कि आप पर अमुक देवी देवता की कृपा क्यों नहीं हो पा रही और कैसे होगी । बहुत आसान सी बातें बताता है जो कोई भी कर सकता है । जलेबी खाना क्या कठिन है , रोज़ खा सकते अगर शुगर नहीं हो । सोचो कोई भगवान बन कर सभी से हवा में सांस लेने , सूरज की रौशनी , पीने का पानी , धरती पर कदम रखने तक की रायल्टी वसूल सकता है अगर उसके नाम पेटेंट हो जाये कि वही ईश्वर है । ये फज़ूल बात है कि ये उसने बनाया था कि नहीं । ऐसे तो हज़ारों साल से अपने देश के घर घर में देसी घरेलू इलाज दादी मां के बताये नुस्खे से होता ही है । हमारे आयुर्वेद के विद्वानों ने कोई रायल्टी मांगे बिना ये जानकारी हर खास-आम तक पहुंचा दी । अब इनकी रायल्टी उसी को मिलेगी जिसने इनका पेटेंट करवा लिया अपने नाम । हम अब भी सोचते ही रहे तो कोई अमेरिका वाला पेटेंट करवा लेगा भगवान को खोजने का अपने नाम पर । तब सब मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा उनका अधिकार क्षेत्र में आ जायेगा , उनको अपनी आमदनी से रायल्टी के रूप में हिस्सा देना होगा । तब हम क्या करेंगे ।  क्या वही दोहरायेंगे जो डंकल प्रस्ताव पर किया था । कुछ दिन विरोध सभायें कर भाषण देने के बाद खुद ही हस्ताक्षर कर हथियार डाल देंगे अमरीका वालों के दबाव में । जो वामपंथी कसमें खाते थे कभी गैट समझौते को न मानने की , खुद शामिल थे उस सरकार को समर्थन करने वालों में जिसने उसको स्वीकार किया । चुपचाप मोहर लगा दी संसद में । ये अब कोई मुद्दा ही नहीं रह गया , किसी भी दल को नहीं लगता कि इसको उठा कर कोई सरकार बनाई या गिराई जा सकती है या इसको उठाने से वोट मिल सकते हैं । जो ये नहीं कर सके वो विषय वो मुद्दा नेताओं को फज़ूल लगता है ।

       मैंने कहा था कि अगर कोई ईश्वर होने का पेटेंट करवा ले , मगर हम भारत वासी खुद को भगवान हरगिज़ नहीं कह सकते ।  भले है बहुत जो भगवान कहलाते हैं , मीडिया ने बना दिया अपने मकसद से , कुछ ताकत शोहरत मिलते ही खुदा बन जाते हैं इंसान नहीं रहते । मगर भगवान हैं ये नहीं कहते क्योंकि भगवान से उनको भी डर लगता है । मगर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि ये पेटेंट अपने नाम करवा लिया जाये कि भगवान को हमने ही खोजा था । ये झूठ भी नहीं है , हम साबित कर सकते हैं । हमारे साधू संत , सन्यासी , ऋषि मुनि , देवी देवता तक वर्षों बन बन भटकते रहे , तपस्या करते रहे पर्मात्मा को पाने को । इस अपने देश में करोड़ों देव वास किया करते थे , तो बहुमत भी अपना ही साबित किया जा सकता है । अब वो सब किधर गये ये सवाल मत पूछना , कलयुग में राक्षस ही मिलते हैं उनके रूप में । लेकिन जब हमने खोजा था भगवान को तो इसका पेटेंट अपने नाम होना ही चाहिये । अब आप सोचोगे कि ऐसा करने से क्या हासिल होगा । तो समझ लो जब भगवान पर अपना पेटेंट होगा तब उसकी बनाई हर चीज़ पर अपना अधिाकर खुद ही हो जायेगा । तब उनको पता चलेगा जिन्होंने हमसे गैट समझौते पर हस्ताक्षर लिये थे । हवा पानी चांद सूरज , रौशनी अंधेरा सब की यहां तक कि बरसात की रायल्टी देनी होगी , इंद्र से लेकर सभी देवता अपने ही हैं । तब पता चलेगा उनको भी कि पेटेंट करवाना क्या होता है । 
 
 The God Patent

मार्च 25, 2014

POST : 425 भगवान के लिए अब तो इंसान बनाएं ( आलेख ) डा लोक सेतिया

 भगवान के लिए अब तो इंसान बनाएं ( आलेख ) डा लोक सेतिया

सब से पहले सभी धर्मों के अनुयाईयों से निवेदन कि कृपया इसको सही परिपेक्ष्य में समझें। मेरा किसी देवी देवता धर्म गुरु के प्रति , किसी की आस्था के प्रति रत्ती भर भी विरोध नहीं है। सच कहूं तो जो भी सभी धर्म सिखाते हैं मैंने उसी को समझने का प्रयास ही किया है। कल इक मित्र की वाल पर उनके किसी मित्र की पोस्ट को पढ़ा। जिसमें बताया गया था कि वे अपने धर्मस्थल की यात्रा पर गये और उनके साथ कोई घटना घटी और उनको सहायता की ज़रूरत आन पड़ी। उनके पास किसी का दिया एक कार्ड था और जब सम्पर्क किया तो जिन का निकला वो भी तब वहीं उस धर्मस्थल की यात्रा पर थी। इसको उन्होंने अपने ईष्ट देव की अनुकंपा बताया हुआ था। मैंने इसको उनकी इंसानियत समझा जिन्होंने उनकी सहायता की। मैंने सोचा क्या सभी देवी देवताओं को इसी तरह गुणगान कर ही भगवान नहीं बनाया गया है। और यहां सबसे पहला प्रश्न यही मन में आया कि वहां कितने ही लोग थे क्या उनमें कोई भी सहायता नहीं करता अगर उनकी जान पहचान का कोई नहीं मिल पाता। क्या ये तो और भी विडंबना की बात नहीं होती कि इतने धार्मिक लोगों में सच्चा धर्म किसी को याद नहीं होता। मगर सच तो यही है , शायद ही कोई असहाय को सहारा देने को तत्पर रहता है। मैंने देखा कि हम जिस धर्म ग्रंथ की पूजा करते हैं उसकी शिक्षा को मानते क्या समझते तक नहीं। हैरानी है ऐसे में हम सोचते हैं ईश्वर प्रसन्न हो जाता होगा सर झुकाने से और चढ़ावा चढ़ाने से। जिसको दाता कहते उसको भिखारी समझते हैं क्या हम , सोचना चाहिए। शायद अब इस बात को समझना होगा कि इंसान की इंसानियत बड़ी है किसी भी इष्ट देव देवता गुरु खुदा से। यकीन करें अगर हम अब भगवान बनाना छोड़ इंसान को इंसान बनाने का प्रयास करें तो न कोई भूखा रहेगा न कोई बेसहारा। वही पुराना गाना , इंसान का इंसान से हो भाईचारा , यही पैगाम हमारा। मैं देखता हूं फेसबुक पर हर कोई अपने अपने देव की तस्वीर को टैग कर जय जयकार करता रहता है। मुझे नहीं लगता ऐसा करने से किसी का कोई कल्याण होता होगा। काश लोग अपने धर्म का डंका पीटने की जगह उसका पालन कर कोई सार्थक काम कर रहे होते औरों की सहायता करने का। तब ऐसे एक कहानी नहीं होती कभी कभी , हर जगह कोई इंसान इंसानियत निभा रहा होता। शायद भगवान की किसी को ज़रूरत ही नहीं होती। किसी शायर का शेर है , अब कोई धर्म ऐसा भी चलाया जाये , जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाये। 

 

मार्च 20, 2014

POST : 424 अपनी महबूबा पर कवि की कविता ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

अपनी महबूबा पर कवि की कविता ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      

कवि की महबूबा ने कवि से
इक दिन कहा मनुहार से
कोई कविता मुझ पर लिखो
बोली पहली बार बड़े प्यार से ।

कवि उलझन में पड़ गया
सोचने लगा आज मर गया
कल तुमको सुनाऊंगा ये
वादा करके वापस घर गया ।

जब दोनों अगले दिन मिले
भूले सभी के सब थे गिले
इक बस वही तमम्ना थी
सुन प्रेमी की कविता दिल खिले ।

बोला कवि सुन मेरी सनम
आती है बहुत ही तुमको शर्म
आधी सुनाऊंगा मैं कविता तुझे
बाकी समझ लेना खा मेरी कसम ।

तब सुनाई कवि ने कविता नई
लिखे थे जिसमें हसीं के गुण कई
सुकोमल सुमधुर सुंदर बदन
ढूंढू तुम में हमेशा गुण यही ।

सुन कर सपनों में खो गई
तन मन से कवि की हो गई
कोई है मेरा भी इतना दीवाना
धरती से उड़ आकाश को वो गई ।

इक कसक रही सुनाई अधूरी
सोचा खुद पढ़ लूंगी कभी पूरी
चुपके से चुरा लाई वो डायरी
हो गया जब पढ़ना बहुत ज़रूरी ।

आगे कवि ने था लिखा प्रेमिका
जो चाहता वो ही सुनाने को लिखा
तुझमें नहीं कभी आता नज़र वो
रहता यही हरदम मैं तुममें ढूंढता ।

इक दिन चुरा कर ले जाओगी
कसम को मेरी तुम भुलाओगी
नहीं तुम्हारा खुद पर बस चलता
सच जान कर फिर पछताओगी ।

तुम क्या हो अब ये जान लो
सूरत को अपनी ज़रा पहचान लो
न चाल है न कोई सलीका हुस्न का
सच तो है इक कर्कश जाल हो ।

पर क्या करता था लिखना ज़रूरी
श्रोता होती है कवि की मज़बूरी
बस यही इक मुश्किल थी मेरी
वर्ना भाती है सबको तुमसे दूरी । 




मार्च 17, 2014

POST : 423 बेघर हैं इस घर के मालिक ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      बेघर हैं इस घर के मालिक ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     बहुत बड़ा ही ये मकान , कहते हैं ये भारत देश है। माना जाता है देश की सवा सौ करोड़ जनता खुद इसकी मालिक है , मगर उनको इसकी खबर ही नहीं कि ये देश उनका है। इस जनता में वे करोड़ों लोग भी हैं जो सड़कों -फुटपाथों को अपना ठिकाना बना ज़िंदगी बसर कर रहे हैं। इस देश रूपी भव्य मकान पर आज़ादी के बाद से कुछ राजनेताओं ने कब्ज़ा जमा रखा है। वे रात दिन जनसेवा की बात कर शासन के नाम पर इस घर को लूट रहे हैं बेरहमी से। इन नेताओं के कई गुट बने हुए है जिनको ये अपना दल कहते हैं , हर इक गुट का दावा है कि इस आलीशान मकान का कोई न कोई हिस्सा उसी का है। कोई किसी खिड़की को अपनी विरासत समझता है कोई दरवाज़े को अपनी मलकियत बताता है। किसी का अधिकार आंगन पर है , किसी ने छत को निजी जगह समझ लिया है। खिड़की को पकड़े कोई जब चाहे उसको बंद कर देता है और हवा रौशनी तक को नहीं आने देना चाहता तो कभी जब चाहे तब उसको खुला छोड़ देता है चाहे आंधी तूफान से तबाही मच जाये।कोई किवाड़ को पकड़े हुआ है जो चाहता है कि वही लोग भीतर जा सकें जो हर दम उसकी जय जयकार किया करें। किसी गुट ने मुख्य हाल पर अपना अधिपत्य जमा रखा है बाकी गुटों ने किसी न किसी कमरे को हथिया लिया है। इस मकान की हर चौखट पर , एक एक ईंट पर किसी न किसी का नाजायज़ कब्ज़ा है। सब की नज़र माल गोदाम और रसोई घर पर रहती है , हर कोई अधिक से अधिक खा जाना चाहता है। पूरे मकान में दरारें ही दरारें हैं भ्रष्टाचार की , जिधर भी नज़र जाती है प्रशासन की मनमानी कामचोरी का जाला दिखाई देता है। लगता है किसी को भी इसकी साफ सफाई की बिल्कुल भी चिंता नहीं है। अभी इक नया गुट इनमें आ मिला है जो हाथ में झाड़ू पकड़े हुए था और सफाई की बात कहने के वादे पर इस मकान में घुसा था लेकिन दो दिन में ही उसकी वास्तविकता सामने आ गई है उसको बाकी सभी से अधिक जगह पर अपना अधिपत्य चाहिये। जाने ये कैसी सफाई करना चाहते हैं कि खुद ही गंदगी को बढ़ाने का काम करने लगे हैं।

    कहते हैं कि इस मकान का सब से खूबसूरत जो कक्ष है उसी में सत्ता रूपी सुंदरी वास करती है। ये तमाम नेता उसी के दीवाने हैं , सब रंगरलियां मनाना चाहते है उस सुंदरी के साथ। नेताओं के लिये इस से बढ़कर कोई भी सुख नहीं है , स्वर्ग का सुख इस के सामने कुछ भी नहीं है उनके लिये। सत्ता रूपी सुंदरी को हासिल करने को ये नेता कुछ भी कर सकते हैं। लाज शर्म , ईमानदारी नैतिकता सब को त्याग सकते हैं सत्ता सुंदरी के लिये। एक बार उसको अपने बाहुपाश में जकड़ लेने का सपना सब नेता उम्र भर देखता है। नेताओं को किसी मोक्ष की कामना नहीं होती कभी , जान जा रही हो तब भी इनको सत्ता सुंदरी को छोड़ और कुछ याद नहीं होता। हर नेता जल बिन मछली की तरह तड़पता रहता है उसी के लिये। इस मकान में जो सभा भवन है उसको हम्माम कहते हैं जहां पर सभी नग्न होते हैं। इसलिये उस सभा में किसी को कुछ भी करते रत्ती भर भी शर्म का एहसास नहीं होता है।

                     हर पांच वर्ष बाद और कभी उससे पहले भी चुनाव रूपी इक मेला लगता है। लोकतंत्र नाम का इक खेल खेला जाता है। नेता एक दूसरे पर कीचड़ उछालते हैं , इक दूजे पर कालिख पोत कर होली खेलने का मज़ा लेते हैं। तब थोड़े दिन तक सड़क - फुटपाथ पर रहने वाली जनता को खुश करने , उसको मूर्ख बना फिर से अपने अपने जाल में फसाने के प्रयास सभी गुट के नेता करते हैं। इस समय नेता गुट को भी त्याग देते हैं जब उनको लगता है कि सत्ता सुंदरी विरोधी गुट में शामिल होने से उसको वरमाला पहना सकती है। जनता को हर बार नये नये सपने दिखाये जाते हैं , रोटी कपड़ा घर , विकास की बातें , उसको जीते जी स्वर्ग दिखलाने तक का दावा या वादा किया जाता है। हर बार जनता इनकी बातों के जाल में फंस जाती है वोट दे देती है इनको विश्वास करके। सत्ता के सिंहासन पर बैठते ही नेता सारे वादे सारी कसमें भूल जाते हैं और कुर्सी मिलते ही जनता रूपी द्रोपदी का चीर हरण होता है भरे दरबार में। वहां तब सब धृतराष्ट्र बन जाते हैं। और ऐसे में कोई कृष्ण भी नहीं आता है उसकी लाज बचाने को। जनता की चीख पुकार इस मकान की दीवारों में दब कर रह जाती है।

              देश की आज़ादी के बाद से यही होता आया है , नेता इस देश रूपी जिस मकान में रहते हैं उसी की नींव को खोखला करने का काम करने को देश सेवा बता रहे हैं। ये नेता और प्रशासन के लोग जिस डाल पर बैठे हैं उसी को ही काटने का कार्य कर रहे हैं। तब भी खुद को बहुत अकलमंद समझते है ये सब। इसी मकान में तमाम जयचंद , मीर जाफर , विभीषण जैसे लोग भी रहते हैं जो बाहर वालों से मिलकर घर की ईंट से ईंट बजाने को व्याकुल हैं। कायदे कानून , जनता के हक़ सब इनकी मर्ज़ी पर हैं , जनता के हित पूरे करने में कोई काम नहीं आता और नेताओं का हित साधने में सब तत्पर रहते हैं। देखा जाये तो देश का कानून भी मकान के असली मालिक का कोई अधिकार नहीं समझता है , सारे कायदे कानून उनके हितों की रक्षा के लिये हैं जिनका कब्ज़ा होता है मकान पर। बस एक बार किरायेदार बन कर घुस गये तो फिर निकलने का नाम ही नहीं लेते। मालिक को किराया तक देना ज़रूरी नहीं है , केवल झूठा वादा करते हैं कि चुनाव के बाद पूरा किराया भी देते रहेंगे और मकान की देखभाल भी बराबर करेंगे। लेकिन चुनाव बीत जाने के बाद न वो याद रहता है जो कर्ज़ चुकाना है देश की मालिक जनता का न ही उसकी हालत को सुधारने का कोई प्रयास ही किया जाता है। हर बार हालत और भी खराब हो जाती है।
  

मार्च 15, 2014

POST : 422 ज़िंदा मुर्दा ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

          ज़िंदा मुर्दा ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

एक सरकारी अस्प्ताल में एक डॉक्टर और एक नर्स को निलम्बित कर दिया गया । क्योंकि उन्होंने इक ज़िंदा आदमी को मरा हुआ घोषित कर दिया था । बुद्धिजीवी लोग तो हमेशा से ये कहते रहे हैं कि जो व्यक्ति सब कुछ देख कर भी अपने स्वार्थ के लिये या डर के मारे चुप रहता है और बुराई का विरोध नहीं करता वो जीवित होते हुए भी मरा हुआ ही है । अब उनकी बात को सच मान लें तो देश में बहुमत ऐसे ही लोगों का है जो जीते जी मर चुके हैं । राजनीति में जिनको हाशिये पर धकेल दिया जाता है उन नेताओं की किसी को खबर नहीं होती कि कभी जिसकी जय - जयकार किया करते थे वो हैं भी कि स्वर्ग सिधार चुके हैं । राजनेताओं को सब से बड़ी इच्छा यही होती है कि उनको मौत सत्ता में रहते हुए कुर्सी पर ही आये ताकि उनका मातम पूरी शान से मनाया जाये ।

         हम ये खबर बहुत बार बहुत कलाकारों के बारे पढ़ चुके हैं कि अपने युग का कोई महान अभिनेता अपने जीवन के अंतिम समय गुमनामी और मुफलिसी में दिन काटता रहा । ऐसे में उन डॉक्टर और नर्स को कोई लावारिस अगर मरा हुआ लगा तो इसमें हंगामा बरपाने जैसी कोई बात नहीं थी । ज़िंदा होना ही ज़िंदगी नहीं होता । शायरी में ये आम सी बात है , आशिक प्रेमिका की बेवफाई से खुद को मरा हुआ बताते हैं । ज़िंदा हूं इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं , जलता हुआ दिया हूं मगर रौशनी नहीं । अगर रूठी हुई प्रेमिका मान जाये तो फिर से जान में जान आ जाती है । हमने तो सुना है जीना मरना बस इक सपने की तरह है , आत्मा अजर अमर है वो केवल शरीर रूपी वस्त्र बदल लेती है । वे दोनों शायद यही कामना कर रहे थे कि इसको नया शरीर मिल जाये । असल में किसी नर्स को किसी को मृत घोषित करने का अधिकार नहीं होता । शायद उसका दोष ये था कि वो मरीज़ को इतनी ज़रा सी बात नहीं समझा पाई कि जब डॉक्टर साहब कह रहे हैं कि तुम ज़िंदा नहीं हो तो तुमको उनकी बात मान खुद ही मर जाना चाहिये । अक्सर मरीज़ नर्स की प्यार से कही बात मान लिया करते हैं ।

                  यूं ऐसे भी बहुत सारे लोग हैं जिनको उनके अपनों ने ही मृत साबित कर दिया उनके नाम की जायदाद की वसीयत अपने नाम करवा कर बेचने के लिये । आजकल बैंक वाले ये प्रमाणपत्र लाने को कहते है कि मैं जीवित हूं , तभी पैंशन मिलती है । खुद डॉक्टरों को अपना पंजीकरण का नवीनीकरण ऐसा प्रमाणपत्र देकर करवाना होता है पांच वर्ष बाद । मैंने एक चाय की दुकान वाले को भी कितने लोगों को मरा हुआ घोषित करते देखा । कमाल का ढंग था उसका , उसकी ये आदत थी कि जो कोई चाय पी कर अपना बकाया नहीं चुका रहा हो बहुत दिनों से , सब के सामने उसके हिसाब के पन्ने पर लिख देता ये मर गया है । जब उसको पता चलता तब शर्मसार हो कर वो खुद पैसे दे जाया करता । लेकिन ये तीस साल पुराने युग में होता था , आजकल तो लोग शहर भर से कर्ज़ा लेकर रफूचक्कर हो जाते हैं । लोग सोचते शायद कर्ज़ों से तंग आ उसने ख़ुदकुशी कर ली है जबकि वो दूर किसी शहर में ठाठ बाठ से शान से जी रहा होता है ।
 
 ये मौत का फलसफा बड़ा ही अजीब है । कोई मरने की दुआ मांगता है लेकिन मौत नहीं आती तो कोई जानता है अब नहीं बच सकता मगर जीना चाहता है । किसी शायर ने तो कहा भी है ' मांगने से जो मौत मिल जाती कौन जीता इस ज़माने में ' । सच ये भी है कि लोग मौत के डर से जी ही नहीं रहे , रोज़ ही मरते हैं । चचा ग़ालिब भी कह गये हैं ' मौत का एक दिन मुईयन है , नींद क्यों रात भर नहीं आती ' । एक और शायर ये कहता है  ' मौत है एक लफ्ज़-ए-बेमानी , जिसको मारा हयात ने मारा ' । शायर दुष्यंत कुमार कहते हैं  ' आप बचकर चल सकें ऐसी कोई सूरत नहीं , रहगुज़र घेरे हुए मुर्दे खड़े हैं बेशुमार ।  
 
 दुष्यंत कुमार 🌻 पूरी ग़ज़ल पढ़ें। 👇 अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार  घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार आप बच कर चल सकें ऐसी

मार्च 10, 2014

POST : 421 पणिहारी और मुसाफिर ( हरियाणवी कहानी ) लोक कथा के लेखक अनाम होते हैं

        पणिहारी और मुसाफिर ( हरियाणवी कहानी ) 

                           ( लोक कथा के लेखक अनाम होते हैं )

         किसै गाम में एक बीरबानी रहया करै थी। वा बात बहोत जाणे थी। निरे किस्से कहाणी उसकी जीभ पै धरै रहैं थे। वा बोलण में इतनी चातर थी कि अच्छे अच्छे सयाणा की भी बोलती बंद कर देती थी।

       एक दिन दोपहर में वा पाणी भरण चली गई। कुये धोरे कै चार आदमी राह चलै जाँ थे। वे उस पणिहारी तैं बोले -ए हमनै पाणी प्या दे। वा बोली -देखो भाई मैं अणजाण माणस नै पाणी कोन्या प्याऊं। पहले न्यू बता दो अक तुम कूण सो। उन मैं तैं एक बोल्या -हम तो मुसाफिर सैं। वा बोली -झूठ। मुसाफिर तो इस जगत में दोए सैं। एक सूरज और दूसरा चाँद तम कड़े के मुसाफिर ? न्यू सुण कै दूसरा बोला -हम तो तिसाये सैं। फेर वा पणिहारी बोली -तिसाये तो दुनियां में दो ए सैं एक चातक और दूसरी धरती माँ तम कड़े के तिसाये। उसका यो जवाब सुण कै तीसरा बोल्या -ए हम तो बेबस हैं। इब की बार वा बोली -बेबस तो इस दुनियां मैं दो ए सैं एक कन्या और दूसरी गऊ। तुम कड़े के बेबस।वा उन चारां गैल्यां बात करण लाग री थी कि उसका पति खेतां कान्ही तैं चालता उसी रास्ते ओड़ी आ ग्या जड़ै कुआ था। उसने दूर तैं देख्या मेरी घर आली इन चार मलंगा गैल्यां बात घडण लाग री सै। वो तावला- तावला कुएं कान्ही चल पड़या। इतने मैं उस चौथे नै भी खिज कै कह दिया -हम तो मूर्ख सैं मूर्ख एक तूं है स्याणी सै। वा फेर बोली -मूर्ख तैं इस दुनियां मैं , वा अपणी बात पूरी ना कहण पाई इतने मैं उसका पति आ गया। वो छोह मैं थर भर कै बोल्या -मैं बहोत हाण का देखूं सूं इन चार मुस्टंडा गैल्यां के मस्ती मारै सै। घर ने हो ले। घरां जा कै वो बोल्या -तेरा चाल चलण ठीक कोन्या। वा बोली -झूठ सै। मैं तो खरी सूं खरी। चाहे जिसी परीक्षा ले ले। मैं तैयार सूं।
                        उसके पति ने राजदरबार में फरियाद कर दी। राजा ने न्यायधीश बुला कै इन दोनां की बात उसके आगै रख दी। पति की बारी आई तै वो बोल्या -जी या दोपहरी मैं कुंए पै खड़ी हो कै चार मुस्टंडा गैल्यां गिरकावै थी। बस इस नै मैं ना राखूं। मेरा पीछा छुड़या दो इस तैं। राजा ने भी उसके पति की बात साच्ची मान ली।

                                   न्यायधीश बोल्या -मैं पहल्यां इसका पक्ष बी तो सुण ल्यूं फिर पाछै फैसला करूंगा। न्यायधीश इस तांही बोल्या -इस नै तो अपणी बात कह दी। तेरे चाल चलण पर इल्ज़ाम ला दिया। इब तू अपणी सफाई मैं के कहणा चाहवै सै कह दे तनै पूरा मौका दे रह्या सूं अपना पक्ष सामणे रखण ताहीं।

                        वा बोली- ना तै मैं बदचलन सूं अर ना मैं उन चारयां गैल्यां कोए मस्ती मारूं थी। वे कुएं धौरे कै जां ये। उन्नह पाणी मांग लिया। मन्नै कह दिया -दिखै मैं अणजाण ताही पाणी कोन्या प्याऊं। तुम न्यू बता दो अक तम कूण सो। उन मैं एक बोल्या -मुसाफिर। मन्नै कहा -मुसाफिर तो इस दुनियां में बस दो ए सैं एक सूरज और दूसरा चाँद। न्यायधीश ने बूझ्या -ये क्यूकर। वा बोली -न्यूं तो सब सफर करै सैं। पर अपणे मतलब खात्यर करैं सैं मगर सूरज अर चाँद तै अपना सफर जगत की भलाई ताहीं करैं सैं। सच्चे मुसाफिर तै ये दो ए सैं ना। बता मन्नै के गलत कह दिया। न्यायधीश बोल्या -बात तो तेरी ठीक लागै सै। चल आगै बता के कहणा चाहवे सै। फिर वा बोली -उन मैं तैं दूसरा बोल्या -हम तिसाये है। मन्नै कहा -तिसाये तो दुनियां मैं बस दो ए सैं एक चातक अर दूसरी धरती माता। न्यायधीश बोल्या -अपणी बात साफ -साफ समझा कै बता। वा बोली -तिस लागै पीछै सारे प्राणी कितै न कितै तिस मिटाण का राह ढूंढ ले सैं। पर धरती माता अर चातक पंछी की प्यास तो जिब बुझै सै जिब भगवान मींह बरसावै। ना तै ये दोनों तो तिसाये ए मरते रहै सैं। ये दो ए सच्चे तिसाये सैं।

                                न्यायधीश को उसकी या बात भी माननी पड़ी। वो फेर बोल्या -आगे के होया। इब उसनै  बताया कि तीसरा बोल्या -हम तो बेबस सैं। मन्नै कह्या -बेबस तो दुनियां मैं दो ए सै कन्या अर गऊ। न्यू सुण कै न्यायधीश बोल्या -या बात भी तनै खोल समझाणी पड़ेगी। उसने जवाब दिया -देखो जी गऊ का मालिक उसका जेवडा खोल कै किसै के हाथ में पकड़ा दे वा बेचारी कुछ नहीं कर सकती। अर याहे बात कन्या पै लागू हो सै। उसके माँ बाप जिस गैल्यां उसके फेरे फेर दें वा भी उसै गैल्यां ज़िंदगी भर के लिये त्यार हो जा। दोनों बेबस तो होगी ना।

                        न्यायधीश को उसकी या बात भी सही जचगी वो बोल्या - फेर क्या होगा। वा बोली - जी चौथा बोल्या हम तो मूर्ख सैं। मन्नै कहा -मूर्ख तो इस जगत में दो ए सैं। बस इस बात का जवाब देण तै पहल्यां यो मेरा पति उड़ै आ गया और मन्नै घरां ले आया। फिर थारे दरबार में मेरी शिकायत कर दी और बदचलन कहण लागया।

                        इब न्यायधीश बोल्या - देख इतना तै हम समझगे कि तू बदचलन कोन्या। पर इस सवाल का जवाब तो दे दे कि संसार में दो मूर्ख कोण कोण सैं। वा बोली - जाण दो जी के करोगे जवाब सुण कै। बस न्याय कर दो। न्यायधीश बोल्या - ना इस सवाल का जवाब भी तन्नै देणा ए पड़ेगा। वा बोली - आप नै इब ताही मेरे सारे जवाब ठीक लागै सैं। के बेरा यो जवाब गलत हो ज्या। न्यायधीश बोल्या -तू समझदार लुगाई सै। तेरा जवाब गलत नहीं हो सकता। वा बोली - ठीक सै मैं जवाब दे तै दयूंगी मगर जै कोई बुरा मान गया तै इसकी जिम्मेदारी थारी। बोलो जै मन्ज़ूर करते हो तो मैं जवाब दयूंगी। न्यायधीश व राजा बोले मन्ज़ूर।

                  इब वह बोली -पहला मूर्ख तो वो सै जो बिना पूरी बात की सच्चाई जाणे किसी पै इल्ज़ाम लगा दे जुकर मेरे पति ने ला दिया कि मैं चार मुस्टंडा गैल्यां गिरकाऊं थी। और दूसरा मूर्ख वो हो सै जो किसी की कही ओडी बात पै बिना सोचे समझे यकीन कर ले जुकर म्हारे राजा साहब नै मेरे पति की बात मान ली और मन्नै बदचलन समझण लाग्गे। छोटा मुहं बड़ी बात कहण के लिये माफी चाहूँ सूं।
                                उसकी ये बात सुण कै राजा वा न्यायधीश की आँखे खुली की खुली रहगी। वे उसके पति ताही बोले -तू तै भागवाला सै जो इतनी समझदार बीरबानी तेरी पत्नी सै। इसकी सारी बात मान्या कर सुखी रहेगा।

           ( सूचना - ये रचना हरिगंधा पत्रिका के फरवरी मास के अंक में प्रकाशित हुई है । 
   जिस का नाम पत्रिका में दिया गया है उस लेखिका की अनुमति से ही प्रकाशित किया गया है मेरे द्वारा      अपने ब्लॉग पर । 
साभार ।  मुझे बताया गया है कि ऐसी सभी कथायें कुछ अनाम लेखकों की रचना होती हैं ) 
 

 

मार्च 08, 2014

POST : 420 कहां से कहां आ गये हम लोग ( आईने के सामने ) डा लोक सेतिया

 कहां से कहां आ गये हम लोग (आईने के सामने) डा लोक सेतिया

सच कहूं तो अभी समझ नहीं आ रहा कि आज लिखना क्या है। बस यही चाहता हूं कि कुछ नया लिखा जाये सार्थक लिखा जाये। विषय तमाम हैं मन में फेसबुक से लेकर समाज तक , देश की राजनीति से लेकर पत्रकारिता तक। अपनी गली की बात से देश की राजधानी तक। इधर उधर यहां वहां सब कहीं का हाल। बहुत ही आश्चर्य की बात है जिस किसी से भी चर्चा करो सभी जानते हैं कि कहीं भी सब ठीक नहीं है। मगर किसी को सच में इस बात से सरोकार नहीं है कि उसको कब कौन कैसे सही करेगा। क्या हम किसी और देश की बात करते हैं , ये अगर हमारा अपना वतन है तो इसकी बदहाली को देख कर हम भला चैन से कैसे रह सकते हैं। कभी कभी लगता है जैसे हम लोग संवेदनहीनता का शिकार हो गये हैं। किसी को किसी के जीने मरने से कुछ फर्क नहीं पड़ता है। जिसको देखो अपना ही रोना रो रहा है। ये बेहद चिंता का विषय है कि लोग शोर भले मचाते हों सब देशवासी एक हैं ये देश सभी का है और हम एक हैं मगर ये बात वास्तव में दिखाई देती नहीं है। क्या यही आधुनिक होना है , क्या हम सभ्य नागरिक बन रहे हैं या यहां हर कोई अपने स्वार्थ की बात ही सोचता है। प्रश्न बहुत हैं सामने जवाब कोई भी नहीं। एक तरफ करोड़ों लोग दो वक्त रोटी को तरसते हैं तो दूसरी तरफ कुछ लोग बेरहमी से हर चीज़ की बर्बादी दिन रात करते हैं। क्या ये देश दो हिस्सों में बटा हुआ है , विशेष लोगों को सभी कुछ और बाकी आम लोगों को कुछ भी नहीं। कितने राजनैतिक दल कितने तथाकथित नेता हैं देश में , लेकिन सभी का ध्येय सत्ता की राजनीति करना मात्र हो गया है। सब जोड़ तोड़ सारी भागमभाग कुर्सी हथियाने का एकमात्र मकसद लेकर। कोई विचारधारा नहीं , कोई योजना नहीं देश में सभी को एक समान जीने के हक़ मिलने की। ये कैसा विकास हो रहा है जिसमें गरीब और अमीर के बीच अंतर खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा , बल्कि और अधिक बढ़ता ही जा रहा है। क्या ये हैरानी की बात नहीं है कि जब देश समाज रसातल की तरफ जाता नज़र आता है तब हम तथाकथित पढ़े लिखे लोग कोई चिंतन करने की बजाय फेसबुक पर ट्विटर पर चैटिंग पर मौज मस्ती कर अपना समय बिताते नहीं व्यर्थ बर्बाद करते हैं। कभी काश सोचते कि यही वक़्त यही साधन यही ऊर्जा किसी और की भलाई करने पर लगाते। ऐसा लगता है हम आंख वाले अंधे बन चुके हैं , आस पास कुछ भी घटता रहे हम विचलित नहीं होते। पत्रकारिता करने वाले कभी निष्पक्ष और निडर ही नहीं होते थे बल्कि उनका उदेश्य धन कमाना कभी नहीं होता है। तब कहा जाता था कि पैसा ही बनाना है तो और कोई काम कर लो अगर पत्रकारिता करनी है तो अपना घर जला कर भी रौशनी करो। आज वही पत्रकारिता शुद्ध कमाई का कारोबार बन चुकी है , विज्ञापन , प्रसार संख्या , टी आर पी , यही मापदंड बन गये हैं इनके। सच बोलते नहीं हैं , झूठ को सच का लेबल लगा कर बेचने का काम करते हैं। एक अंधी दौड़ में शामिल हो चुके हैं ये सब , एक नीचे गिरता है तो बाकी भी उससे भी नीचे गिरने को तैयार हैं , अवल आने के लिये। लगता है इनमें यही प्रतियोगिता चल रही है कि कौन मूल्यों का कितना अवमूल्यन करता है। धर्म जो दीन दुखियों की सेवा की बात किया करता था आज वो भी धन संपति जोड़ने और अहंकार करने की राह चल पड़ा है। हर बात में लाभ हानि का गणित होता है चाहे वो शिक्षा के विद्यालय हों , स्वास्थ्य सेवा देने वाले अस्प्ताल या फिर समाज सेवा ही क्यों नहीं हो। वो जिनके पास दौलत के अंबार लगे हैं वे भी दौलत की हवस में अंधे हो बिना जाने समझे हर उचित अनुचित रास्ता अपना रहे हैं। ये फिल्मी सितारे हों या खिलाड़ी या फिर येन केन प्रकरेण धन कमाने वाले यही आज के आदर्श बन गये हैं और इनका गुणगान किया करता है आज का मीडिया जो खुद इन के जैसा ही बनना चाहता है। जनहित , देशहित , त्याग और समाजिक मूल्यों की बातें शायद किस्से कहानी की बात लगती है या कुछ ऐसी पुरानी किताबों में लिखी हुई है जो अब उपयोगी समझी ही नहीं जाती। राम और कृष्ण का देश नहीं रह गया ये देश अब , रद्दी के भाव बिकती हैं आदर्शवादिता की सारी बातें।सच कहूं तो अपने देश की , अपने समाज की इस बर्बादी के लिये हम सभी किसी न किसी रूप में ज़िम्मेदार हैं। चलो सब आगे बढ़ें और अपने अपने हिस्से की धूल को साफ करें। दोष उसका नहीं जो आईना दिखाता है , दाग़ अपने चेहरे पर जो हैं , साफ उनको करना होगा।  
 

 

मार्च 02, 2014

POST : 419 ज़िंदगी के दो किनारे ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      ज़िंदगी के दो किनारे ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       ज़िंदगी इक बहते हुए पानी की नदी है जिसके दो किनारे होते हैं। शादी इस तरफ का किनारा है तो प्यार इश्क़ मुहब्बत उस दूसरी तरफ का किनारा। साफ बात तो ये है कि शादी और प्यार मुहब्बत दो अलग अलग चीज़ें हैं। जाने क्यों कुछ लोग गुमराह करते हैं ये समझा कर कि प्यार करने वालों को विवाह के बंधन में बंध जाना चाहिये , कुछ लोग ये अफवाह भी फैलाते हैं कि शादी कर ली जिस किसी से उसी से प्यार खुद-ब-खुद हो ही जाता है। सच कहा जाये तो शादी और इश्क़ दोनों दुनिया की सब से गंभीर समस्याओं के नाम हैं जिनका आज तक हल कोई भी खोज नहीं पाया है। ये सवाल बेहद कठिन है कि जो एक दूसरे को सच्चा प्यार करते हों उनको आपस में शादी करनी चाहिये या नहीं। देखा जाये तो जिसे सच्चा प्यार करते हैं उसकी भलाई चाहते हैं तो उसको आज़ाद ही रहने देना चाहिये , बंधन में जकड़ कर खुद ही अपने प्यार का गला न दबायें। जीवन  भर साथ जीने मरने का शौक आप दोनों के सपनों को बिखर जाने टूट कर चूर चूर होने का कारण बन सकता है। जैसे कोई अदालत किसी बेगुनाह को सूली पर चढ़ाने के बाद किसी भी तरह भूल सुधार नहीं कर सकती , किसी को फिर से जिवित नहीं कर सकती उसी तरह शादी की गलती को भी सुधारा नहीं जा सकता है। शादी करने के बाद तलाक लेना देना भी इक नई गलती है न कि पहली गलती को सुधारना। शादी एक ऐसा चक्रव्यूह है जिस से कोई अभिमन्यु बाहर नहीं निकल पाता है एक बार फस जाने के बाद।


             ऐसा लगता है कि विवाह की परंपरा कुछ लोगों ने अपना कारोबार चलाने को शुरू की होगी। बैंड बाजे वाले , टेंट वाले , हलवाई , रौशनी करने के काम में लगे लोग यही चाहते हैं कि हर दिन ऐसा कुछ न कुछ चलता ही रहे। कभी नाई और पंडित किया करते थे कुंवारों को सपनों के जाल में उलझाने का काम तो आजकल मैरिज ब्यूरो से लेकर इंटरनेट तक हर तरफ जाल ही जाल बिछा रखा है। अब कोई बच कर जाये तो जाये किधर। शायद मन पसंद वर वधू की तलाश करना दुनिया का सब से कठिन कार्य है , लगभग असंभव। इक सिनेमा की नायिका ने कई साल पहले टीवी पर शो शुरू किया था जोड़ियां बनाने का। " कहीं न कहीं कोई है " नाम सुनते ही सिरहन सी होती थी , मुझे तो ये किसी हॉरर फिल्म का शीर्षक लगता था। मैं उस कार्यकर्म को देखने का साहस कभी नहीं कर पाया था। बाद में भी टीवी पर सवयंबर होते रहे किसी तमाशे की तरह। जिस नायिका ने शुरुआत की थी उसको जीवन साथी विदेश में कहीं मिल सका। अब सब लोग तो देस को छोड़ परदेस नहीं जा सकते , यहां की नायिका तो हर दम गुनगुनाती है " परदेसियों से न अखियां मिलाना "।

                 अपने जीवन साथी को लेकर सभी की मधुर कल्पना होती है। कौवा भी खुद को हंस समझ कर सच्चे मोती की तलाश करता है। हर लड़का हर लड़की अपने लिये हज़ारों नहीं लाखों में एक की तलाश करते हैं। जब किसी को चुन कर विवाह कर लेते हैं तब पता चलता है कि जल्दबाज़ी में सही निर्णय नहीं लिया जा सका। तब पछताये कुछ हासिल नहीं होता , चुप रहने में ही भलाई है , गले पड़ा ढोल बजाना पड़ता है उम्र भर। असली ज़िंदगी में सपनों की हसीन दुनिया का नामो-निशान तक नज़र आता नहीं। दूर के ढोल सुहावने लगते हैं इसका पता पति पत्नी दोनों को बहुत जल्द चल जाता है। कुछ लोग शादी को दो दिलों का मिलन समझते हैं , कुछ इसको शुद्ध लेन देन का इक कारोबार। दहेज की कीमत चुकाने के बाद ही दूल्हा खरीदा जाता है। शादी में रिश्तेदार और जान पहचान वाले सभी बुलाये जाते हैं ये खबर देने को कि दो लोग आज से कुंवारे नहीं रह गये हैं। जैसे किसी शोरूम में कोई माल सोल्ड का लेबल चिपका कर रखा हो , उसको कोई खरीदने की बात नहीं कर सकता। आजकल अच्छे दूल्हे का खरीदार ही नहीं मिलता , कितने दूल्हे बिक्री के लिये शोरूम में रखे रहते हैं। यूं शादी करने को उम्र की कोई सीमा तो नहीं होती लेकिन इक उम्र के बाद डिमांड खत्म हो जाती है। सब कुछ की चाहत में कुछ भी हासिल नहीं होता। मूर्ख लोग ही दोबारा शादी किया करते हैं , उनके लिये रिजेक्टेड माल ही उपलब्ध होता है। तब लगता है कि पहली वाली इससे अच्छी थी , तलाक नहीं देना था।

                टीवी सीरियल की बात और है। उनके पास विषय ही यही बचा है , शादीशुदा नायक की कुंवारी प्रेमिका या किसी कुंवारे का विवाहित पर फिदा होना। असल जीवन में सब को नयापन ही पसंद होता है। असली ज़िंदगी में शादी भी मुश्किल से हो पाती है और तलाक तो बहुत ही मुश्किल। लेकिन फ़िल्म वालों की कहानी में और टीवी सीरियल में कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर करते ही तलाक हो जाता है। कई सीरियल में दर्शक याद तक नहीं रख सकते कि कब कौन किसका पति था , कौन किसकी पत्नी और अब किसका किससे क्या रिश्ता हो गया है। आजकल प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ गया है ऑनर किलिंग्स के बावजूद। लेकिन अब प्रेम भावनात्मक नहीं रह गया है , बिना सोचे समझे नहीं होता , ठोक बजा कर किया जाता है। पुराने युग का इश्क़ केवल कहानियों तक सिमित हो गया है। इस दौर के आशिक़ तू नहीं और सही में यकीन रखते हैं। शायद ये जान चुके हैं कि ये इश्क़ नहीं आसां। सच तो ये है कि शादी और प्यार मुहब्बत नदी के दो किनारों की तरह है , इनके बीच बने पुल अधिक दिन तक टिका नहीं करते।

POST : 418 1 तू पी - तू पी ( लोक कथा ) 2 धरती का रस ( नीति कथा ) अनाम लेखक की रचनाएं होती हैं लोक कथाएं

                तू पी -तू पी ( लोक कथा )

ये राजस्थानी लोक कथा है। बचपन की दो सखियां रेगिस्तान से गुज़र रही होती हैं। रास्ते में उनको एक विचित्र दृश्य नज़र आता है। हिरणों का इक जोड़ा वहां मृत पड़ा होता है और पास में थोड़ा सा पानी भी होता है। इक सखी पूछती है दूसरी सखी से भला ऐसा क्योंकर हुआ होगा , ये दोनों प्यासे कैसे मरे हैं जब यहां पानी भी था पीने को। दूसरी सखी बताती है ये दोनों इक दूजे को प्रेम करते थे , प्यास दोनों को बहुत लगी थी लेकिन पानी कम था इतना जो इनमें से एक की प्यास ही बुझा सकता था। दोनों इक दूजे को कहते रहे तू पी - तू पी , मगर पिया नहीं किसी ने भी। दोनों चाहते थे कि जिसको प्रेम करते वो ज़िंदा रहे और खुद मर जायें , साथ साथ मर कर अपने सच्चे प्रेम की मिसाल कायम कर गये। सखी इसको ही प्यार कहते हैं।

                       बहुत साल बीत गये और वो दोनों सखियां बूढ़ी हो गई। फिर रेगिस्तान में उनको वही दृश्य दिखाई दिया और फिर एक सखी ने कहा दूसरी से कि देख सखी वही बात आज भी नज़र आ रही है। दूसरी सखी बोली अरी सखी तू किस युग की बात करती है ये वो बात नहीं है। हालत वही थी कि दोनों प्यासे थे मगर पानी थोड़ा था जो किसी एक को बचा सकता था। ये दोनों आपस में लड़ते रहे पानी खुद पीने के लिये। दूसरे को नहीं पीने देने के लिये लड़ते हुए मर गये , किसी ने भी दूसरे को पानी नहीं पीने दिया। ये आज के प्रेमियों के स्वार्थ की बात है सखी , अब वो प्यार कहां जो दूजे के लिये जान देते थे।

             धरती का रस ( नीति कथा )

एक बार इक राजा शिकार पर निकला हुआ था और रास्ता भटक कर अपने सैनिकों से बिछड़ गया। उसको प्यास लगी थी , देखा खेत में इक झौपड़ी है इसलिये पानी की चाह में वहां चला गया। इक बुढ़िया थी वहां , मगर क्योंकि राजा साधारण वस्त्रों में था उसको नहीं पता था कि वो कोई राह चलता आम मुसाफिर नहीं शासक है उसके देश का। राजा ने कहा , मां प्यासा हूं क्या पानी पिला दोगी। बुढ़िया ने छांव में खटिया डाल राजा को बैठने को कहा और सोचा कि गर्मी है इसको पानी की जगह खेत के गन्नों का रस पिला देती हूं। बुढ़िया अपने खेत से इक गन्ना तोड़ कर ले आई और उस से पूरा गलास भर रस निकाल कर राजा को पिला दिया। राजा को बहुत ही अच्छा लगा और वो थोड़ी देर वहीं आराम करने लगा। राजा ने बुढ़िया से पूछा कि उसके पास कितने ऐसे खेत हैं और उसको कितनी आमदनी हो जाती है। बुढ़िया ने बताया उसके चार बेटे हैं और सब के लिये ऐसे चार खेत भी हैं। यहां का राजा बहुत अच्छा है केवल एक रुपया सालाना कर लेता है इसलिये उनका गुज़ारा बड़े आराम से हो जाता है। राजा मन ही मन सोचने लगा कि अगर वो कर बढ़ा दे तो उसका खज़ाना अधिक बढ़ सकता है। तभी राजा को दूर से अपने सैनिक आते नज़र आये तो राजा ने कहा मां मुझे इक गलास रस और पिला सकती हो। बुढ़िया खेत से एक गन्ना तोड़ कर लाई मगर रस थोड़ा निकला और इस बार चार गन्नों का रस निकाला तब जाकर गलास भर सका। ये देख कर राजा भी हैरान हो गया और उसने बुढ़िया से पूछा ये कैसे हो गया , पहली बार तो एक गन्ने के रस से गलास भर गया था। बुढ़िया बोली बेटा ये तो मुझे भी समझ नहीं आया कि थोड़ी देर में ऐसा कैसे हो गया है। ये तो तब होता है जब शासक लालच करने लगता है तब धरती का रस सूख जाता है। ऐसे में कुदरत नाराज़ हो जाती है और लोग भूखे प्यासे मरते हैं जबकि शासक लूट खसौट कर ऐश आराम करते हैं। राजा के सैनिक करीब आ गये थे और वो उनकी तरफ चल दिया था लेकिन ये वो समझ गया था कि धरती का रस क्यों सूख गया था।

              ( ये दोनों कहानियां आज की वास्तविकता को भी दर्शाती हैं )
 

 

फ़रवरी 17, 2014

POST : 417 नकाब देवताओं की , पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     नकाब  देवताओं की  पहनी है दानवों ने ( हास-परिहास )

                                डॉ लोक सेतिया

कलयुग में होने लगी जब सत्य युग की बात
बस तभी बरसी बहुत नोटों की यहां बरसात
लगने लगे संतों के आश्रमों में सोने के भंडार
गली गली जो घूमते उनको मिलती नहीं खैरात ।

प्रवचन दिये सदकर्म के खुद रहे करते कुकर्म
लेकिन नहीं आती है अब तलक किसी को शर्म 
औरों को दिया उपदेश छोड़ो लोभ माया मोह  
अंबार धन के जमा करना है ख़ुद उनका तो धर्म ।

जाने किधर से आ गये हैं सच के नये अवतार
कहने लगे सब को तेरा होगा हमसे ही उद्धार
होने लगी सब तरफ जब उनकी जय जयकार
आम आदमी से बन गये सत्ता के भी दावेदार ।

कांटे सब को बताया हैं सब बोते शूल ही शूल  
इस जहां में इक हमीं हैं खुशबू वाले कुछ फूल
बिना किसी नींव के लो कर दिया खड़ा महल
बिखर गया इक झौंके से अब उड़ रही है धूल ।

दो दिन में आपके देखे हैं सबने अजब अंदाज़
अंजाम जाने क्या होगा अच्छा नहीं आगाज़
कल तक जिस जनता को मालिक थे बताते
अब छीन कर लेने लगे उसी के सर से ताज़ ।

देख लो बंदो में ही बंदे कुछ खुदा बन गये हैं  
हमने समझा आदमी हैं वो ये क्या बन गये हैं  
रात देखा इक डरावना सा हमने कोई ख्वाब
चेहरे बदल कर दानव सब देवता बन गये हैं । 
 

 

फ़रवरी 16, 2014

POST : 416 खबर खबर वालों की ( मीडिया की बात ) डा लोक सेतिया

    खबर खबर वालों की ( मीडिया की बात ) डा लोक सेतिया

वो सच की बात कहने का दावा करते हैं। मगर सच क्या है ये वो भी जानते हैं। हर सच पूरा सच नहीं होता , उसके पीछे कोई और कहानी भी होती है जिसको सामने नहीं आने दिया जाता। कभी पत्रकारिता में बड़े ज़ोर शोर से चर्चा होती थी पीत पत्रकारिता की। अब ये विषय कभी सुनाई ही नहीं देता। देखा जाये तो आज की सारी की सारी पत्रकारिता ही पीलिया रोग से पीड़ित है। सावन के अंधों जैसे बन चुके हैं , सब ने किसी न किसी रंग का चश्मा लगाया हुआ है। इनकी वास्विकता को उजागर करने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि इनकी खुद की परिभाषा क्या है। आज इनको याद दिलाना ज़रूरी है कि पत्रकारिता का पहला सबक क्या कहता है। खबर किसको कहते हैं ? " खबर वो सूचना है जिसको कोई छिपाना चाहता है , लोगों तक पहुंचने ही नहीं देना चाहता , पत्रकार का काम है उसको खोजना उसको तलाश करना उसको ढूंढना और पता लगा कर लोगों तक पहुंचाना "। मगर आज के अखबार वाले और समाचार टीवी चैनल वाले तो वही बता रहे जिसको कोई खुद बताना चाहता है। कोई प्रैस नोट भेजता है कोई पत्रकार वार्ता करता है। बात ये भी नहीं कि इनको धृतराष्ट्र की तरह कुछ दिखाई नहीं देता हो , अफसोस तो इस बात का है कि इन्होंने खुद गंधारी की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। इनको अपना स्वार्थ ही नज़र आता है , कर्त्तव्य नहीं। टी आर पी , प्रसार संख्या और विज्ञापनों का मोह , ये सब के सब फंस चुके हैं इसी जाल में। सिनेमा वालों ने जिस तरह खलनायक को नायक बना प्रस्तुत किया और ऐसा संदेश समाज को देने लगे कि ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिये और बुराई का अंत करना है तो खुद भी बुरे बन जाने में कोई हर्ज़ नहीं। कोई आपके प्रेम को स्वीकार नहीं करे तो उसको डराना , भयभीत करना प्यार है। आज जिनको आप नायक महानायक बता रहे हैं उन्होंने अपनी फिल्मों में यही उल्टी परिभाषा गड़ी है। क्या ये यही बताना चाहते हैं कि जो सच की राह पर चलते रहे तमाम मुश्किलों के बावजूद वो नासमझ थे। जो प्यार में त्याग किया करते थे वो मूर्ख थे। सच कहा जाये तो सिनेमा भी कब का सही मार्ग से भटक गया है। लेकिन हम बात पत्रकारिता की कर रहे थे , ये तो बीच में मिसाल याद आ गई।

                           अब देखा जाये पत्रकारिता का दावा करने वालों का असली चेहरा। चलो सब से पहले उस बात का ज़िक्र करते हैं जिसका शोर आये दिन किया करते है ये सभी। घोटालों की बात। आपको मालूम है कि आज तक का सब से बड़ा घोटाला क्या है।  ज़रा सोचो क्या हो सकता है। ख़ास बात ये कि वो हमेशा से हो रहा है , हर दिन होता है , हमारे सामने होता है और शायद सदा होता ही रहेगा। क्योंकि उसकी बात कोई नहीं करता , करेगा भी नहीं। भला जिस के दम पर आपका वजूद टिका हो आप उसको समाप्त होने दोगे। ये सब दावा करते हैं सब से तेज़ दौड़ने का लेकिन इन सब को ज़रूरत है उन सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियों की। यही है देश का आज तक का सब से बड़ा घोटाला। सरकार का धन किसी ऐसे कार्य पर खर्च करना जिस से जनता का कोई भला न हो केवल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाया जा सके , उसको भ्रष्टाचार ही कहते हैं।अभी एक नया विज्ञापन दिखाया जा रहा है बेघर लोगों को घर देने का , जिसमें विज्ञापन देख कर ही बस्ती में रहने वाले खुश को निकल पड़ते हैं झूमते गाते। गरीबी हटाओ खाने को अधिकार शिक्षा का अधिकार ईलाज का अधिकार सभी कुछ है सरकार के विज्ञापनों में। क्या ये सच है , पैसे लेकर हर झूठ का प्रचार करवा लो इन सच के झंडाबरदारों से। ये प्रयोजित कार्यकर्म दिखाते हैं अमीर बनने के यंत्र वाले , लोगों को अंधविश्वास के जाल में फसाते हैं चंद पैसों की खातिर। भूत प्रेत की डरावनी कहानियां , सनसनी फैलाने वाले किस्से , क्या बीमार मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे रहे। अब तो इनका काम समाचार देना नहीं रह गया , ये खबर बनाने लगे हैं। बिना मतलब की चर्चा होती है पूरा दिन भर किसी भी विषय पर। नतीजा कुछ नहीं , पानी में मधानी मारना कहा जाता है इसे। कभी माखन नहीं निकलता इस काम से , मगर ये मलाई खा रहे इसी दम पर , दस मिंट की चर्चा में बीस मिंट का ब्रेक विज्ञापनों का। कभी कोई जानता नहीं था जिस राखी सावंत को , इनकी कृपा से बिग बॉस में और भी चर्चित होकर वो शख्सियत बन जाती है।

                                   इनको यही चाहिये कि कुछ चटपटा मसाला मिलता रहे लोगों को बांधे रखने को। क्या यही मकसद होना चाहिये मीडिया का। मनोरंजन का साधन नहीं है पत्रकारिता। ये नहीं जानते कि इन्होंने अपने निजि स्वार्थ के लिये देश और समाज का कितना नुकसान किया है। जिस तरह पिछले कुछ दिनों में एक व्यक्ति टीवी अखबार और सोशल मीडिया का उपयोग करके मुख्यमंत्री के पद तक जा पहुंचा और खुद को हर कायदे कानून और संविधान से परे समझने लगा वो इनकी अपरिपक्वता की निशानी है। अगर आपका मकसद उचित है तो आपका रास्ता भी ईमानदारी का होना चाहिये। अन्यथा झूठे नारों से देश की जनता हमेशा ही छली जाती रही है। जो व्यक्ति सरकारी अधिकारी रहते राजनीतिक उदेश्यों के कार्य करता रहा , वेतन लेकर विदेश शिक्षा पाता रहा और वापस आने के बाद दो वर्ष नौकरी करना ज़रूरी है के नियम को ताक पर रख घर बैठा रहा छुट्टी लेकर , जो कर्ज़ लिया विभाग से उसको लौटने में आनाकानी करता रहा , हर बार कोई बात करने के बाद मुकरता रहा , सब के लिये सभ्यता को ताक पर रख अपशब्दों का प्रयोग करता रहा , अपने साथ वालों का गल्त आचरण देख कर भी चुप रहा और बाकी सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता रहा , क्या वही है आपकी नज़र में नायक। लोकतंत्र में कोई तो मर्यादा हो जिसका पालन अपने विरोधी का विरोध करते भी किया जाना चाहिये। ये पहली बार देखा कोई शीशे के घर में रहने वाला भी पत्थर मारता हो दूसरों को। क्या ऐसा नहीं लगता कि जैसे अन्य दल वाले किसी मुद्दे को सत्ता पाने का बहाना बनाते रहे हैं , ये भी भ्रष्टाचार को अपनी नैया बना चुनाव की गंगा पार करना चाहते हैं। क्या मीडिया वालों को अभी तक इतनी सी बात नहीं समझ आई , क्या ये आम आदमी का नाम लेकर कुछ खास लोगों की महत्वांक्षा पूरी करने की बात नहीं। कितने ख़ास लोग इनके दल में शामिल हो रहे हैं आजकल , क्या ये सांसद और विधायक बनने की चाह में नहीं आये। क्या ये भी आम आदमी को पीछे नहीं छोड़ देंगे।

                              ये सब इसलिये बताना पड़ा है क्योंकि पहले भी पत्रकारिता को दुरूपयोग कर लोग सत्ता की गली में प्रवेश पाते रहे हैं।  आज कोई अखबार जब कई कई बार पूरे पन्ने पर इनका साक्षात्कार छापता है तो पूछना पड़ता है कि क्या ये खबरों का अकाल है या फिर आपकी सोच ठहर गई है। बहुत हैरानी की बात है , इन के पास एक सौ बीस करोड़ लोगों की खबर नहीं है कोई भी दिखाने को न ही छापने को। एक और बेहद ज़रूरी बात है इनकी , ये हर दिन दावे किया करते हैं लोगों की राय जानने के। कुछ सौ या कुछ हज़ार लोगों की राय भला पूरे देश का मानसिकता का पता दे सकती है। क्या ये जनता को गुमराह करने अथवा भ्रमित करने का काम नहीं है। मगर इनके लिये भी कोई सीमा निर्धारित नहीं उचित की अनुचित की। शायद यही चलन बन गया है आज का , सब दूसरों को आईना दिखाते हैं , खुद को कोई आईने में नहीं देखना चाहता। कभी अपने को आईने के सामने खड़े हो कर देखना चाहिये जो सब को सच का आईना दिखाने की बात करते हैं , जब कि वो आइनों का बाज़ार सजा उसका कारोबार करने लगे हैं। हां भाई भतीजावाद यहां भी छूटा नहीं है।  अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम भी खूब होता है इनके घर में जिसको ये अपना विशेषाधिकार मानते हैं। 

 

फ़रवरी 12, 2014

POST : 415 देवी देवताओं का बाज़ार ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       देवी देवताओं का बाज़ार ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     बहुत ही विकट समस्या खड़ी हो गई है। चित्रगुप्त जी ने धर्मराज जी से साफ कह दिया है कि वे अब सेवा निवृत होना चाहते हैं। अब उनसे पाप पुण्य का हिसाब संभाला नहीं जा रहा , धर्मराज कोई अन्य व्यवस्था के लें जितना जल्द हो सके। धर्मराज जी को आज तक वी आर एस जैसी किसी स्कीम की कोई जानकारी नहीं थी , जिसको आधार बना चित्रगुप्त जी ने अपनी अर्ज़ी दी है। धर्मराज चित्रगुप्त को समझा रहे हैं कि अगर आप सब के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब नहीं देखोगे तो उनको बहुत परेशानी होगी। ऐसे में वो न्याय नहीं कर पायेंगे। अब तक आप ये कार्य पूरी निष्ठा पूर्वक करते रहे हैं , ये अचानक आपको क्या सूझी है। चित्रगुप्त बता रहे हैं कि अब उनका काम करना बेहद कठिन हो गया है , क्योंकि सभी देवी देवता उनके कार्य में अनावश्यक रूप से दखलंदाज़ी करने लगे हैं। आये दिन कोई न कोई देवी देवता उनको सूचित किया करते हैं कि उन्होंने किसी के सब पाप और अपराध माफ कर दिये हैं , अपराधी उनके दर पर क्षमा मांगने आये थे चढ़ावा लेकर। ये तो सरासर रिश्वतखोरी है। भ्रष्टाचारी घोटालेबाज़ तक जब पकड़ में आते हैं तब इनकी शरण में पहुंच जाते हैं। इन बड़े लोगों को न कोई अदालत सज़ा दे पाती है न हम ही दे सकते हैं। क्या यहां भी छोटे छोटे चोर सज़ा पायेंगे और बड़े बड़े माफी पाते रहेंगे। धर्मराज भी ये जानकर चिंतित हो गये , सोचने लगे तभी धरती पर अपकर्म बढ़ता ही जा रहा है। ये तो देवी देवता अराजकता फैला रहे हैं दिल्ली की सरकार की तरह। आप अभी सब देवी देवताओं को सूचित कर कि वो ऐसा कोई काम नहीं करें जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। ये बात सपष्ट की जाती है कि किसी भी देवी देवता को अधिकार नहीं है अपने भक्तों के पाप और अपराध क्षमा करने का। किसी की शरण में जाने मात्र से कोई बच नहीं सकता अपने कर्मों का फल भोगने से। कोई धर्म गुरु कोई देवता अगर अपने अनुयायियों को गुमराह करता है ये कह कर कि वो उनके अपकर्मों को क्षमा करवा सकता है तो वो न केवल सृष्टि के नियमों का अनादर करता है बल्कि खुद भी उनके पापों का सहभागी है। भविष्य में ऐसा करने वाले लोगों को अयोग्य घोषित किया जा सकता है।

                   अब चित्रगुप्त कार्य करने को राज़ी हो गये हैं। सब देवी देवताओं को चित्रगुप्त जी का खुला पत्र मिला है एक चेतावनी के रूप में। निर्देश दिया गया है कि अब कोई अगर किसी के पाप और अपराध क्षमा करने का प्रस्ताव उनके पास भेजेगा तो उस पर कड़ी करवाई की जायेगी। ईश्वर तब निर्णय करेगा कि उनका देव पद पर रहना उचित है अथवा अनुचित। पत्र को पढ़ते ही खलबली मच गई है देवी देवताओं में , चिंता होने लगी है कि कहीं ये बात उनके भक्तों तक न पहुंच जाये कि उनके पास वरदान देने या किसी के कर्मों का फल नहीं मिलने देने का अधिकार ही नहीं है। ऐसे में तो उनके धर्मस्थलों के सामने लगने वाली कतारें ही नहीं रह जायेंगी। फिर तो हम केवल नाम को ही देव रह जायेंगे। सभी देवी देवता एक साथ मिल कर ईश्वर के पास गये हैं मांग पत्र लिये कि उनको ऐसा अधिकार होना चाहिये।

                  ईश्वर उन सब को समझा रहे हैं कि आप सभी व्यर्थ की चिंता कर रहे हैं। क्या जो आपके भक्त हैं वो केवल आप पर भरोसा करते हैं , क्या वो कभी इस कभी उस तरफ डांवाडोल नहीं हुए रहते। आज के आपके भक्त तो बाज़ार के ग्राहक कि तरह हैं , किसी भी एक दुकानदार पर इनको भरोसा नहीं है। हर दुकानदार भी मुनाफा ही कमाता है , मगर मुफ्त उपहार और छूट का प्रलोभन देकर ग्राहकों को आकर्षित करता है। आपको भी ये बात समझनी होगी , आखिर ये भक्त आप में से ही किसी न किसी के दर पर ही तो आयेंगे। जैसे दुकानदार उपहार और छूट की बात कहते हैं लेकिन साधते खुद अपना आर्थिक हित ही हैं , उसी तरह आप भी क्षमा और वरदान का झूठा भ्रम बनाये चुपचाप सब देखते रहो। आपकी असलियत कोई भक्त कभी नहीं जान पायेगा। ये बात आपको भी जान लेनी ज़रूरी है कि कर्मों का फल तो आपको भी भोगना होगा , अगर आप पाप और अपराध को बढ़ावा देंगे तो देवी देवता नहीं रह जायेंगे। ईश्वर की बात सब समझ गये हैं , लेकिन ये भी जान गये हैं कि ये अंदर की बात है , किसी को कानोकान खबर न हो।

फ़रवरी 11, 2014

POST : 414 नया मदारी , नया तमाशा ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    नया  मदारी , नया तमाशा ( तरकश )  डा लोक सेतिया

          राजनीती के खेल में इक नया मदारी आया है। उसने आकर बातों से सब को बहलाया है , भरमाया है। कोई नई छड़ी दिखाने को लाया है , राजधानी में जादू चलाकर दिखाया है। हर तरफ धूप में आता नज़र साया है। क्या बतायें हमने क्या खोया है और क्या पाया है। खाली हाथ आया है , कहता है सब ले आया है। अब नई कानून की इक छड़ी बनानी है , बस उसी से सब को सज़ा दिलानी है। उसके पास अलादीन की कोई निशानी है , चालीस चोरों वाली नई कहानी है। खुल जा सिम सिम नहीं होगा इस ज़माने में , काम आयेगी छड़ी कोई लोकपाल लाने में। उस छड़ी से गायब सब बलायें कर देगा , और झोली सबकी मोतियों से भर देगा। बस ज़रा सी मुश्किल पेश आई है , उसने सभा बस उस जगह बुलाई है। इक तरफ कुआं है सामने और पीछे भी खाई है। मान जाओ बात उसकी इस में ही अब भलाई है। भूख नहीं लगेगी , प्यास नहीं लगेगी , उसके मंत्र से पूरी ज़िंदगी चलेगी। खेल है मदारी का नया तमाशा है , बस सभी के मुंह में दे दिया बताशा है। बिजली मिलेगी पानी मिलेगा , अब किसी का कोई भी न मीटर चलेगा। इक छड़ी बनाने दो उसे ये कहता है , कुछ कोई न सोचो क्या क्या बना जो ढहता है। हर किसी टोपी अपनी जब पहनाता है , कल का शैतान भी भगवान कहलाता है। खुद को बताया नया इक अवतार है , जय जो उसकी बोले उसकी नैया पार है। गर ना मानी तुमने सामने मझधार है। नित  कोई बिसात वो शतरंज की बिछाता है , या कोई चौसर के खेल में बुलाता है। चाहे नज़र आता कोई भी पासा है , जीत वही जाता है , ताली बजाता है। अब सभी जगह बस उसी का राज होगा , इक मदारी के सर पर ही सजा ताज होगा। पर सभी को इस बात की खबर है , पल भर को रहता हर जादू का असर है। जब भी उसका खेल देख कर बाहर सब आते हैं , फिर वही पुरानी दुनिया सामने पाते हैं। खेल हर खिलाड़ी का इक सुहाना सपना है , सब उसी के पास रहता कुछ भी न हुआ अपना है। सोचते थे लोग सब थाली मिलेगी , कौन जानता था जेब खाली मिलेगी।

फ़रवरी 09, 2014

POST : 413 सपने देख कर खुश हो जाओ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    सपने देख कर खुश हो जाओ ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सर्वेक्षण करना कोई कठिन कार्य नहीं है। आप किसी भी विषय पर कर सकते हैं सर्वेक्षण। कोई बंधन नहीं है। कोई सवाल नहीं कर सकता कि कुछ सौ या कुछ हज़ार लोगों की राय देश की जनता की राय कैसे हो सकती है। ये कारोबार बहुत लोग सालों साल से सफलता पूर्वक कर रहे हैं। उन को पैसा शौहरत ही नहीं मिली बल्कि अब तो वो भी नेता कहलाने लगे हैं। कल तक जो बाकी लोगों को कहा करते थे कि नेता किसी बात पर कभी कुछ कभी कुछ बोलते हुए शर्मसार नहीं होते आज खुद वही करते हैं निसंकोच। इक नया शोध सामने आया है कि जागते हुए अच्छे अच्छे सपने देखना लाभकर होता है। अगर आपको भूख लगी है और घर में खाने को कुछ भी नहीं है तो आप रूखी सूखी रोटी खाने के नहीं हलवा पूरी के सपने देखो। जब सपनों से ही पेट भरना है तो जो मन को पसंद हो वही खाने का सपना देखें। रस मलाई खाओ रस गुल्ले खाओ। कोई बिल नहीं मांग सकता। बेरोज़गारी में किसी बड़े ओहदे के अफ्सर होने की कल्पना कीजिये , हो सके तो ये ख़्वाब देखो कि आप कंपनी के मालिक बन औरों को नौकरी दे रहे हैं। बेशक आपके पास साईकिल खरीदने को भी पैसे नहीं हों , आप मर्सिडीज़ कार खरीदने से कम के सपने क्यों देखें। देश के एक पूर्व राष्ट्रपति भी बड़े बड़े सपने देखने की बात कहते थे , उनका सपना था सन दो हज़ार बीस में भारत को महान शक्ति बनने का , छह साल बाद देखते हैं उसका क्या हुआ। अभी तो सब वो बात भूल चुके हैं। सपने बेचना ख़ास कर झूठे सपने बेचना राजनीति का काम रहा है। कुछ नये लोग नये सपने दिखला कर थोड़े ही दिन में सत्ता पर आसीन हो गये हैं।

           अगर आप भी देश की बदहाली देख देख कर परेशान रहते हैं तो आप भी कुछ ऐसे सुनहरे सपने देखा करें जैसे मैं देखता रहता हूं। मैं हर दिन कल्पना करता हूं कि सब कुछ बदल गया है , कहीं भी किसी बुराई का नाम तक बाकी नहीं रह गया है। सब देशवासी अपने बारे नहीं देश व समाज के बारे पहले सोचते हैं। सभी नेता पूरी तरह ईमानदारी से देश और जनता की सेवा करने लगे हैं , वे सादगी पूर्वक रहते हैं , जनता का एक पैसा भी व्यर्थ बर्बाद करना उनको घोर अपराध लगता है। प्रशासन खुद को शासक नहीं जनता का सेवक मानने लगा है और किसी भी काम में कोई बाधा नहीं है। अपना कर्त्तव्य निभाना ही हर अधिकारी को कर्मचारी को सच्चा धर्म लगता है। परिवारवाद और पूंजीवाद का अंत हो चुका है , अब वास्तव में लोकतंत्र स्थापित हो चुका है। देश में कोई भी गरीब नहीं है न ही किसी की तिजोरी में अरबों रुपये सड़ रहे हैं। राजनीति में अपराधियों को पवेश नहीं मिलता है , सांसद और विधायक जनता और देश पर बोझ नहीं हैं। अब उनके वेतन पर सुविधाओं पर सैर सपाटों पर धन बर्बाद नहीं किया जाता है। उन्होंने अपना सर्वस्व देश को अर्पित कर दिया है ताकि जनता की समस्याओं का अंत हो सके। अब कोई सफेद हाथी नहीं कहलाता है। किसी भी नेता के पास उसके परिवार के किसी भी सदस्य के नाम पर कोई फार्म हाउस या पैट्रोल पंप नहीं है। न ही कोई किसी सरकारी भूमि पर कब्ज़ा ही किये हुए है।
                       धर्म के नाम पर कोई कारोबार नहीं होता है अब। कोई भी आपसी भेदभाव की या नफरत फैलाने की बात नहीं करता है। किसी के पास भी धर्म के नाम पर अरबों की संपति जमा नहीं है , सब ने सारा का सारा धन दीन दुखियों की सहायता करने पर खर्च कर दिया है। साधू सन्यासी कोई कारोबार नहीं करते हैं। हर धर्म के अनुयाई सदाचार का पालन करते हैं , धार्मिक होने का झूठा आडंबर नहीं करता कोई भी। संत बन कर कोई अधर्म और पाप नहीं करता है। धर्म के नाम पर अंधविश्वास को कोई बढ़ावा नहीं  दे रहा है। उनके पास कोई कोठी कार बंगला नहीं है केवल एक गठड़ी है जिसमें दो जोड़ी वस्त्र हैं जिसको लिये कहीं भी गुज़र कर लेते हैं , कल की चिंता नहीं करते सब कुछ त्यागने वाले। पुलिस सभ्य बन चुकी है और चरित्रवान भी , रिश्वत का नाम तक नहीं लेता कोई पुलिस वाला। जनता को पुलिस से भय नहीं लगता है , लूट मार , चोरी बलात्कार ,का कोई अपराधी बच नहीं पाता है। कोई महिलाओं को बुरी नज़र से नहीं देख सकता , औरत पर अन्याय करने वाले को समाज स्वीकार नहीं करता है। लोग भी सचाई की राह पर चलते हैं और निडर हो कर रहते हैं। कोई भी किसी को धोखा नहीं देता , कोई हेराफेरी ठगी नहीं करता किसी से। भाई भाई का दुश्मन नहीं है। मीडिया वाले भी सही राह पर आ गये हैं , झूठ को सच साबित नहीं करते , न ही खुद को सब से बड़ा ही समझते हैं। सब तरफ अमन है चैन है सुख है शांति है। फूल ही फूल हैं सब तरफ बहार का मौसम है।

                       शोध करने वालों का निष्कर्ष है कि सुनहरे सपने देखना लंबी आयु प्रदान करता है , तंदरुस्त रखता है। मुंगेरी लाल बनना बुरा नहीं है। हसीन सपने देखने में कोई बुराई नहीं है। एक बार इन सर्वेक्षण वालों की बात पर अमल कर के अवश्य देखना। खराब से खराब हालात में भी आप खुश रह सकते हैं। अब शायद यही किया जा सकता है , कितनी बार दूसरों के दिखलाये सपने देख कर छले गये। अब खुद अपने सपने से अपने को छलना सीख लें।

फ़रवरी 05, 2014

POST : 412 खेलने में भी समझदारी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    खेलने में भी समझदारी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

कभी खेल खेल में बात बन जाती है और कभी बिना बात खेल बिगड़ भी जाता है। हुस्न वाले तो दिलों से भी खेला करते हैं , उनका ये शौक बहुत ही अजीब है। राजनीति तो है ही खेल सत्ता का लेकिन कई बार खेलों में भी राजनीति होने लगती है। कभी खिलाड़ी राजनेता बन जाते है , कभी राजनेता खेल खिलाने लगते हैं। बात अगर धनवानों की करें तो उनके लिये हर बात पैसे का खेल है। शादी से लेकर रिश्ते नाते दोस्ती तक सब में कारोबार होता है। अध्यापकों के लिये शिक्षा भी किसी कारोबार से कम नहीं है , जो खूब फल फूल रहा है। मगर खेलों जैसा कारोबार दूसरा कोई नहीं है। खेलने वाले खिलाड़ी तक इक खिलौना हैं , असली खेल तो टीवी चैनल वालों , और अपना सामान बेचने वालों का है जो विज्ञापन देकर अपना धंधा करते हैं। उन्हें जीत या हार से नहीं , रोमांच से मतलब होता है ताकि दर्शक देखते रहें। ये खेलते हैं खिलाते हैं और हर हाल में जीतते हैं मुनाफा कमा कर। इनके लिये क्रिकेट हाकी फुटबाल टैनिस सब बराबर हैं , किसी में कम किसी में अधिक कमाई है।

                बात अब समझ आई है , वर्ना लोग हैरान होते थे कि क्रिकेट के खेल में एक खिलाड़ी के आऊट होते ही बाकी सब भी पीछे पीछे लाईन लगा चल देते हैं। देखने वाले निराश होकर पानी की खाली बोतलें मैदान में फैंकने लगते और कमेंटेटर उनके आचरण पर अफसोस जताते। ऐसे समय उन खिलाडियों को कोई अफसोस है ये नज़र नहीं आता था। तब हम से अनाड़ी भी कहते कि इस से बेहतर तो हमी खेल सकते थे , भला शून्य से कम में हमें कोई कैसे आऊट कर सकता था। हम भी उनकी तरह शान से अपना सर उठा कर चलते , हम भी अपनी पत्नी के साथ विदेश की सैर करते शॉपिंग करते। हमें श्रीमती के ताने नहीं सुनने पड़ते कि कभी विदेश भ्रमण पर नहीं ले जा सकते। अब जाकर पता चला है कि खिलाड़ी दोषी नहीं थे अच्छा नहीं खेलने के लिये , सारा का सारा दोष उन सट्टेबाज़ों का था जिन्होंने पहले ही तय कर दिया था कि किस किस को किस किस गेंद पर कैसे आऊट होना है। माया महाठगिनी सब जानी , माया का खेल है , खेल की माया है। बहुत साल बाद मालूम हुआ कि कभी दक्षिण अफ्रीका से श्रंखला हमने ऐसे ही जीती थी। ये तरीका अगर समझ लेते तो हम कभी कोई मैच नहीं हारते। कहा जाता है इस दुनिया में सब बिकता है अगर सही खरीदार मिल जाये। आदमी का ईमान तक बिकाऊ है तो टीम क्यों नहीं हो सकती। दक्षिण अफ्रीका की टीम अगर चार करोड़ थी तो दूसरों की कुछ कम या अधिक होगी। बड़ी मज़ेदार बातें होती होंगी खिलाड़ियों के बीच। कोई कहता होगा यार हारने के बाद वहां चलोगे , दूसरा जवाब देता होगा शाम चार बजे तक मैच निपटा दें तब मज़ा आयेगा। कभी एक पूर्व खिलाड़ी पर चुटकुला बना हुआ था , पत्नी को फोन पर कहते थे कि अब ज़रा बैटिंग करने जा रहा हूं , तुम चाय बना लो तब तक घर आता हूं। मुमकिन है कोई बैटिंग को जाने से पहले आधी बची शीतल पेय की बोतल साथी को देते हुए बोले के पकड़े रखना अभी वापस आकर पीता हूं। सच पूछो तो मज़बूरी है इनके लिये खेलना , नहीं खेलें तो नाम नहीं मिलता विज्ञापन नहीं मिलते , न फिल्मों का आफर मिलता है न टीवी पर साक्षात्कार। जब ये सब मिलता है तब खेलना एक गले पड़ा ढोल होता है जिसको बजाना ही पड़ता है। हर कोई वही रोज़ रोज़ करते उकता जाता है , नेता समाज सेवा से , अफसर फाइलों से , वकील मुव्वकिल से , डॉक्टर मरीज़ से। लेकिन पैसे का मोह विवश करता है काम करने को। खिलाड़ी लोग समझते हैं सेंचरी बनाने के रनों के ही रेकॉर्ड बनाते हैं , मगर वो सोचते हैं इस साल एक होटल एक बंगला एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बना लिया है। एक शीतल पेय कंपनी का विज्ञापन है जिसमें एक खिलाड़ी दूसरे खिलाड़ी का मुखौटा पहन खेलने चला जाता है। ये सच में भी हो सकता है कभी जब मामला फिक्स हो। जीत हार तो खेल का हिस्सा हैं। अच्छा खेलने के लिये जितने मिलते हैं उससे अधिक पैसे खराब खेलने के लिये मिलते हों तो अच्छा खेलना बेवकूफी होगी। खराब खेलना भी समझदारी हो सकती है। केवल डिटरजेंट खरीदना ही समझदारी का काम नहीं है। 

फ़रवरी 04, 2014

POST : 411 गिरती हुई दीवार है , ठोकर मत लगाना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

 गिरती हुई दीवार है , ठोकर मत लगाना ( तरकश ) डा लोक सेतिया

        सुना था समझदार लोग बहुत ही खतरनाक होते हैं। अपनी साहूलियत के लिए सच को झूठ साबित कर सकते हैं और झूठ को सच भी। इतिहास भरा पड़ा है , जिन पढ़े लिखे लोगों ने ग्रंथ लिखे , उन्होंने खुद को सुरक्षित रखने को हर बात के दोहरे मापदंड भी निसंकोच घोषित कर डाले। साथ में ये भी लिख डाला कि इस सब पर सवाल उठाना पाप है नास्तिकता है। हम धर्म भीरू लोग सोचना तक नहीं चाहते कि क्या जो जो हमें पढ़ाया और समझाया जाता है जा रहा है वो सही भी है या नहीं। आज का बुद्धिजीवी समाज भी वही सब दोहरा रहा है। ये सब शायद मुझे ध्यान नहीं आता अगर मैं आज की एक नई नई चली राजनीति की बातों को गौर से नहीं देखता। अभी तक देखते रहे हैं कि जो नेता चुनाव में सत्ता धारी लोगों की कमियां बता कर सत्ता पाते थे उनको लगता था कि अब हमें वो सब नहीं दोहराना है बल्कि अपना ध्यान जनता की समस्याएं दूर करने और अपनी नीतियां लागू करने पर देना चाहिये। जो लोग बदले की भावना से राजनीति करते रहे हैं वो कभी सफल नहीं हुए। दिल्ली में जब से आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है तब से उनका पूरा ध्यान ही नकारात्मक कार्यों पर ही रहता है। नई बात इस सरकार के दो ऐसे नये कदम हैं जिनको उसके नेता बड़े ही गर्व से महान घोषित कर रहे हैं। पहला काम पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का अवैध कालोनियों को अस्थाई प्रमाणपत्र देना। यहां एक बात को जान लेना ज़रूरी है कि चुनाव में प्रलोभन देना भले अनुचित हो फिर भी सरकार को काम बंद करने को नहीं कहा जा सकता है। महीनों तक सरकार और प्रशासन हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकती। हां अगर कोई सत्ता का दुरूपयोग करके चुनाव जीतता है तो आप अदालत जा सकते हैं। शायद यहां ये याद करना भी ज़रूरी है कि देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक इसके लिए कटघरे में खड़ी हो चुकी है किसी समय। आम आदमी पार्टी के नेताओं से पूछा जाना चाहिये कि जिन अवैध कालोनियों को अस्थाई प्रमाणपत्र दिये गये क्या उनका अस्तित्व नहीं था , अगर वे वहां थी और ये प्रमाणपत्र उनको इसलिये दिया गया ताकि कल उनके होने पर ही कोई सवाल नहीं खड़ा करे। कोई उस जगह को अधिकृत नहीं कर सके , गरीबों का घर छीना न जा सके। अब चाहे तब सरकार ने ऐसा लोगों को खुश कर वोट पाने को ही किया हो तब भी ये जन विरोधी काम तो कदापि नहीं था। और क्या आप उन अवैध कालोनियों का अस्तित्व नकार सकते हैं। सच तो ये है कि ये खुद जानते हैं कि जो वो करने जा रहे हैं वो फज़ूल की अदालती जंग है जिसका हासिल कुछ भी नहीं होना। बस ये कर आम आदमी पार्टी दिखाना चाहती है कि वो पिछली सरकार के गलत कामों का हिसाब कर रही है , जबकि जहां खुद उसने भ्रष्टाचार की जाँच करनी है उससे बच रही है। क्योंकि जिसकी बैसाखी थाम कर आप चल रहे हो उसको ठोकर लगायेंगे तो उससे पहले खुद गिर जायेंगे। और वास्तव में यही तो कर रहे है ये तथाकथित आम आदमी पार्टी के लोग , नैतिक तौर पर ये रसातल में जाते जा रहे हैं। दूसरी बात जो वो कर रहे हैं वो है दिल्ली में लोकपाल कानून विधानसभा में लाने की। आम आदमी पार्टी न किसी नियम को मानती है न प्रक्रिया का ही पालन करती है , बार बार मनमानी कर कोई सत्ता धारी सरकार खुद अराजकता को बड़ा रही है। लेकिन इतना तो उनको भी मालूम है कि संविधानिक प्रक्रिया का पालन किये बिना अगर वे कोई विधेयक पारित भी करते हैं और कोई उसको अदालत में चुनौती नहीं भी देता और वो लागू भी हो जाता है तब भी अगर किसी पर भी ऐसा लोकपाल करवाई करेगा तब पहला सवाल उसके खुद के औचित्य पर खड़ा होगा। अवैध कालोनियों की तरह का एक प्रमाणपत्र आपके लोकपाल को हासिल हो सकता है। सच तो ये है कि ये सचाई भी जानते हैं आम आदमी पार्टी वाले , मगर ये सोचते हैं कि इस सब की नौबत आने से पहले उनको लोकसभा चुनाव में इन कदमों का लाभ मिल चुका होगा। दूसरे शब्दों में जिस बात का दोषी पूर्व मुख्यमंत्री को मानते है वही बात खुद भी कर रहे हैं। इन आम आदमी के पैरोकारों से कोई तो पूछेगा कि आपको अब खास लोग क्यों प्रिय लगने लगे हैं , जाने माने लोग , कल तक के सरकारी अधिकारी क्या यही आम आदमी की पहचान बनेंगे कल। कोई अपने वजूद को ऐसे ही मिटाता हो तो किसी अन्य को ज़रूरत ही क्यों होगी कुछ भी करने की। गिरती हुई दीवार की तरह है , इसको कोई ठोकर न लगाना।

फ़रवरी 02, 2014

POST : 410 सबक ईमानदारी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       सबक ईमानदारी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

सबक पढ़ाने का अपना ही मज़ा है , पढ़ाने को खुद अमल करके नहीं दिखाना होता। स्कूलों में तो ऐसा भी होता है कि अध्यापक वो विषय भी पढ़ा रहे होते हैं जिसके बारे वे कुछ भी नहीं जानते। अध्यापकों को इसमें कोई परेशानी नहीं होती , कम ही होता है कि कोई छात्र समझ सके कि जो पढ़ाया जा रहा है वो सही है अथवा गलत। आजकल राजनीति में भी धर्म की तरह उपदेशक नज़र आने लगे हैं , सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं। कोई नहीं पूछता आपने कब पढ़ा है , आप खुद हर बात पर मुकर जाते हैं। उनका झूठ झूठ नहीं होता उनके पास तर्क होते हैं , कोई नहीं मानता अगर तो कुतर्क भी देने में रत्ती भर संकोच नहीं किया जाता। उनके अनुसार उन्हें छोड़ सब के सब भ्रष्ट हैं , उन्हें कोई कारण नहीं बताना होता , जब कह दिया तो मानना ही पड़ेगा आपको। अपने सर पर ईमानदारी का ताज और सीने पर तमगा लगाये घूमते हैं रात दिन। शायद आपको यकीन नहीं आये कि मैंने सरकारी असप्ताल में डेंटिस्ट को इमरजेंसी में ड्यूटी करते देखा है , कारण ये नहीं कि डॉक्टर नहीं होता , बल्कि इसलिये कि उसने खुद कमाई करने को सिफारिश से ये करवाया था।

           सरकार का हर मंत्री भाषण देता है जनता को कायदे कानून का पालन करने के , लेकिन खुद पर कभी कोई नियम लागू नहीं करते। सरकार जो भी करती है उसी में जनता की भलाई है , ये सबक जनता क्यों भूल जाती है। सरकार टैक्स लगाये , दाम बढ़ाये तो समझना चाहिये कि ऐसा करना ज़रूरी होता है। चुपचाप मान जाना चाहिये , विरोध नहीं करना चाहिये। मान लेना चाहिये कि जब हमने ही चुना है तो अपनी गल्ती की सज़ा भी कबूल करनी ही होगी। सरकार आपको किफायत करने का पाठ पढ़ाने के साथ साथ खुद जनता का धन बर्बाद कर सकती है। जनता को रोटी पानी नहीं मिले पैसे की कमी के कारण तो कोई बात नहीं , सरकार की हर दिन की मीटिंग में सजावट पर , जलपान पर पैसा पानी की तरह बहाया जाना अनुचित नहीं होता। जनता को बताया जाता है रोज़ इतने रुपये कमाते हो तो गरीब नहीं हो , खुद उतने में रहने की बात भला सरकार कैसे सोच सकती है। जनता जनता है सरकार सरकार है। सरकार बनते ही हर दल को चंदा जमा करना ज़रूरी लगता है आने वाले कई सालों तक का चुनाव खर्च का प्रबंध करने के लिये। और ऐसा होते देर नहीं लगती , पर जब जनता की सुविधाओं के खर्च का सवाल आता है तब वे नहीं जानते कि धन आये तो कहां से आये।

                     सरकार चाहती है कि पुलिस और प्रशासन उसकी मर्ज़ी से काम करे न कि उचित अनुचित को देख कर निर्णय ले। जो किसी सत्ताधारी नेता की राह में अड़चन डाले उसको पद से हटाना सरकार का अधिकार है चाहे नियम ऐसा करने की इजाज़त देता हो चाहे न देता हो। जनता ने इनको जनसेवा के लिये थोड़ा वोट डाला था , इनसे संविधान और न्यायपालिका का सम्मान करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिये। ये सब तो बने ही नेताओं द्वारा खिलवाड़ करने के लिये हैं। पहले एक दल के नेता कर रहे थे अब दूसरे दल के , बस यही बदलाव बहुत है। हम लोग अब तक किसी पुराने युग में जी रहे हैं जो सत्ता के दुरूपयोग को कुर्सी के मोह को , शासन के अंधे अहंकार को एक रोग मानते हैं। नेता लोग ईमानदारी को सब से बड़ा रोग समझते हैं , वे खुद को इससे जितना भी मुमकिन हो दूर ही रखते हैं। जनता को ईमानदारी की राह पर चलने का पाठ पढ़ाया जाता है ताकि खुद सरकार जो चाहे कर सके। अर्थशास्त्र का सूत्र है एक देगा तभी दूसरे को मिलेगा , ये तभी तक सब कुछ कर सकते जब तक लोग इनके बराबर नहीं बन सकते। जनता को जनता का धन भी खैरात की तरह देने का नाम है लोकतंत्र में सरकार चलाना। लोगों का , इनको छोड़ बाकी सब का ईमानदार बनना आवश्यक है , इनके शासन करने के लिये। जैसे साधू लोग अपने अनुयायिओं को त्याग का उपदेश देते हैं , लेकिन चाहते हैं उनका चढ़ावा बढ़ता ही रहे। ये दोनों बातें एक दूसरे की पूरक हैं , इसको विरोधाभास नहीं समझना चाहिये। बस इतनी सी बात है।

POST : 409 नौ सौ चूहे खाकर बिळी हज को चली ( तरकश ) डा लोक सेतिया

  नौ सौ चूहे खाकर बिळी हज को चली ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       आज अपने प्रिय अख़बार में एक साक्षात्कार पढ़ा किसी दल के नेता का। सोचा इनकी बात पढ़कर जाने कितने लोग इनके समर्थक बन जाएंगे बिना जाने कि इनकी कथनी और करनी में कितना भेद है। चलो बात शुरू करता हूं अन्ना जी के अंदोलन से। मोबाईल पर संदेश मिला पत्रकार मित्र का शामिल होने के लिये लाल बत्ती चौक पर आने का। भ्रष्टाचार का विरोध करते उम्र बीती है तो चला गया था। वहां जो देखा हैरान करने वाला था। कोई बेहद असभ्य भाषा का उपयोग कर रहा था किसी महिला नेता के बारे में उसकी निजि ज़िंदगी को लेकर। मुझे लगा यहां बैठना उचित नहीं। उठ कर जाने लगा तो एक व्यक्ति ने रुकने और कुछ बोलने को कहा , मैंने निवेदन किया कि शायद जो मुझे लगा और कहना चाहता हूं वो आपको पसंद नहीं आये। वो जानते थे मैं निडर हो अपनी बात कहता हूं। जब उन्होंने कहा कि आप ज़रूर बोलें , शहर के जाने माने साहित्यकार हैं , तब बोलना ही पड़ा और मैंने पूछा वहाँ बैठे लोगों से कि अभी जो सज्जन बोल रहे थे क्या वो उचित था। तब सब बोले कि नहीं वो गलत था , मैंने पूछा तब आपने एतराज़ क्यों नहीं किया। खैर मैं अपनी बात कह कर चला आया था , दुःख हुआ कि गांधी जी की तस्वीर लगा कर क्या क्या हो रहा है। जो बात वहां नहीं कह सका तब वो और भी ज़रूरी है , जो लोग मंच पर विराजमान थे वे वही थे जो खुद रिश्वतखोर थे और अधिकारियों के दलाल थे। समझ गया कि जैसे जे पी के अंदोलन में शामिल लोग बाद में सत्ता पाकर अपना घर भरते रहे और समाजवाद की नई परिभाषा घड़ते रहे अपने परिवार को भी राज परिवार बनाने का काम करते रहे , शायद वही फिर दोहराया जा सकता है। वास्तव में कुछ लोग नाम शोहरत और राजनीति में प्रवेश के लिये अवसर तलाशते रहते हैं , उनको किसी मकसद से किसी विचारधारा से कोई सरोकार नहीं होता है। देश भर में अन्ना की लहर थी जिसे मैं भी देख रहा था , पर सोचता था काश इस बार कुछ अच्छा हो। उसके बाद की बात सभी जानते हैं , वो सब पीछे रह गया है और इक नया दल सत्ता में आया एक राज्य में और अब उसको पूरे देश में दोहराना चाहता है। क्या सत्ता पाना मात्र ही सब का मकसद होना चाहिए या सत्ता पाकर उसको बदलना चाहिए जिस से तंग आकर जनता ने आपको चुना है। एक दौड़ शुरू हो गई सदस्य बनाने की , क्या जानते हैं जो आपके सदस्य बन रहे उनका ध्येय क्या है , अभी तक कहां थे क्या कर रहे थे। आपके दल के महत्वपूर्ण सदस्य ऐसे हैं जो सरकारी नौकरी करते थे , वेतन लेते थे लेकिन कभी काम नहीं करते थे , अपना कोई कारोबार चलाते थे। आज ये सब ईमानदार हो गये , दूध के धुले और आप सूचि जारी करते हैं बाकी दलों में भ्रष्ट लोगों की। विडंबना यही है कि सब को दूसरों के चेहरे के दाग़ नज़र आते हैं , अपने आप को कोई नहीं देखता आईने में। एक बात और बताना चाहता हूं , मेरे घर के पास एक दुकानदार कुछ दिन पहले इनकी टोपी पहन कर बैठता था , औरों को सदस्य बनाने का काम करता था। जब देखा उसको बिना टोपी के और पूछा तो उसने बताया कि इनकी वास्विकता समझ चुका है और अब किसी दल से कोई मतलब नहीं है उसका। मालूम नहीं इनकी जो संख्या है दस रुपये में सदस्य बने लोगों की उनमें कितने अपना मन बदल चुके हैं और कितने इनके आचरण को देख बदल सकते हैं। आप कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकते हैं , सब को हमेशा के लिये नहीं , ये सब जानते हैं। और ये जो पब्लिक है वो सब जानती है , भीतर क्या है बाहर क्या है ये सब को पहचानती है।

जनवरी 31, 2014

POST : 408 नाखुदा खुद को बताने वाले ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      नाखुदा खुद को बताने वाले  ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       एक जाने माने शायर का शेर याद आ रहा है। कौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ , रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ। नेता चाहे किसी भी दल का हो होता नेता ही है , सब का मकसद वही है हर मुद्दे को उपयोग करना अपने सत्ता पाने के लिये। हर बात में वोटों का गणित ही इनकी प्राथमिकता होता है , किसी की भावना से इनमें से किसी को भी कोई सरोकार नहीं होता है। किसी ने एक बयान क्या दिया बाक़ी लोगों को भी अवसर मिल गया अपनी अपनी राजनीति करने का। सब फिर से चले आये दंगों के ज़ख्मों को फिर से कुरेदने , ये क्या दवा लगायेंगे , इनको मालूम ही नहीं किसी का दर्द क्या होता है। इनकी संवेदना झूठी है , दिखावे की है , चार दिन की है। बस वोट पाने तक , उसके बाद सब भूल जायेंगे। कितनी बार कितने लोगों ने यही किया है इंसाफ दिलाने का वादा , मगर कभी नहीं मिला इंसाफ किसी को। किस किस की बात की जाये , क्यों सब के ज़ख्मों को फिर से हरा करने का काम करें। और शिकायत भी जाकर करें तो किस से , पता नहीं इनमें ही कौन कौन कब कब ऐसा ही करता रहा है। मुझे अपनी ही इक ग़ज़ल का एक शेर याद आता है। "तूं कहीं मेरा ही क़ातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले"। ग़ज़ल का मतला भी ऐसा ही है। 
 
                  "हमको ले डूबे ज़माने वाले , नाखुदा खुद को बताने वाले"। 

                                            जब बात हो रही थी दिल्ली और गुजरात और उत्तरप्रदेश महाराष्ट्र के दंगों की , तब याद आया हर शहर में चली थी तब वही गर्म हवा। हमारे शहर में भी थे कुछ सभ्य कहलाये जाने वाले लोग जो बहती गंगा में हाथ धो रहे थे। तब उस दल में शामिल थे जो दंगे करवा रहा था और आज इस दल में शामिल हैं जो तब के अपराधियों को सज़ा दिलाने की बात कर रहा है। यहां फिर किसी शायर का शेर याद आ रहा है। "मेरा कातिल ही मेरा मुनसिब है , क्या मेरे हक में फैसला देगा"। ये जो लोग आज आंसू बहा रहे हैं क्या कल तक नहीं जानते थे कि जिनके साथ उनका हर दिन का मेल जोल है , मधुर संबंध हैं वो वही हैं जो दंगइयों की भीड़ को लेकर चले थे किसी को सबक सिखाने। दो दिन बाद जब यही भरी सभा में भाईचारे की बात करेंगे तब मुझे फिर अपना इक शेर याद आयेगा। "भाईचारे का मिला ईनाम उनको , बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे। बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे , जो दयानतदार थे वो डर रहे थे"।

                  यादों की खिड़की फिर खुल गई है। कुछ साल पहले की बात है इश्तिहार पढ़ा कि कुछ लोग जय प्रकाश नारायण जी की संपूर्ण क्रांति पर चर्चा करेंगे। सब को बुलाया गया था , मैं भी कभी रहा था शामिल उस अंदोलन में इसलिये वहां जाना ज़रूरी लगा था। मगर वहां जो देखा उसकी कल्पना नहीं की थी , जश्न का सा माहौल था , अच्छा खाने पीने का प्रबंध , सब हाथ मिला रहे थे , गप शप कर रहे थे। सभा शुरू हुई , दो लोग मंच पर बैठे थे , एक महिला गीत सुना रही थी पुरानी फिल्मों के मनोरंजन के लिये। फिर बात होने लगी थी कई प्रकार की समितियां बनाने की , चंदा जमा करने की। जिस बात का शोर था इश्तिहार में उस विषय पर किसी ने एक भी शब्द नहीं बोला था। मुझसे नहीं रहा गया , मैं खड़ा हुआ इक पर्ची पर लिखा मुझे सवाल करना है और जाकर पकड़ा आया उनको जो मंच पर विराजमान थे। वो तब मुझे नहीं जानते थे और उन्होंने वो पर्ची दे दी उनको जो संचालन कर रहे थे सभा का। मुझे कहा गया सभा के बाद रुक कर मिल सकता हूं अगर उन नेता जी से मिलना चाहता हूं। मैंने तब अपनी जगह खड़े होकर यही पूछा था कि आपने जिस विषय पर चर्चा का इश्तिहार बांटा था , उस पर तो कोई बात ही नहीं हुई। तब इस आयोजन का क्या मतलब रह जाता है। ये सुन कर वो मुख्य अतिथि भी हैरान हो कर बोले कि उनको भी इस बात का पता नहीं था , वो तो यहां आये हैं अपने दल की शाखायें बनाने , सदस्य बनाने और समितियों का गठन करने।

                        बार बार यही होता है , लोग किसी विषय को उपयोग कर अपना राजनीतिक मकसद हल करते हैं और मतलब पूरा होने के उसपर फिर कोई बात ही नहीं करते। अपने साथ भीड़ जमा करने के लिये , वोट बटोरने के लिये , नेता बन जनता की भावनाओं को उपयोग किया जाता है।

जनवरी 26, 2014

POST : 407 दर्शन दो लोकतंत्र ( तरकश ) डा लोक सेतिया

         दर्शन दो लोकतंत्र ( तरकश ) डा लोक सेतिया

            यही मंत्र है जिसका जाप सभी करते हैं। कोंग्रेस भा ज पा वामपंथी समाजवादी जनता दल वाले सालों से करते आये हैं और आप वाले भी जपने लगे हैं। किस किस की गिनती की जाये , राष्ट्रीय क्षेत्रीय बहुत हैं। हर राजनैतिक दल के अखिल भारतीय प्रधान से आम कार्यकर्त्ता तक सुबह शाम सोते जागते यही मंत्र जपते हैं। ज्ञानीजन समझाते हैं कि लोकतंत्र मंत्र जपने से राजसुख की प्राप्ति होती है। जिसे ये मंत्र सिद्ध करना आ गया वो विधायक सांसद मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री कुछ भी बन सकता है। जैसे क्रिकेट के खिलाड़ी क्रिकेट को खाते हैं पीते हैं ओढ़ते हैं , ऐसे दावे किया करते हैं विज्ञापनों में , कुछ उसी तरह नेता लोग भी सच में करते हैं। लोकतंत्र को खाते हैं , लोकतंत्र को पी जाते हैं , लोकतंत्र को सेज बना कर उस पर सो जाते हैं लोकतंत्र को ओढ़कर। कभी कभी लगता है कि सारा का सारा लोकतंत्र इन नेताओं के हिस्से में आ गया जिसको जाने ये खा गये या पी गये या उसको किसी जगह सुला दिया है गहरी नींद में। देश की जनता भटक रही है सच्चे लोकतंत्र की खोज में आज़ादी के बाद से आजतक। दिखाई ही नहीं दे रहा लोकतंत्र। कांग्रेस में भा ज पा में क्षेत्रीय दलों में वामपंथी दलों में नहीं मिला तो इक नये दल में ढूंढना चाहा मगर उसमें भी नहीं नज़र आया। बार बार कोई वादा करता है लोकतंत्र का मगर सत्ता मिलते ही मनमानी करने लगता है। हर नेता खुद को लोकतंत्र का रखवाला बताता है और हर नेता लोकतंत्र से खिलवाड़ करता है शासक बनते ही। अब तो लगता है लोकतंत्र भी हमारे लिये मृगतृष्णा के समान है। अपने दल में लोकतंत्र न होने की बात पर कुछ लोग दल को छोड़ कर अपना खुद का एक दल बना लेते हैं। ऐसा भी मुमकिन है कि अपने दल के वही अकेले सदस्य ही हों। ये एक सुविधाजनक दशा है असहमति की कोई गुंजाईश ही नहीं रहती। यकीन मानें ऐसे लोग मंत्री तक बनते रहे हैं। इस देश में कोई चालीस सदस्यों का दल सरकार बना सकता है और एक सौ चालीस सदस्यों वाला उसको बाहर से समर्थन दे सकता है। वैसे भी शासन करने के लिये सरकार में शामिल होना ज़रूरी नहीं होता है। ये प्रयोग भी सफलता पूर्वक किया जा चुका है कि प्रधानमंत्री कोई था और सरकार कोई और ही चलाता रहा। हर दल वाले को अपने दल में लोकतंत्र की चिंता नहीं होती लेकिन बाकी दलों में लोकतंत्र नहीं है ये चिंता सताती है। कांग्रेस को लगता है भाजपा हिंदुत्व की समर्थक ताकतों के ईशारे पर चलती है , भाजपा को लगता है कांग्रेस परिवारवाद की राह पर चलती है। बाकी दल भी दूसरे सब दलों पर आरोप लगाते हैं कि वो लोकतंत्रिक नहीं। किसी का लोकतंत्र बिहार चला जाता है किसी का उत्तरप्रदेश , हरियाणा वालों को शिकायत है दिल्ली ने उनके लोकतंत्र को हमेशा बंधक बना कर रखा है। दिल्ली कहती है कि वो इधर कभी आया ही नहीं , शायद छुट्टी मनाने हिमाचल चला गया होगा। लोग कश्मीर से पंजाब तक तलाश कर आये , पश्चिम बंगाल से गुजरात तक खोज लिया , नहीं मिला कहीं भी लोकतंत्र। हर प्रदेश के लोकतंत्र का अलग सवभाव है लोग बताते हैं। महाराष्ट्र में सुना है शिवसेना के यहां कभी तो कभी एन सी पी के यहां लोकतंत्र दुहाई दे रहा होता है। कमाल की बात है कि पूरे देश में लोकतंत्र के होने का शोर है , लेकिन जो देखना चाहते हैं अपनी नज़रों से उनको कहीं भी दिखाई नहीं देता। जैसे भगवान है सब जगह ये आस्था है विश्वास है हमें लेकिन हम उसको देख नहीं पाते कभी। लेकिन अब लोग शंका करने लगे हैं कि अगर भगवान है तो धरती पर पाप और पापी क्यों बढ़ रहे हैं। ग्रंथ बताते हैं कि जब अन्याय और अत्याचार सीमा पार कर जाते हैं तब भगवान प्रकट होते हैं। शायद लोकतंत्र भी ऐसा ही करता हो , जब घोटाले , गुंडाराज और सत्ता का अहंकार हर सीमा को लांग जाये तब लोकतंत्र भी प्रकट हो जाये , क्या अभी कुछ कसर बाकी है इनमें। जैसे धर्म स्थलों पर भगवान पण्डे पुजारियों की मर्ज़ी पर भक्तों को दर्शन देते हैं , वो जब चाहें कपाट बंद कर सकते हैं , भगवान के नाम का सारा चढ़ावा चट कर जाते हैं। उसी तरह लोकतंत्र के मंदिर कहलाने वाले स्थलों पर उन लोगों ने कब्ज़ा कर लिया है जो लोकतंत्र को कत्ल कर खुद उसपर माला डाल उसके पुजारी बन बैठे हैं। हे लोकतंत्र इस देश को विश्व का सब से बड़ा लोकतंत्र कहा जाता है। सब गुणगान करते हैं तुम्हारी महिमा का , कहते हैं तुम सब के दुःख दूर कर सकते हो। हम करोड़ों देशवासी कब से तेरे नाम की माला जप रहे हैं , हर बार वोट डालते हैं तुझे पाने की उम्मीद लगाये। हर बार धोका खा जाते हैं हम और कुछ नये नेता तेरा अपहरण कर सत्ता सुख का मोक्ष पा शासक बन लोकतंत्र का उपहास करते हैं। कब इस जनता की पुकार सुनाई देगी तुम्हें , कब दर्शन दोगे लोकतंत्र। 

जनवरी 20, 2014

POST : 406 अब तो सारा जहां हमारा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 अब तो सारा जहां हमारा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

अब तो सारा जहां हमारा है 
आपने  हमसफ़र पुकारा है । 
 
तुम ही पतवार तुम ही हो माझी     
हो जहां तुम वही किनारा है । 
 
कौन आवाज़ दे रहा मुझ को    
आ भी जाओ नहीं गुज़ारा है । 
 
रोक सकते नहीं मुहब्बत को  
इक नदी तेज़ जिसकी धारा है । 
 
अब नहीं ज़िंदगी अधूरी जब 
आपके प्यार का सहारा है । 
 
हर तरफ आप हैं जिधर देखें 
खूबसूरत ,  बहुत नज़ारा है ।   
 
दूर थे पास पास अब ' तनहा '
प्यार का जब मिला इशारा है । 




 

 

जनवरी 16, 2014

POST : 405 सवाल विशेषाधिकार का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

   सवाल विशेषाधिकार का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      यमराज जब पत्रकार की आत्मा को ले जाने लगे तब पत्रकार की आत्मा ने यमराज से कहा कि मैं बाकी सभी कुछ यहां पर छोड़ कर आपके साथ यमलोक में चलने को तैयार हूं , आप मुझे एक ज़रूरी चीज़ ले लेने दो। यमराज ने जानना चाहा कि वो कौन सी वस्तु है जिसका मोह मृत्यु के बाद भी आपसे छूट नहीं रहा है। पत्रकार की आत्मा बोली कि मेरे मृत शारीर पर जो वस्त्र हैं उसकी जेब में मेरा पहचान पत्र है उसको लिये बिना मैं कभी कहीं नहीं जाता। यमराज बोले अब वो किस काम का है छोड़ दो ये झूठा मोह उसके साथ भी। पत्रकार की आत्मा बोली यमराज जी आपको मालूम नहीं वो कितनी महत्वपूर्ण चीज़ है , जिस किसी दफ्तर में जाओ तुरंत काम हो जाता है , अधिकारी सम्मान से बिठा कर चाय काफी पिलाता है , अपने वाहन पर प्रैस शब्द लिखवा लो तो कोई पुलिस वाला रोकता नहीं। पत्रकार होने का सबूत पास हो तो आप शान से जी सकते हैं। यमराज ने समझाया कि अब आपको जिस दुनिया में ले जाना है मुझे , उस दुनिया में ऐसी किसी वस्तु का कोई महत्व नहीं है। पत्रकार की आत्मा ये बात मानने को कदापि तैयार नहीं कि कोई जगह ऐसी भी हो सकती है जहां पत्रकार होने का कोई महत्व ही नहीं हो। इसलिये पत्रकार की आत्मा ने तय कर लिया है कि यमराज उसको जिस दुनिया में भी ले जाये वो अपनी अहमियत साबित करके ही रहेगी।

                       धर्मराज की कचहरी पहुंचने पर जब चित्रगुप्त पत्रकार के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब देख कर बताने लगे तब उसकी आत्मा बोली मुझे आपके हिसाब किताब में गड़बड़ लगती है। आपने मुझसे तो पूछा ही नहीं कि आप सभी पर मेरी कोई देनदारी भी है या नहीं और अपना खुद का बही खाता खोल कर सब बताने लगे। आपको मेरी उन सभी सेवाओं का पारिश्रमिक मुझे देना है जो सब देवी देवताओं को मैंने दी थी। आपको नहीं जानकारी तो मुझे मिलवा दें उन सब से जिनके मंदिरों का मैं प्रचार करता रहा हूं। कितने देवी देवता तो ऐसे हैं जिनको पहले कोई जानता तक नहीं था , हम मीडिया वालों ने उनको इतना चर्चित कर दिया कि उनके लाखों भक्त बन गये और करोड़ों का चढ़ावा आने लगा। हमारा नियम तो प्रचार और विज्ञापन अग्रिम धनराशि लेकर करने का है , मगर आप देवी देवताओं पर भरोसा था कि जब भी मांगा मिल जायेगा , इसलिये करते रहे। अब अधिक नहीं तो चढ़ावे का दस प्रतिशत तो हमें मिलना ही चाहिये। धर्मराज ने समझाया कि वो केवल अच्छे बुरे कर्मों का ही हिसाब रखते हैं , और किसी भी कर्म को पैसे से तोलकर नहीं लिखते कि क्या बैलेंस बचता है। हमारी न्याय व्यवस्था में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अच्छे कर्म का ईनाम सौ रुपये है और किसी बुरे का पचास रुपये जुर्माना है। और जुर्माना काटकर बाक़ी पचास नकद किसी को दे दें। पत्रकार की आत्मा कहने लगी , ऐसा लगता है यहां लोकतंत्र कायम करने और उसकी सुरक्षा के लिये मीडिया रूपी चौथे सतंभ की स्थापना की बहुत ज़रूरत है। मैं चाहता हूं आपके प्रशासनिक तौर तरीके बदलने के लिये यहां पर पत्रकारिता का कार्य शुरू करना , मुझे सब बुनियादी सुविधायें उपलब्ध करवाने का प्रबंध करें। धर्मराज बोले कि उनके पास न तो इस प्रकार की कोई सुविधा है न ही उनका अधिकार अपनी मर्ज़ी से कुछ भी करने का। मुझे तो सब को उनके कर्मों के अनुसार फल देना है केवल।

                        पत्रकार की आत्मा कहने लगी हम पत्रकार हमेशा सर्वोच्च अधिकारी से ही बात करते हैं। आपके ऊपर कौन कौन है और सब से बड़ा अधिकारी कहां है , मुझे सीधा उसी से बात करनी होगी। ऐसा लगने लगा है जैसे पत्रकार की आत्मा धर्मराज को ही कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है। जैसे धर्मराज यहां पत्रकार के कर्मों का लेखा जोखा नहीं देख रहे , बल्कि धर्मराज की जांच पड़ताल करने को पत्रकार की आत्मा पधारी है यहां। आज पहली बार धर्मराज ये सोचकर घबरा रहे हैं कि कहीं इंसाफ करने में उनसे कोई चूक न हो जाये। पत्रकार की आत्मा धर्मराज के हाव भाव देख कर समझ गई कि अब वो मेरी बातों के प्रभाव में आ गये हैं , इसलिये अवसर का लाभ उठाने के लिये वो धर्मराज से बोली , आपको मेरे कर्मों का हिसाब करने में किसी तरह की जल्दबाज़ी करने की ज़रूरत नहीं है। जब चाहें फैसला कर सकते हैं , लेकिन जब तक आप किसी सही निर्णय पर नहीं पहुंच जाते , तब तक मुझे अपनी इस दुनिया को दिखलाने की व्यवस्था करवा दें। मैं चाहता हूं यहां के देवी देवता ही नहीं स्वर्ग और नर्क के वासियों से मिलकर पूरी जानकारी एकत्रित कर लूं। पृथ्वी लोक पर भी हम पत्रकार पुलिस प्रशासन , सरकार जनता , सब के बीच तालमेल बनाने और आपसी विश्वास स्थापित करने का कार्य करते हैं। कुछ वही यहां भी मुमकिन है।

                          काफी गंभीरता से चिंतन मनन करने के बाद धर्मराज जी इस निर्णय पर पहुंचे हैं कि अगर इस आत्मा से पत्रकारिता के भूत को नहीं उतारा गया तो ये यहां की पूरी व्यवस्था को ही छिन्न भिन्न कर सकती है। इस लोक में पत्रकारिता करके नया भूचाल प्रतिदिन खड़ा करती रहेगी। तमाम देवी देवताओं को प्रचार और उनके साक्षात्कार छापने - दिखाने का प्रलोभन दे कर प्रभावित करने का प्रयास कर सकती है। पृथ्वी लोक की तरह यहां भी खुद को हर नियम कायदे से ऊपर समझ सकती है। पहले कुछ नेताओं अफ्सरों की लाल बत्ती वाली वाहन की मांग भी जैसे उन्होंने स्वीकार नहीं की थी उसी तरह पत्रकारिता के परिचय पत्र की मांग को भी ठुकराना ही होगा। धर्मराज जी ने तुरंत निर्णय सुना दिया है कि जब भी अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किया जायेगा तब इसका कोई महत्व नहीं होगा कि किस की आत्मा है। नेता हो अफ्सर हो चाहे कोई पत्रकार , यहां किसी को कोई विशेषाधिकार नहीं होगा।